Indore Lokayukta Action: बेटे की गाड़ी पंचायत में लगाकर सरकारी खजाने से कराया भुगतान, पूर्व सचिव-सरपंच समेत तीन पर केस
इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर जिले की ग्राम पंचायत बांक में सरकारी निधि के कथित दुरुपयोग का मामला सामने आया है। आरोप है कि तत्कालीन पंचायत सचिव ने अपने पद का लाभ उठाते हुए अपने ही बेटे की गाड़ी को पंचायत के काम में लगवाया और बिना टेंडर प्रक्रिया तथा ग्रामसभा की अनुमति के पंचायत निधि से वाहन का किराया भी दिलवाया। शिकायत की जांच के बाद लोकायुक्त पुलिस ने तत्कालीन पंचायत सचिव, तत्कालीन सरपंच और सचिव के बेटे के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ा प्रकरण दर्ज किया है।
लोकायुक्त पुलिस के अनुसार मामला ग्राम पंचायत बांक का है। तत्कालीन पंचायत सचिव प्रहलाद नील पर आरोप है कि उन्होंने अपने बेटे धीरज नील के वाहन को पंचायत में सफाई सहित अन्य कार्यों के लिए नियमों का पालन किए बिना अटैच कराया। वाहन का किराया पंचायत निधि से दिया गया। इस मामले में तत्कालीन सरपंच लक्ष्मीबाई पति राधेश्याम चौहान की भूमिका भी जांच के दायरे में आई।
शिकायत की जांच के बाद लोकायुक्त ने तीनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है।
ग्राम पंचायत बांक का है पूरा मामला
लोकायुक्त एसपी डॉ. राजेश सहाय को ग्राम पंचायत बांक में वाहन किराए पर लेने और उसके भुगतान से संबंधित शिकायत मिली थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पंचायत के तत्कालीन सचिव प्रहलाद नील ने पद पर रहते हुए अपने बेटे धीरज नील को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए उसके वाहन को पंचायत के कामों में लगवाया।
लोकायुक्त पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले की जांच शुरू की। जांच में वाहन की नियुक्ति, भुगतान से संबंधित दस्तावेज, प्रस्ताव और पंचायत स्तर पर अपनाई गई प्रक्रिया की पड़ताल की गई।
जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर लोकायुक्त पुलिस ने मामले में प्रकरण दर्ज किया। आरोप है कि वाहन को पंचायत में लगाने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और इसके बावजूद सरकारी निधि से भुगतान कर दिया गया।
बेटे की गाड़ी पंचायत के काम में लगवाने का आरोप
लोकायुक्त जांच के अनुसार तत्कालीन पंचायत सचिव प्रहलाद नील ने अपने बेटे धीरज नील के वाहन क्रमांक MP-10 G-1435 को ग्राम पंचायत में सफाई और अन्य कार्यों के लिए लगवाया था।
आरोप है कि पंचायत सचिव के पद पर रहते हुए प्रहलाद नील ने अपने पारिवारिक हित से जुड़े इस निर्णय में भूमिका निभाई। जांच एजेंसी के अनुसार इससे वाहन मालिक धीरज नील को आर्थिक लाभ पहुंचा।
पंचायत में किसी निजी वाहन या अन्य सेवा को किराए पर लेने के दौरान निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी होता है। इस मामले में आरोप है कि वाहन को निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना पंचायत के काम में लगा दिया गया।
बिना टेंडर प्रक्रिया के लगाया गया वाहन
लोकायुक्त पुलिस की जांच में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह सामने आया कि संबंधित वाहन को किसी टेंडर प्रक्रिया के जरिए पंचायत के काम के लिए नहीं लिया गया था।
आरोप है कि वाहन किराए पर लेने से पहले न तो प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही अन्य संभावित वाहन मालिकों या सेवा प्रदाताओं को अवसर दिया गया। जांच एजेंसी ने इसे नियमों के कथित उल्लंघन से जोड़कर देखा है।
सरकारी और पंचायत निधि से होने वाले खर्च में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक माना जाता है। लेकिन इस मामले में आरोप है कि तत्कालीन सचिव ने अपने बेटे के वाहन को सीधे पंचायत के काम में लगवा दिया।
ग्रामसभा की अनुमति भी नहीं लेने का आरोप
मामले में दूसरा महत्वपूर्ण आरोप ग्रामसभा की मंजूरी से जुड़ा है। जांच के अनुसार वाहन को पंचायत के काम में लगाने से पहले ग्रामसभा से अनुमति नहीं ली गई थी।
लोकायुक्त जांच में सामने आया कि बिना ग्रामसभा की मंजूरी के ही वाहन का उपयोग किया गया और बाद में पंचायत निधि से उसके किराए का भुगतान भी किया गया।
