राग-द्वेष से मुक्ति के लिए मौत का चिंतन और मैत्री भाव जरूरी: साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी
महिदपुर रोड में धर्मसभा को साध्वीश्री ने किया संबोधित
महिदपुर रोड। राजेंद्र सुरि ज्ञान मंदिर में चातुर्मास के लिए विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी महाराज साहब ने गुरुवार को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए राग और द्वेष से मुक्ति का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि अपने जीवन से राग को दूर करना चाहता है तो उसे मृत्यु का चिंतन करना चाहिए, जबकि द्वेष को समाप्त करने के लिए सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, स्नेह और मैत्री का भाव रखना आवश्यक है।
साध्वीश्री ने कहा कि संसार में कोई भी संबंध हमेशा रहने वाला नहीं है। जिस वस्तु का जहां से आगमन हुआ है, उसे अंततः वहीं जाना है। इसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी नश्वर है। उन्होंने मिट्टी के खिलौने का उदाहरण देते हुए कहा कि मिट्टी से बना खिलौना अंत में मिट्टी में ही मिल जाता है। मनुष्य को भी यह समझना चाहिए कि शरीर स्थायी नहीं है और संसार के संबंध भी स्थायी नहीं हैं।
शरीर रहते हैं सभी अपने, आत्मा के जाने के बाद कोई नहीं
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी ने कहा कि जब तक शरीर में आत्मा रहती है, तब तक परिवार और समाज के लोग हमें अपना मानते हैं। लेकिन आत्मा के शरीर से निकलते ही वही शरीर, जिसे हम अपना समझते हैं, दूसरों के लिए भी पराया हो जाता है। इसलिए मनुष्य को केवल सांसारिक संबंधों में उलझने के बजाय परमात्मा की शरण और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसार के अधिकांश संबंध किसी न किसी अपेक्षा और स्वार्थ से जुड़े होते हैं। ऐसे में व्यक्ति को इन संबंधों की वास्तविकता को समझते हुए अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए। जब मनुष्य किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति अत्यधिक लगाव पैदा कर लेता है, तो उसी के कारण उसे सुख के साथ दुख और पीड़ा का भी अनुभव करना पड़ता है।
‘आज का दिन जीवन का अंतिम दिन है’ यह सोचकर जिएं
साध्वीश्री ने श्रद्धालुओं से जीवन को सकारात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से जीने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह सोचकर जीवन जीना चाहिए कि आज उसके जीवन का अंतिम दिन है। यदि यह दिन परमात्मा की कृपा से मिला है तो इसे व्यर्थ के मोह-माया और विवादों में गंवाने के बजाय धर्म, साधना और आत्मकल्याण में लगाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक दिन को परमात्मा की कृपा मानकर उसका सदुपयोग करना चाहिए। मृत्यु का चिंतन मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध कराता है और उसे अनावश्यक आसक्ति से दूर करने में मदद करता है। यही चिंतन राग को कम करने का माध्यम बन सकता है।
द्वेष मिटाने के लिए प्रेम और मैत्री भाव जरूरी
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी ने कहा कि द्वेष को दूर करने के लिए प्राणी मात्र के प्रति प्रेम, स्नेह, करुणा, ममता और वात्सल्य का भाव रखना चाहिए। यदि मनुष्य दूसरों के प्रति मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण रखेगा तो उसके भीतर नफरत और वैर की भावना धीरे-धीरे समाप्त होगी।
उन्होंने कहा कि जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति पाने के लिए राग और द्वेष दोनों का त्याग आवश्यक है। जब तक मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति अत्यधिक लगाव रखता है अथवा किसी के प्रति नफरत और विरोध की भावना रखता है, तब तक वह मानसिक रूप से अशांत रहता है।

जहां कनेक्शन होगा, वहीं रिएक्शन भी होगा
धर्मसभा में साध्वीश्री ने सरल उदाहरण के माध्यम से समझाया कि जहां आपका कनेक्शन होगा, वहीं आपका रिएक्शन भी होगा। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के साथ हमारा अपनत्व और लगाव अधिक होता है, उसके सुख-दुख का प्रभाव भी हम पर उतना ही अधिक पड़ता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि अपना बच्चा रोता है तो उसके रोने से माता-पिता के हृदय में दर्द होता है, जबकि किसी दूसरे के बच्चे के रोने पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता। इसका कारण संबंध और लगाव है। इसलिए मनुष्य को यह समझने की आवश्यकता है कि अत्यधिक आसक्ति ही कई बार दुख का कारण बनती है।
चातुर्मास में चल रही तप और साधना
महिदपुर रोड जैन समाज के मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने बताया कि चातुर्मास के दौरान नगर में धार्मिक गतिविधियां लगातार जारी हैं। साधार्मिक भक्ति प्रभावना एवं संपूर्ण दिवस का लाभ रमेशचंद्र, अमित कुमार और अंकेश कुमार कोचर मावा वाला परिवार द्वारा लिया गया। वहीं प्रवचन प्रभावना का लाभ अशोक कुमार एवं रौनक कुमार वोरा परिवार, भाटपचलाना द्वारा लिया गया।
उन्होंने बताया कि नगर में सिद्धिदायक सिद्धि तप की आराधना भी चल रही है, जिसमें अनेक आराधक श्रद्धा और भक्ति के साथ तपस्या कर रहे हैं। इसके साथ ही चातुर्मास के प्रारंभ से ही आयंबिल तप की श्रृंखला भी जारी है।
प्रतिदिन श्रद्धालु कर रहे आयंबिल तप
चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन श्रावक-श्राविकाओं द्वारा आयंबिल तप किया जा रहा है। तप आराधना करने वाले श्रद्धालुओं का जैन श्रीसंघ और चातुर्मास समिति द्वारा बहुमान किया जा रहा है। धार्मिक आयोजनों और तपस्या के माध्यम से समाज में संयम, त्याग और आत्मअनुशासन की भावना को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रतिदिन हो रहे मंगलकारी प्रवचन
साध्वी डॉ. अमृतरसा श्री जी महाराज साहब के मंगलकारी प्रवचन प्रतिदिन सुबह 9:15 बजे से 10:30 बजे तक श्री राजेंद्र सुरि ज्ञान मंदिर में आयोजित हो रहे हैं। इन प्रवचनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर जिनवाणी का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
साध्वीश्री ने अपने संदेश में श्रद्धालुओं को राग-द्वेष से ऊपर उठकर जीवन में प्रेम, करुणा, मैत्री और आत्मसंयम को अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संसार की नश्वरता को समझकर यदि मनुष्य अपने जीवन को धर्म और आत्मकल्याण की दिशा में लगाए, तो यही मानव जीवन की वास्तविक सफलता है।
