विभाजन का डंक: मुल्तान की जैन प्रतिमाओं की 80 साल पुरानी यात्रा, आस्था और विस्थापन की मार्मिक कहानी
जयपुर। वर्ष 1947 में भारत का विभाजन केवल राजनीतिक और भौगोलिक सीमाओं के बदलने की घटना नहीं था। इस विभाजन ने लाखों परिवारों को अपनी जन्मभूमि, घर, कारोबार और पुरानी स्मृतियां छोड़कर अनजान जगहों की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया। इस दौर की अनगिनत कहानियों में एक कहानी मुल्तान के जैन समाज और वहां की धार्मिक प्रतिमाओं से जुड़ी है, जो आज भी आस्था, साहस और विस्थापन की पीड़ा को सामने लाती है।
मुल्तान, जो अब पाकिस्तान में है, कभी जैन समाज की धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा था। विभाजन के बाद परिस्थितियां तेजी से बदलीं और वहां रहने वाले अनेक जैन परिवारों को भारत आना पड़ा। अपने साथ वे केवल निजी सामान और जरूरी दस्तावेज ही नहीं लाए, बल्कि अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का प्रयास भी किया।
जब लोगों के सामने आया सबसे कठिन फैसला

विभाजन के समय मुल्तान के जैन परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि वे अपनी धार्मिक विरासत को सुरक्षित कैसे भारत लाएं। घर और संपत्ति छोड़ना मजबूरी थी, लेकिन पीढ़ियों से पूजित जैन प्रतिमाओं और जिनवाणी को पीछे छोड़ना उनके लिए आसान नहीं था।
जैन परंपरा में प्रचलित विवरणों के अनुसार, उस कठिन समय में करीब 85 जैन प्रतिमाओं और जिनवाणी को सुरक्षित भारत लाने की तैयारी की गई। परिस्थितियां इतनी चुनौतीपूर्ण थीं कि सड़क और रेल मार्ग से इन्हें निकालना कठिन माना जा रहा था। ऐसे में विमान के माध्यम से धार्मिक धरोहर को भारत लाने का प्रयास किया गया।
यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रतिमाओं को पहुंचाने की यात्रा नहीं थी, बल्कि उस समय अपने अस्तित्व और आस्था को बचाने का संघर्ष भी थी।
विमान में बढ़ा भार तो सामने आया भावुक क्षण
कहा जाता है कि प्रतिमाओं और अन्य सामान के कारण विमान का भार बढ़ गया था। पायलट की ओर से वजन कम करने की आवश्यकता बताई गई। उस समय वहां मौजूद लोगों के सामने बेहद कठिन फैसला था।
एक ओर व्यक्तिगत सामान था, जिसे छोड़ना संभव था और दूसरी ओर वे धार्मिक प्रतिमाएं तथा जिनवाणी थीं, जिनसे समाज की पीढ़ियों की आस्था जुड़ी हुई थी।
प्रचलित विवरणों के अनुसार, महिलाओं ने अपना निजी सामान छोड़ना स्वीकार कर लिया, लेकिन प्रतिमाओं और जिनवाणी को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुईं।
यह प्रसंग इस बात को दर्शाता है कि विस्थापन के उस कठिन दौर में लोगों के लिए धार्मिक धरोहर केवल वस्तु नहीं थी। वह उनकी पहचान, परंपरा और पूर्वजों की स्मृति का हिस्सा थी।
घर छूटा, लेकिन आस्था साथ आई
विभाजन के दौरान लाखों लोगों ने अपने घरों को अंतिम बार देखा और फिर कभी वापस नहीं लौट सके। मुल्तान के जैन परिवारों की स्थिति भी इससे अलग नहीं थी।
उनके लिए घर दोबारा बनाना संभव था। कारोबार फिर से शुरू किया जा सकता था। संपत्ति दोबारा अर्जित की जा सकती थी। लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक धरोहर को यदि पीछे छोड़ दिया जाता, तो आने वाली पीढ़ियों को उस विरासत से जोड़ना कठिन हो सकता था।
इसी सोच ने उस समय लोगों को अपनी धार्मिक प्रतिमाओं और जिनवाणी को सुरक्षित भारत लाने के लिए प्रेरित किया।
मुल्तान से जोधपुर और फिर जयपुर पहुंचीं प्रतिमाएं
जैन समाज में प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, विमान के माध्यम से इन प्रतिमाओं को भारत लाया गया और विमान जोधपुर पहुंचा। इसके बाद प्रतिमाओं को जयपुर ले जाया गया।
आज इन प्रतिमाओं से जुड़ी धार्मिक परंपरा जयपुर में मुल्तान के जैन मंदिर की स्मृति को जीवित रखती है। इन प्रतिमाओं को देखने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल धार्मिक दर्शन का अवसर नहीं, बल्कि इतिहास के उस दौर को याद करने का माध्यम भी है, जब हजारों परिवारों ने विस्थापन का दर्द झेला था।
