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परंपरा: टाल वाली माता मंदिर से गुजरते हैं मवेशी, ग्रामीण मानते हैं सालभर निरोग रहने का आशीर्वाद

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Published On: 12 August 2026
Villagers in Padana take cows, buffaloes, goats and horses through a five-colored sacred thread near Taal Wali Mata Temple as part of a traditional ritual observed on Shravan Amavasya
— Villagers in Padana take cows, buffaloes, goats and horses through a five-colored sacred thread near Taal Wali Mata Temple as part of a traditional ritual observed on Shravan Amavasya

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परंपरा: टाल वाली माता मंदिर से गुजरते हैं मवेशी, ग्रामीण मानते हैं सालभर निरोग रहने का आशीर्वाद

श्रावण अमावस्या पर निभाई जाती है वर्षों पुरानी परंपरा, पचरंगी धागे के बीच से गाय, भैंस, बकरी और घोड़े निकालते हैं किसान

संवाददाता:  मनोज कुमार पुष्पद

पड़ाना। भारत अपनी विविध संस्कृतियों, लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है। देश के अलग-अलग ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसी अनेक परंपराएं देखने को मिलती हैं, जिनका संबंध लोगों की आस्था, पशुधन और स्थानीय मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। इसी तरह की एक पुरानी परंपरा पड़ाना नगर के हाटवाड़ी रोड स्थित टाल वाली माता मंदिर से जुड़ी हुई है।

ग्रामीणों के अनुसार, श्रावण मास की अमावस्या के अवसर पर यहां वर्षों से एक विशेष परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि इस परंपरा के तहत टाल वाली माता मंदिर के पास से मवेशियों को निकालने से वे सालभर निरोग रहते हैं और पशुओं को किसी प्रकार की बीमारी नहीं होती। इसी आस्था के चलते किसान परिवार हर वर्ष अपने गाय, भैंस, बकरी, घोड़े और अन्य पशुओं को इस स्थान से निकालते हैं।

हालांकि, यह ग्रामीणों की स्थानीय धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यता है। पशुओं के स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव के लिए पशु चिकित्सकीय देखभाल और आवश्यक टीकाकरण भी जरूरी है।

श्रावण अमावस्या पर निभाई जाती है परंपरा

ग्रामीण क्षेत्र में श्रावण मास की अमावस्या का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। इस दिन विभिन्न स्थानों पर स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पूजा-पाठ और पारंपरिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

पड़ाना में भी इसी अवसर पर टाल वाली माता मंदिर से जुड़ी पुरानी परंपरा निभाई जाती है। ग्रामीणों के मुताबिक यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका पालन किया जा रहा है।

इस दिन किसान परिवार अपने मवेशियों को लेकर टाल वाली माता मंदिर के पास पहुंचते हैं और परंपरा के अनुसार उन्हें निर्धारित स्थान से निकालते हैं।

पचरंगी धागे के बीच से निकाले जाते हैं मवेशी

ग्रामीणों के अनुसार, टाल वाली माता मंदिर के पुजारी द्वारा मार्ग के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पचरंगी धागा बांधा जाता है। इसके बाद किसान परिवार अपने मवेशियों को इसी स्थान से निकालते हैं।

मान्यता के अनुसार गाय, भैंस, बकरी, घोड़े सहित अन्य पशुओं को इस धागे के बीच से निकालने पर माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है और पशु पूरे वर्ष स्वस्थ रहते हैं।

यह दृश्य ग्रामीण अंचल में लोगों के लिए आस्था और परंपरा से जुड़ा विशेष अवसर होता है। किसान अपने पशुधन को लेकर इस आयोजन में शामिल होते हैं और इसे अपने परिवार एवं पशुओं की सुख-समृद्धि से जोड़कर देखते हैं।

पशुधन को लेकर ग्रामीणों की गहरी आस्था

ग्रामीण जीवन में पशुधन का विशेष महत्व रहा है। किसान परिवारों के लिए गाय, भैंस, बकरी और अन्य पशु केवल घरेलू पशु नहीं होते, बल्कि उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा भी होते हैं।

दूध उत्पादन से लेकर कृषि कार्यों तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में पशुओं को स्वस्थ रखना किसानों की प्राथमिकता होती है।

