मंदिरों में VIP एंट्री क्यों हो? भगवान के दरबार में पद और पैसे से नहीं, श्रद्धा से हो भक्त की पहचान
विशेष आलेख | पूनम रमेश गांधी, राजस्थान
मंदिर भारतीय समाज में केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की श्रद्धा, विश्वास और आध्यात्मिक आस्था के केंद्र हैं। व्यक्ति जब मंदिर की चौखट पर पहुंचता है तो वह अपनी सामाजिक पहचान, पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति से ऊपर उठकर स्वयं को केवल एक भक्त के रूप में देखता है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि जब ईश्वर के सामने सभी समान हैं तो मंदिरों में धनवान, प्रभावशाली या उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए अलग VIP दर्शन व्यवस्था क्यों होनी चाहिए?
देश के अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में सामान्य दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को लंबी कतारों में प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कई बार श्रद्धालु घंटों तक अपनी बारी आने का इंतजार करते हैं। वहीं दूसरी ओर VIP या विशेष दर्शन की व्यवस्था के माध्यम से कुछ लोगों को अपेक्षाकृत जल्दी दर्शन का अवसर मिल जाता है। यही अंतर सामान्य भक्त के मन में सवाल पैदा करता है कि क्या किसी व्यक्ति का पैसा, पद या प्रशासनिक प्रभाव उसकी भक्ति को दूसरे श्रद्धालुओं से अधिक महत्वपूर्ण बना देता है?
भगवान के सामने भक्त की पहचान क्या हो?
भक्ति का संबंध मन की श्रद्धा और समर्पण से है। इसे किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति या सामाजिक पद से नहीं मापा जा सकता। कोई गरीब व्यक्ति कई किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर पहुंचता है, तो कोई बुजुर्ग अपनी शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद भगवान के दर्शन की इच्छा लेकर मंदिर आता है। किसी की श्रद्धा को केवल इस आधार पर कम या ज्यादा नहीं माना जा सकता कि उसके पास कितने आर्थिक संसाधन हैं।
मंदिर के भीतर पहुंचने के बाद मंत्री, अधिकारी, उद्योगपति, व्यापारी, कर्मचारी, मजदूर और किसान—सभी की मूल पहचान एक भक्त की ही होनी चाहिए। ईश्वर के सामने पद और प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा और विनम्रता है।
यदि मंदिर स्वयं समानता, करुणा और अहंकार त्यागने की प्रेरणा देते हैं तो दर्शन व्यवस्था में भी इन्हीं मूल्यों की झलक दिखाई देनी चाहिए।
VIP सुविधा हो तो जरूरतमंदों के लिए हो
विशेष दर्शन या प्राथमिकता की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय इसे वास्तविक जरूरत के आधार पर तय किया जा सकता है। मंदिरों में ऐसी प्राथमिक सुविधा का सबसे पहला अधिकार बुजुर्गों, दिव्यांगों और गंभीर शारीरिक कठिनाइयों से जूझ रहे श्रद्धालुओं को मिलना चाहिए।
उम्र के साथ जिन बुजुर्गों के कदम थकने लगे हैं, उनके लिए घंटों कतार में खड़ा रहना आसान नहीं होता। इसी तरह दिव्यांग श्रद्धालुओं के सामने मंदिर तक पहुंचने और लंबे समय तक प्रतीक्षा करने में कई व्यावहारिक कठिनाइयां होती हैं।
ऐसे लोगों के लिए अलग प्रवेश मार्ग, व्हीलचेयर, बैठने की व्यवस्था, सहायक कर्मचारी और प्राथमिक दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराना वास्तव में सेवा की भावना को दर्शाता है।
यही सच्चे अर्थों में विशेष सुविधा होगी—जो प्रभावशाली व्यक्ति के बजाय जरूरतमंद व्यक्ति के काम आए।
सक्षम व्यक्ति सामान्य श्रद्धालुओं के साथ क्यों नहीं?
जो व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्षम है, उसे केवल पद, प्रतिष्ठा या धन के आधार पर सामान्य श्रद्धालुओं से अलग सुविधा मिलना समानता की भावना पर सवाल खड़ा करता है।
यदि कोई बड़ा अधिकारी, जनप्रतिनिधि, उद्योगपति या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति सामान्य श्रद्धालुओं के साथ कतार में चलकर दर्शन करता है तो इससे उसकी प्रतिष्ठा कम नहीं होती। इसके विपरीत, यह समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है कि ईश्वर के दरबार में हर व्यक्ति समान है।
सामान्य श्रद्धालुओं के साथ प्रतीक्षा करना स्वयं में अनुशासन, धैर्य और विनम्रता का अनुभव भी है। मंदिर केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर अहंकार को कम करने और आत्मचिंतन का अवसर देने वाला स्थान भी है।
क्या पद और पैसा भक्ति का पैमाना हो सकता है?