प्रतिमाएं बनीं विभाजन की मूक गवाह
मुल्तान से भारत लाई गई जैन प्रतिमाओं को केवल धार्मिक दृष्टि से देखना इस पूरी कहानी को अधूरा समझना होगा। ये प्रतिमाएं उस पीढ़ी की स्मृति से भी जुड़ी हैं, जिसने अपना घर और जन्मस्थान खो दिया था।
इनके साथ मुल्तान की धार्मिक परंपराओं की यादें भी भारत आईं। मंदिरों की घंटियां, पूजा-अर्चना की परंपरा, परिवारों की धार्मिक मान्यताएं और जिनवाणी से जुड़ी श्रद्धा—इन सबकी स्मृति इन प्रतिमाओं के साथ आगे बढ़ी।
इस अर्थ में ये प्रतिमाएं विभाजन की एक ऐसी मूक गवाह हैं, जो बिना कुछ कहे उस दौर की कहानी सुनाती हैं।
महिलाओं की भूमिका और त्याग की चर्चा
इस पूरी कथा का सबसे भावुक पक्ष महिलाओं से जुड़ा बताया जाता है। प्रचलित विवरणों के अनुसार जब विमान में वजन कम करने की स्थिति बनी, तब महिलाओं ने अपने निजी सामान को छोड़ने पर सहमति जताई, लेकिन धार्मिक प्रतिमाओं और जिनवाणी को छोड़ना स्वीकार नहीं किया।
यह प्रसंग उस समय की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक चेतना को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। जिन लोगों ने अपना घर खोया, उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को बचाए रखने को प्राथमिकता दी।
उनका यह त्याग आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक संदेश बन गया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी संस्कृति और परंपरा को बचाने का प्रयास किया जा सकता है।
80 साल बाद भी कायम है उस यात्रा की स्मृति
विभाजन को करीब आठ दशक बीत चुके हैं। समय बदल गया, पीढ़ियां बदल गईं और मुल्तान की वह दुनिया भी बदल गई, जिसमें कभी जैन समाज की धार्मिक गतिविधियां हुआ करती थीं। लेकिन उन प्रतिमाओं से जुड़ी स्मृति आज भी जीवित है।
नई पीढ़ी के लिए यह कहानी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह बताती है कि विभाजन केवल नक्शे पर खींची गई एक सीमा नहीं था। इसके पीछे लाखों लोगों की निजी त्रासदियां, बिछड़ने की पीड़ा और अपनी पहचान बचाने की कोशिशें छिपी थीं।
धार्मिक धरोहर से आगे है इन प्रतिमाओं का महत्व
मुल्तान की जैन प्रतिमाओं का महत्व केवल पूजा और धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। ये प्रतिमाएं विस्थापन, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक स्मृति का प्रतीक भी हैं।
एक ओर वे जैन समाज की धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, वहीं दूसरी ओर वे उस पीढ़ी की याद दिलाती हैं जिसने अपना सब कुछ छोड़ दिया, लेकिन अपनी आस्था को बचाकर रखा।
यही वजह है कि इन प्रतिमाओं के सामने खड़े होकर श्रद्धालु केवल धार्मिक भावना से ही नहीं जुड़ते, बल्कि इतिहास के उस दर्द को भी महसूस कर सकते हैं, जिसे उनके पूर्वजों ने झेला था।
इतिहास से मिलने वाला संदेश
मुल्तान की जैन प्रतिमाओं की कहानी हमें यह समझाती है कि भौगोलिक सीमाएं बदल सकती हैं, लेकिन सांस्कृतिक स्मृतियां इतनी आसानी से समाप्त नहीं होतीं। घर छूट सकता है, शहर बदल सकता है और परिस्थितियां इंसान को विस्थापित कर सकती हैं, लेकिन आस्था और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की इच्छा बनी रह सकती है।
विभाजन की इस कहानी में सबसे बड़ी सीख यही दिखाई देती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर केवल पत्थर या धातु की वस्तु नहीं होती, बल्कि उसके साथ पीढ़ियों की भावनाएं और इतिहास जुड़ा होता है।
मुल्तान की जैन प्रतिमाओं की यात्रा इसलिए आज भी महत्वपूर्ण है। यह यात्रा केवल मुल्तान से भारत तक की नहीं थी। यह आस्था से स्मृति, स्मृति से इतिहास और इतिहास से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने वाली यात्रा है।
करीब 80 वर्ष बाद भी इन प्रतिमाओं के सामने श्रद्धा से झुकते सिर उस दौर की कहानी को याद करते हैं, जब लोगों ने बहुत कुछ खो दिया था, लेकिन अपनी आस्था को अपने साथ लेकर आए थे। यही इस ऐतिहासिक यात्रा का सबसे मार्मिक और स्थायी संदेश है।
