सबके दिन एक-से नहीं होते” : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज
कैंची नहीं, सुई बनो – तोड़ो मत, जोड़ो” : दिल्ली में गुरुदेव का प्रवचन*
द्रव्य-दृष्टि महान्, आत्म-दृष्टि सर्वश्रेष्ठ”
राजेश जैन दद्दू
नई दिल्ली।
दिल्ली स्थित ऋषभोदय, ऋषभ विहार में विराजित श्रमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा को सम्बोधित करते हुए जीवन जीने के कालातीत सूत्र प्रदान किए। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आज की मंगल देशना में गुरु देव ने कहा कि
“सबके दिन एक-से नहीं होते
आचार्य श्री ने कहा मित्रों! जीवन में इस सूत्र को कभी नहीं भूलना कि सबके दिन एक-से नहीं होते।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा – जहाँ कभी महल थे आज वहाँ खण्डहर पड़े हैं। जहाँ श्मशान थे वहाँ आज घर, मंदिर, भवन बने हैं। जो कभी सम्राट थे वे पद से हट गए और जो कभी सेवक थे वे सेठ बन गए। जिनकी कभी पूजा होती थी, उनको आज कोई पूछ भी नहीं रहा है।
“घड़ी का कांटा कभी बारह पर होता है, तो कभी वही कांटा छह पर होता है। कभी शाम, कभी प्रातः। कभी अंधकार तो कभी उजास। कभी घी घना, कभी मुट्ठी भर चना।”
गुरुदेव ने कहा संकटों में धैर्य रखो। संकट के दिन भी सदा नहीं रहते, सुख के दिन भी सदा नहीं रहते। कष्ट में घबराओ मत, सुख में फूलो मत। दिन बदलते देर नहीं लगती।कैंची नहीं, सुई बनो
गुरुदेव ने समाज को जोड़ने का संदेश देते हुए कहा”जीवन में सुखी रहना चाहते हो तो सुई का काम सीखो, कैंची मत बनो।”* अर्थात काटने का काम मत करो, जोड़ने का काम करो। तोड़ो मत, जोड़ना सीखो। किसी को गिराओ मत, उठाने का प्रयास करो। किसी का तिरस्कार मत करो, यथा-योग्य सबका सत्कार करो। द्रव्य दृष्टि महान्
आचार्य श्री ने कहा “द्रव्य-दृष्टि महान् होती है।” एक ग्वाला दूध में घृत को देख लेता है, एक कृषक बीज में वृक्ष देख लेता है, एक शिल्पकार पाषाण में प्रतिमा देख लेता है, एक कुम्भकार मिट्टी में मटकी देख लेता है, एक योगी आत्मा में परमात्मा को देख लेता है। यही द्रव्य दृष्टि है।
उन्होंने कहा “द्रव्य-दृष्टि के बिना आटे से रोटी भी नहीं बनती।” आत्मा से परमात्मा बनना है तो द्रव्य-दृष्टि से निहारो। जब तक द्रव्य (धन) पर दृष्टि है, तब तक द्रव्य (आत्मा) पर दृष्टि नहीं जा सकती। आत्म-दृष्टि ही सर्वश्रेष्ठ है।चित्रों का चित्त पर प्रभाव गुरुदेव ने कहा आकृतियों का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। प्रभु की प्रतिमा देखते ही हाथ जुड़ जाते हैं, गुरु के दर्शन होते ही व्यक्ति आह्लाद से भर जाता है। एक चित्र वैराग्य बढ़ाता है, एक चित्र वासना जाग्रत कर देता है। इसलिए अपने घरों में ऐसे चित्र लगाओ जिससे मन वैराग्य, दया, करुणा, विनय से भर जाए।
अविद्या से बचो, विद्या रथ पर चलो* अंत में आचार्य श्री ने कहा अपने आपको हीन मानना, कमजोर मानना ही अविद्या है। यथार्थ को नहीं पहचानना भी अज्ञान है। अविद्या से अपनी रक्षा करो, विद्या-रथ पर आरूढ़ होकर आगे बढ़ो। विद्या से विनय प्राप्त होती है और विनय ही सुख-शांति का आधार है।
धर्मसभा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के अमृत वचनों का लाभ लिया। नमोस्तु शासन जयवंत हो।