मंदिर में VIP व्यवस्था पर बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या पैसा या पद किसी व्यक्ति की भक्ति का पैमाना हो सकता है?
एक सामान्य परिवार महीनों तक यात्रा के लिए पैसे बचाकर किसी प्रसिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच सकता है। कोई मजदूर अपनी मेहनत की कमाई से यात्रा करता है, तो कोई किसान दूर गांव से भगवान के दर्शन की इच्छा लेकर आता है। उनकी आस्था किसी प्रभावशाली व्यक्ति से कम कैसे मानी जा सकती है?
भक्ति का मूल्य व्यक्ति की जेब से नहीं, उसके भाव से तय होता है। मंदिर व्यवस्था में भी इस भावना को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
मंदिरों में व्यवस्था भी जरूरी
यह भी समझना आवश्यक है कि बड़े धार्मिक स्थलों पर प्रतिदिन हजारों और कई अवसरों पर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और आपात परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को अलग-अलग व्यवस्थाएं बनानी पड़ती हैं।
कई बार संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों या विशेष सुरक्षा प्राप्त लोगों के आगमन के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण अलग व्यवस्था आवश्यक हो सकती है। लेकिन सुरक्षा की आवश्यकता और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर विशेष दर्शन—इन दोनों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति के लिए सुरक्षा कारणों से विशेष व्यवस्था जरूरी है तो उसका उद्देश्य भीड़ और सुरक्षा प्रबंधन होना चाहिए, न कि यह संदेश देना कि उसकी श्रद्धा सामान्य भक्त से अधिक महत्वपूर्ण है।
मंदिर में विशेषाधिकार नहीं, सेवा को मिले प्राथमिकता
धार्मिक स्थलों की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें प्राथमिकता का आधार प्रभाव नहीं बल्कि आवश्यकता हो। बुजुर्गों, दिव्यांगों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों के साथ आए अभिभावकों और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं वाले श्रद्धालुओं के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है।
मंदिर प्रशासन आधुनिक तकनीक के माध्यम से भी व्यवस्था बेहतर कर सकता है। ऑनलाइन टाइम स्लॉट, डिजिटल कतार, प्रतीक्षा समय की जानकारी और विशेष आवश्यकता वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग सहायता केंद्र जैसी व्यवस्थाएं भीड़ को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं।
इससे सामान्य श्रद्धालुओं को भी सम्मानजनक तरीके से दर्शन का अवसर मिलेगा और जरूरतमंद लोगों को आवश्यक सहायता मिल सकेगी।
अहंकार बाहर छोड़कर मंदिर में प्रवेश हो
धार्मिक परंपराओं का मूल संदेश मनुष्य को अहंकार से दूर करना है। मंदिर में प्रवेश करते समय व्यक्ति अपने जूते बाहर छोड़ता है; उसी तरह पद, प्रतिष्ठा और अहंकार को भी बाहर छोड़कर प्रवेश करने की भावना विकसित होनी चाहिए।
ईश्वर के सामने बड़ा वह नहीं है जिसके पास बड़ा पद, अधिक धन या प्रशासनिक शक्ति है। बड़ा वह है जो विनम्रता के साथ सिर झुकाता है और दूसरों के अधिकार एवं सुविधा का सम्मान करता है।
यदि प्रभावशाली लोग स्वयं सामान्य श्रद्धालुओं के साथ दर्शन करने की परंपरा को बढ़ावा दें तो यह समाज के लिए प्रेरक उदाहरण बन सकता है।
VIP का नहीं, श्रद्धा और जरूरत का हो सम्मान
मंदिर का द्वार ऐसा होना चाहिए जहां किसी की आर्थिक स्थिति नहीं, उसकी श्रद्धा का सम्मान हो। किसी पद का नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरत का मान हो। विशेष सुविधा मिले तो उस बुजुर्ग को मिले जो ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता, उस दिव्यांग को मिले जिसके लिए सामान्य कतार में चलना कठिन है और उस जरूरतमंद को मिले जिसे वास्तव में सहायता की आवश्यकता है।
बाकी सभी श्रद्धालुओं की पहचान भगवान के दरबार में केवल ‘भक्त’ के रूप में होनी चाहिए।
मंदिरों में समानता की यह भावना मजबूत होगी तो धार्मिक स्थलों का आध्यात्मिक संदेश भी और प्रभावी होगा। आखिर भगवान के सामने व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका पद या पैसा नहीं, बल्कि उसकी श्रद्धा, विनम्रता और सच्चा समर्पण है।
— पूनम रमेश गांधी, राजस्थान
