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धर्म की डायरी में हर कर्म दर्ज होता है, समता और करुणा ही सच्ची महानता का आधार

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Published On: 13 August 2026
धर्म

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धर्म की डायरी में हर कर्म दर्ज होता है, समता और करुणा ही सच्ची महानता का आधार

दमोह (कुंडलपुर)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकालीन प्रवचन श्रृंखला में धर्म, कर्म और मानव जीवन में समता एवं करुणा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार की नजरों से अपने कर्मों को छिपा सकता है, लेकिन धर्म की दृष्टि से प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा सुरक्षित रहता है।

मुनिश्री ने आधुनिक यातायात व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि विदेशों में यातायात नियमों का उल्लंघन होने पर तकनीक के माध्यम से स्वतः जुर्माना दर्ज हो जाता है और संबंधित व्यक्ति को उसका भुगतान करना पड़ता है। इसी प्रकार धर्म के क्षेत्र में भी प्रत्येक शुभ और अशुभ कर्म जीवन की ‘धर्म-डायरी’ में स्वतः अंकित होता है। इसलिए नियमों का पालन केवल दंड के भय से नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और धर्मबोध से किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश में नियमों की कमी नहीं है, आवश्यकता उनके निष्पक्ष और कठोर पालन की है। कानून का समान रूप से पालन होने पर समाज में अनुशासन स्वतः स्थापित हो सकता है। धार्मिक जीवन में भी प्रत्येक व्यक्ति को यह स्मरण रखना चाहिए कि कर्मों का फल निश्चित है। इसलिए जीवन का हर कार्य सजगता और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।

धन की महानता नहीं, सदुपयोग महत्वपूर्ण

मुनिश्री ने कहा कि किसी व्यक्ति की महानता उसके धन, संपत्ति और वैभव से नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग से निर्धारित होती है। धनाढ्य, मध्यमवर्गीय या सामान्य परिवार—सभी समान हैं। श्रेष्ठ वह है जो अपनी आय का कुछ हिस्सा जनहित, परहित और धर्मकार्य में समर्पित करता है। दान का महत्व उसकी राशि में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सेवा और करुणा की भावना में है।

प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि एक संपन्न व्यक्ति द्वारा समाज के कमजोर परिवार को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया। इसका संदेश है कि आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। हम सभी एक ही भगवान के उपासक और एक ही गुरु के अनुयायी हैं, इसलिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति हमारा समान बंधु है। यही समतामयी और उदार दृष्टि सम्यक दर्शन का वास्तविक परिणाम है।

चार भाव जीवन को बनाते हैं श्रेष्ठ

मुनिश्री ने कहा कि सम्यक दर्शन का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। किसी व्यक्ति में गुण और विशेषता दिखाई दे तो उसके प्रति प्रमोदभाव रखना चाहिए। दीन-दुखी, रोगी, असहाय और दिव्यांगों को देखकर मन में करुणा जागृत हो तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनकी सहायता करनी चाहिए।

वहीं, दुष्ट अथवा दुर्जन व्यक्ति से सामना होने पर अनावश्यक विवाद से बचते हुए माध्यस्थ भाव रखना श्रेयस्कर है। न अनुचित प्रशंसा करें और न ही व्यर्थ के संघर्ष में पड़ें। जहां टकराव से कोई लाभ न हो, वहां शांतिपूर्वक स्वयं को अलग कर लेना ही विवेकपूर्ण आचरण है।

उन्होंने कहा कि समता, करुणा, प्रमोद और माध्यस्थ—ये चार भाव व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। जब मनुष्य नियमों के पालन, परोपकार, समानता और आत्मसंयम को जीवन का आधार बना लेता है, तभी उसका जीवन समाज के लिए प्रेरणा और आत्मकल्याण का माध्यम बनता है।

उक्त जानकारी अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने दी।

संवाददाता सोनू अठया दमोह (मध्य प्रदेश)

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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