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गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त : आचार्यश्री उदारसागर महाराज

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Published On: 14 August 2026

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गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त : आचार्यश्री उदारसागर महाराज

मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा, आचार्यश्री ने गुरु-भक्ति और आत्मकल्याण का बताया महत्व

रिपोर्टर:  मनोज जैन नायक

मुरैना। शहर में चातुर्मासरत ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरु की महिमा, गुरु-भक्ति और आत्मकल्याण के विषय पर श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन दिया। मंदिर में रत्नकरण्ड श्रावकाचार पर चल रही प्रवचन श्रृंखला के दौरान आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे गुरु के मार्गदर्शन के बिना आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। गुरु मनुष्य को न केवल सांसारिक जीवन में सही दिशा दिखाते हैं, बल्कि आत्मा के कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।

धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने आचार्यश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

गुरु जीवन को सही दिशा देने का कार्य करते हैं

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन में ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन उपलब्ध हैं। व्यक्ति पुस्तकों, शिक्षकों और विभिन्न माध्यमों से ज्ञान अर्जित कर सकता है, लेकिन उस ज्ञान को अपने आचरण और व्यवहार में उतारने की कला सच्चे गुरु के सान्निध्य से ही प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे अपने जीवन और आचरण के माध्यम से धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाते हैं। गुरु का एक वचन, एक संकेत अथवा उनका जीवन आदर्श भी किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकता है। इसलिए गुरु के प्रति श्रद्धा, विनय और समर्पण का भाव रखना आवश्यक है।

आचार्यश्री ने कहा कि अरिहंत और सिद्ध परम गुरु हैं तथा पंच परमेष्ठी जैन धर्म में परम वंदनीय माने गए हैं। उनके गुणों का स्मरण और उनके बताए मार्ग पर चलना व्यक्ति को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।

गुरु-भक्ति पर सुनाया प्रेरक प्रसंग

प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने गुरु की महिमा को समझाने के लिए एक प्रेरक प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि एक विद्यार्थी प्रतिदिन अपने गुरु के चरण स्पर्श करता था। विद्यार्थी की गुरु के प्रति गहरी श्रद्धा और विनय थी।

एक दिन गुरु ने विद्यार्थी को चरण स्पर्श करने से मना कर दिया। विद्यार्थी ने इसका कारण पूछा तो गुरु ने बताया कि उनके जीवन में एक बुराई थी, लेकिन विद्यार्थी की गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण को देखकर उन्होंने उस बुराई को छोड़ने का निर्णय लिया।

आचार्यश्री ने कहा कि यह प्रसंग गुरु-शिष्य संबंध की गहराई को दर्शाता है। सच्ची गुरु-भक्ति केवल गुरु का सम्मान करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि गुरु के आदर्शों और उनके बताए मार्ग को अपने जीवन में अपनाना ही वास्तविक गुरु-भक्ति है।

श्रद्धा और विनय से होता है आत्मपरिवर्तन


आचार्यश्री ने कहा कि शिष्य की सच्ची श्रद्धा और विनय गुरु के भीतर भी श्रेष्ठ भावों को जागृत कर सकती है। इसी प्रकार गुरु का सान्निध्य शिष्य के जीवन में आत्मपरिवर्तन की प्रेरणा पैदा करता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में सद्गुरु का सान्निध्य मिलने पर उनके बताए सिद्धांतों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है। उन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है। गुरु के प्रति विनय, श्रद्धा और समर्पण व्यक्ति के भीतर सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

धन और प्रतिष्ठा नहीं, आत्मकल्याण है जीवन का उद्देश्य

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं, धन, पद और प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। इन सभी चीजों के लिए व्यक्ति अनेक लोगों से सलाह और मार्गदर्शन लेता है, लेकिन आत्मा के कल्याण के लिए सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलने को अक्सर भूल जाता है।

उन्होंने कहा कि धन, पद और प्रतिष्ठा संसार में स्थायी नहीं हैं। ये सभी परिस्थितियों के साथ बदल सकते हैं, जबकि आत्मकल्याण जीवन का शाश्वत उद्देश्य है। गुरु व्यक्ति को इसी स्थायी लक्ष्य की ओर ले जाने का कार्य करते हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में भौतिक आवश्यकताओं के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति पर भी ध्यान देना चाहिए। सद्गुरु के मार्गदर्शन में धर्म, संयम और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाकर व्यक्ति अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर आगे बढ़ सकता है।