इसी कारण ग्रामीण समाज में पशुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी कई लोक परंपराएं विकसित हुईं। टाल वाली माता मंदिर से जुड़ी यह परंपरा भी इसी लोक आस्था और पशुधन के प्रति ग्रामीणों की चिंता को दर्शाती है।

शीतला सप्तमी से भी जुड़ी लोक मान्यताएं

ग्रामीण अंचलों में अलग-अलग पर्वों पर स्वास्थ्य और निरोगी जीवन से जुड़ी कई परंपराएं देखने को मिलती हैं। शीतला सप्तमी के अवसर पर भी कई स्थानों पर शीतला माता की पूजा की जाती है।

लोक मान्यताओं के अनुसार इस दिन परिवार अपने बच्चों के स्वस्थ और निरोग रहने की कामना करते हैं। कई क्षेत्रों में ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाने और माता की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है।

इसी प्रकार श्रावण अमावस्या के अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन की रक्षा और निरोगी रहने की कामना से अलग-अलग स्थानीय रीति-रिवाज निभाए जाते हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा

टाल वाली माता मंदिर से जुड़ी परंपरा को ग्रामीण पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं। बुजुर्गों के अनुसार पहले भी किसान अपने मवेशियों को इस स्थान से निकालते थे और आज भी नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है।

ग्रामीणों का कहना है कि बदलते समय के बावजूद स्थानीय परंपराओं और आस्था से जुड़े ऐसे आयोजन गांव की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

युवा पीढ़ी भी इन आयोजनों में हिस्सा लेती है और बुजुर्गों से परंपरा से जुड़ी जानकारी प्राप्त करती है।

मवेशियों के साथ उमड़ता है ग्रामीणों का उत्साह

श्रावण अमावस्या के दिन टाल वाली माता मंदिर के आसपास ग्रामीणों की आवाजाही बढ़ जाती है। किसान अपने मवेशियों को लेकर यहां पहुंचते हैं और निर्धारित स्थान से उन्हें निकालते हैं।

गाय, भैंस, बकरी और घोड़े जैसे पशुओं को पचरंगी धागे के बीच से निकालने की प्रक्रिया ग्रामीणों के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दौरान मंदिर में पूजा-अर्चना और माता के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सिलसिला भी चलता है।

ग्रामीण इस परंपरा को अपने पशुधन की सुरक्षा और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़ते हैं।

लोक संस्कृति और आस्था की झलक

टाल वाली माता से जुड़ी यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण लोक संस्कृति का भी हिस्सा है। ऐसी परंपराएं गांवों की सामाजिक संरचना, आस्था और स्थानीय विश्वासों की झलक प्रस्तुत करती हैं।

पड़ाना क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों के बीच अपनी जगह बनाए हुए है। बदलती जीवनशैली और आधुनिक दौर के बावजूद ग्रामीण अपनी पुरानी मान्यताओं को पूरी श्रद्धा के साथ निभाते नजर आते हैं।

परंपरा के साथ पशुओं की देखभाल भी जरूरी

ग्रामीणों की धार्मिक आस्था अपनी जगह है, लेकिन पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर वैज्ञानिक एवं पशु चिकित्सा संबंधी सावधानियां भी जरूरी हैं। पशुपालकों को समय-समय पर पशु चिकित्सकों से सलाह लेने, आवश्यक टीकाकरण कराने, स्वच्छ पानी और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना चाहिए।

इस तरह स्थानीय परंपराओं के साथ आधुनिक पशु चिकित्सा सुविधाओं का उपयोग करके पशुधन को बेहतर तरीके से स्वस्थ रखा जा सकता है।

आज भी कायम है आस्था

टाल वाली माता मंदिर से जुड़ी यह परंपरा आज भी पड़ाना और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आस्था का हिस्सा बनी हुई है। श्रावण मास की अमावस्या पर किसान अपने मवेशियों को मंदिर के पास से निकालते हैं और माता से उनके निरोगी एवं सुरक्षित रहने की कामना करते हैं।

यह परंपरा ग्रामीण जीवन में पशुधन के महत्व, लोक आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की कहानी कहती है। बदलते समय के बीच भी ऐसी लोक परंपराएं गांवों की पहचान और सांस्कृतिक स्मृतियों को जीवित रखने का काम कर रही हैं।

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