इस पूरे मामले में लोकायुक्त पुलिस यह जांच कर रही है कि वाहन को कितने समय तक पंचायत के काम में लगाया गया, इसके लिए कितना भुगतान किया गया और पूरी प्रक्रिया में किन-किन अधिकारियों या पदाधिकारियों की भूमिका रही।
तत्कालीन सरपंच के हस्ताक्षर से तैयार हुआ प्रस्ताव
लोकायुक्त जांच के मुताबिक, तत्कालीन सचिव प्रहलाद नील और तत्कालीन सरपंच लक्ष्मीबाई पति राधेश्याम चौहान ने वाहन के भुगतान से संबंधित प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे।
इसी आधार पर तत्कालीन सरपंच की भूमिका भी जांच के दायरे में आई। आरोप है कि वाहन किराए से संबंधित प्रस्ताव तैयार किया गया और उसके बाद पंचायत निधि से भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
लोकायुक्त ने जांच में मिले तथ्यों के आधार पर तत्कालीन सचिव और सरपंच दोनों को मामले में आरोपी बनाया है। इसके अलावा वाहन मालिक और सचिव के बेटे धीरज नील को भी प्रकरण में आरोपी बनाया गया है।
पंचायत निधि से बेटे को किया गया किराए का भुगतान
जांच में सामने आया कि पंचायत के कार्यों में वाहन का इस्तेमाल किए जाने के बाद वाहन मालिक धीरज नील को पंचायत निधि से किराए का भुगतान किया गया।
लोकायुक्त पुलिस के मुताबिक, तत्कालीन सचिव ने पद पर रहते हुए ऐसे निर्णय में भूमिका निभाई, जिससे उनके बेटे को कथित रूप से अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचा।
यही तथ्य पूरे मामले में भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों का महत्वपूर्ण आधार बना। जांच एजेंसी अब भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों की विस्तृत जांच कर रही है।
तीन लोगों के खिलाफ लोकायुक्त ने दर्ज किया मामला
शिकायत की जांच के बाद लोकायुक्त पुलिस ने तत्कालीन पंचायत सचिव प्रहलाद नील, तत्कालीन सरपंच लक्ष्मीबाई पति राधेश्याम चौहान और वाहन मालिक धीरज नील के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया है।
तीनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ए), 13(2) और भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2) के तहत मामला दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।
प्रकरण दर्ज होने के बाद अब लोकायुक्त पुलिस आगे की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध दस्तावेजों, भुगतान के रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।
पारिवारिक हित से जुड़े फैसले पर उठे सवाल
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल तत्कालीन पंचायत सचिव के पारिवारिक हित से जुड़े निर्णय में उनकी भूमिका को लेकर है। आरोप है कि सचिव ने अपने बेटे के स्वामित्व वाले वाहन को पंचायत के कार्यों में लगवाया और फिर पंचायत निधि से उसका भुगतान कराया।
लोकायुक्त के मुताबिक, इस प्रक्रिया से धीरज नील को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचा। जांच एजेंसी अब यह भी देख रही है कि इस निर्णय से पंचायत को किसी तरह की वित्तीय हानि हुई या नहीं और भुगतान के दौरान सभी आवश्यक दस्तावेजी औपचारिकताओं का पालन किया गया था या नहीं।
पंचायत निधि और पारदर्शिता पर फिर उठे सवाल
ग्राम पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, स्वच्छता और मूलभूत सुविधाओं से जुड़े कार्यों पर सरकारी धन खर्च करती हैं। ऐसे में पंचायत निधि का उपयोग निर्धारित नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत किया जाना आवश्यक है।
इंदौर की ग्राम पंचायत बांक से सामने आए इस मामले ने एक बार फिर स्थानीय निकायों में वित्तीय निर्णयों की पारदर्शिता को चर्चा में ला दिया है। बिना टेंडर, बिना ग्रामसभा की मंजूरी और पारिवारिक हित से जुड़े वाहन को भुगतान करने के आरोपों की अब लोकायुक्त पुलिस विस्तृत जांच कर रही है।
फिलहाल मामला जांच के स्तर पर है और आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। लोकायुक्त की जांच में यह पता लगाया जाएगा कि वाहन किराए से जुड़े निर्णय और भुगतान में नियमों का किस स्तर तक पालन हुआ और मामले में आरोपियों की वास्तविक भूमिका क्या रही।
