Indore नगर निगम के 103 करोड़ रुपये के फर्जी बिल घोटाले में बड़ा अपडेट, इंजीनियर और ठेकेदार की जमानत खारिज
Indore News: इंदौर नगर निगम में सामने आए 103 करोड़ रुपये से अधिक के कथित फर्जी बिल घोटाले के मामले में विशेष न्यायालय ने इंजीनियर अभय राठौर और ठेकेदार राहुल बड़ेरा को राहत देने से इनकार कर दिया है। दोनों आरोपितों की जमानत याचिकाएं कोर्ट ने खारिज कर दी हैं। मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से की जा रही है। जांच के दौरान कथित तौर पर फर्जी टेंडर, वर्क ऑर्डर, बिल और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्रों के जरिए नगर निगम से बड़ी रकम हासिल करने की बात सामने आई है।
103 करोड़ रुपये से ज्यादा के भुगतान का आरोप
मामले के अनुसार नगर निगम में ऐसे कई कार्यों से संबंधित दस्तावेज तैयार किए गए, जिनमें कथित तौर पर वास्तविकता और रिकॉर्ड के बीच बड़ा अंतर पाया गया। आरोप है कि फर्जी टेंडर तैयार किए गए और कागजों पर काम दिखाकर उनके नाम से वर्क ऑर्डर और बिल तैयार किए गए।
जांच एजेंसियों के मुताबिक कुछ ऐसे कामों के नाम पर भी भुगतान कराया गया, जो या तो कभी किए ही नहीं गए थे या पहले ही पूरे हो चुके थे। इसके बावजूद संबंधित दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम से 103 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का भुगतान हासिल किए जाने का आरोप है।
इस मामले में इंजीनियर अभय राठौर और ठेकेदार राहुल बड़ेरा की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया है। इसी आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने दोनों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कार्रवाई की।
कोर्ट ने जमानत देने से किया इनकार
विशेष न्यायालय में आरोपितों की ओर से जमानत के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया था। बचाव पक्ष ने कोर्ट के सामने अपनी दलील रखते हुए कहा कि आरोपित लंबे समय से जेल में हैं और जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। उनका यह भी कहना था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं और ईडी की कार्रवाई को एकतरफा बताया गया।
बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मामले में एक सहआरोपित को हाई कोर्ट से गिरफ्तारी से राहत मिल चुकी है। ऐसे में उन्हें भी जमानत का लाभ दिया जाना चाहिए।
हालांकि, ईडी की ओर से विशेष लोक अभियोजक चंदन ऐरन ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि मामले में फर्जी टेंडर, फर्जी बिल और वर्क ऑर्डर के माध्यम से नगर निगम से बड़ी राशि प्राप्त करने के आरोप हैं। ईडी ने इन आरोपों को गंभीर बताते हुए कहा कि मामले की जांच में अभी महत्वपूर्ण पहलुओं की पड़ताल की जा रही है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष न्यायालय ने अभय राठौर और राहुल बड़ेरा की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
मनी लॉन्ड्रिंग के तहत दर्ज हुआ मामला
Indore नगर निगम के कथित फर्जी बिल मामले में दोनों आरोपितों की भूमिका सामने आने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने जून 2024 में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया था। इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ाई गई।
जांच के दौरान ईडी ने कथित तौर पर आरोपितों से जुड़ी संपत्तियों के संबंध में भी कार्रवाई की। एजेंसी की ओर से मामले में चालान भी पेश किया जा चुका है। जून 2026 के पहले सप्ताह में दोनों आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था।
ईडी अब इस बात की जांच कर रही है कि कथित तौर पर हासिल की गई राशि का इस्तेमाल कहां और किस तरह किया गया। साथ ही, इस पूरे मामले में अन्य लोगों की भूमिका और पैसों के लेन-देन की भी जांच की जा रही है।
कैसे सामने आया फर्जी बिल का मामला?
जांच में सामने आए आरोपों के मुताबिक नगर निगम के कुछ कार्यों से संबंधित दस्तावेजों में गड़बड़ी की गई। कथित तौर पर फर्जी टेंडर बनाए गए और ऐसे कामों को रिकॉर्ड में दिखाया गया, जिनकी वास्तविक स्थिति अलग थी।
इसके बाद फर्जी वर्क ऑर्डर और बिल तैयार किए गए। इतना ही नहीं, कथित तौर पर कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए गए। इन दस्तावेजों के आधार पर नगर निगम से भुगतान प्राप्त किया गया।
जांच एजेंसी का आरोप है कि कई मामलों में मौके पर काम नहीं हुआ था, लेकिन दस्तावेजों में उसे पूरा बताया गया। वहीं, कुछ ऐसे कार्य भी थे जो पहले ही पूरे किए जा चुके थे, लेकिन उन्हीं कार्यों के नाम पर दोबारा भुगतान हासिल करने का आरोप है।
घोटाले में कई दस्तावेजों की भूमिका
इस पूरे मामले में टेंडर से लेकर भुगतान तक कई स्तरों पर कथित अनियमितताओं की जांच की जा रही है। फर्जी टेंडर, वर्क ऑर्डर, बिल और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र इस मामले की जांच के प्रमुख आधार हैं।
एजेंसी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इन दस्तावेजों को तैयार करने और भुगतान की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में किन-किन लोगों की भूमिका रही। कथित तौर पर नगर निगम की प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सरकारी धन को निजी लाभ में बदलने का प्रयास किया गया।
आगे भी जारी रह सकती है जांच
अभय राठौर और राहुल बड़ेरा की जमानत खारिज होने के बाद दोनों को फिलहाल न्यायिक हिरासत में ही रहना होगा। वहीं, मामले में ईडी की जांच आगे भी जारी रहने की संभावना है।
103 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितता के कारण यह मामला इंदौर नगर निगम से जुड़े बड़े मामलों में शामिल हो गया है। अब जांच एजेंसियों की नजर इस बात पर है कि कथित फर्जी बिलों के जरिए निकाली गई राशि का अंतिम लाभ किसे मिला और इस पूरी प्रक्रिया में अन्य कौन-कौन लोग शामिल थे।