ब्रह्ममुहूर्त में जागरण से दिन की शुरुआत धर्ममय बनाएं : मुनिश्री उपशान्तसागर

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने भी श्रद्धालुओं को धार्मिक और अनुशासित दिनचर्या अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को रात में सोते समय शुभ संकल्प करना चाहिए कि वह सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जागेगा, जिनालय जाएगा, भगवान का अभिषेक करेगा और जिनेन्द्र भगवान की पूजा-अर्चना करेगा।

मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति रात में सोते समय जिन भावों के साथ रहता है, उसका प्रभाव अगले दिन की दिनचर्या पर भी दिखाई देता है। इसलिए सोने से पहले मन में सकारात्मक और धार्मिक भाव रखना चाहिए।

बदलती दिनचर्या पर जताई चिंता

मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने वर्तमान समय की बदलती दिनचर्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज देर रात तक जागना और दिन में देर तक सोना लोगों की आदत बनती जा रही है। इससे जीवन की प्राकृतिक और अनुशासित दिनचर्या प्रभावित होती है।

उन्होंने प्रेरक शैली में कहा कि यदि मनुष्य की दिनचर्या ही उल्टी हो जाए तो उसका जीवन भी उसी तरह अस्त-व्यस्त होता चला जाता है। इसलिए व्यक्ति को समय का सदुपयोग करते हुए अनुशासित और धार्मिक दिनचर्या अपनानी चाहिए।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को विशेष रूप से ब्रह्ममुहूर्त में जागने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सुबह का समय केवल शरीर को नींद से जगाने का समय नहीं है, बल्कि यह अपनी चेतना को धर्म और आत्मचिंतन की ओर जागृत करने का अवसर है।

सुबह भगवान के स्मरण से करें दिन की शुरुआत


मुनिश्री ने कहा कि सुबह जागते ही व्यक्ति को सांसारिक चिंताओं में नहीं उलझना चाहिए। दिन की शुरुआत जिनेन्द्र भगवान के स्मरण से करनी चाहिए। प्रातःकाल मन अपेक्षाकृत शांत होता है और इस समय धार्मिक चिंतन व्यक्ति के मन को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि जागते समय दोनों हथेलियों को जोड़कर उन्हें सिद्धशिला के समान मानते हुए चौबीसों तीर्थंकर भगवान का स्मरण और दर्शन-भाव करना चाहिए। यदि दिन की पहली स्मृति भगवान की होगी तो दिनभर के कार्यों में भी धर्म, संयम और सद्भाव की प्रेरणा बनी रहेगी।

मंदिर जाना आत्मजागरण की साधना


मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि मंदिर जाना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मा को जागृत करने की साधना है। भगवान के अभिषेक और पूजन के माध्यम से श्रद्धालु उनके गुणों का स्मरण करते हैं और अपने जीवन में भी उन गुणों को विकसित करने का संकल्प लेते हैं।

उन्होंने कहा कि जब दिन की शुरुआत जिनेन्द्र स्मरण, गुरु वंदना और शुभ भावों के साथ होती है तो धीरे-धीरे व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवन की दिशा भी सकारात्मक रूप से बदलने लगती है।

श्रद्धालुओं ने प्राप्त किया धर्मलाभ

धर्मसभा के दौरान आचार्यश्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज के प्रवचनों को श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक सुना। संतों ने अपने संदेश के माध्यम से गुरु के प्रति श्रद्धा, विनय और समर्पण के साथ-साथ अनुशासित दिनचर्या, ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, भगवान के स्मरण और आत्मचिंतन का महत्व बताया।

धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने संतों के मंगल प्रवचनों से धर्मलाभ प्राप्त किया और उनके बताए मार्ग को जीवन में अपनाने की प्रेरणा ली। पूरे आयोजन के दौरान श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर का वातावरण धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावनाओं से ओतप्रोत रहा।

 

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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