विवादित रिजल्ट को लेकर फिर सुर्खियों में विक्रम विश्वविद्यालय, 1600 में दिए 1604 अंक
Ujjain । सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय एक बार फिर परीक्षा परिणाम को लेकर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला अल्पाइन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, उज्जैन की MBA चतुर्थ सेमेस्टर की एक छात्रा के परीक्षा परिणाम से जुड़ा है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी किए गए प्रारंभिक परिणाम में छात्रा के कुल प्राप्तांक 1604 दर्शाए गए, जबकि अधिकतम अंक 1600 निर्धारित किए गए थे। यानी मार्कशीट में छात्रा को अधिकतम अंकों से भी चार अंक अधिक मिल गए।
परिणाम सामने आने के बाद अंक गणना और विश्वविद्यालय की परीक्षा परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे। शिकायत के बाद विश्वविद्यालय ने परिणाम में संशोधन किया। हालांकि संशोधित परिणाम में छात्रा के प्राप्तांक 1604 ही रखे गए, लेकिन अधिकतम अंकों को 1600 से बढ़ाकर 2100 कर दिया गया। इसके बाद छात्रा का प्रतिशत 76.38 दर्ज किया गया और उसे प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण घोषित किया गया।
पहले 1600 में 1604 अंक
जानकारी के अनुसार MBA चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा के चारों सेमेस्टर के प्राप्तांकों को जोड़ने पर कुल अंक 1604 आए। विश्वविद्यालय द्वारा पहले जारी किए गए परिणाम में अधिकतम अंक 1600 दर्शाए गए थे। ऐसे में मार्कशीट में 1604/1600 अंक दर्ज हो गए।
इस गणना के आधार पर छात्रा के अंक 100.25 प्रतिशत बन रहे थे। सामान्य तौर पर किसी परीक्षा में प्राप्तांक अधिकतम निर्धारित अंकों से अधिक नहीं हो सकते। ऐसे में 1600 में 1604 अंक का मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
शिकायत के बाद बदला अधिकतम अंक
प्रारंभिक परिणाम में विसंगति सामने आने के बाद मामले की शिकायत की गई। शिकायत के बाद विश्वविद्यालय ने परिणाम में संशोधन किया। संशोधित मार्कशीट में छात्रा के प्राप्तांक 1604 ही रखे गए, लेकिन अधिकतम अंकों की संख्या 1600 से बढ़ाकर 2100 कर दी गई।
अब संशोधित परिणाम में छात्रा के अंक 1604/2100 दर्शाए गए हैं। इसके आधार पर उसका प्रतिशत 76.38 प्रतिशत दर्ज किया गया है। संशोधित परिणाम में छात्रा को First Division और PASS घोषित किया गया है।

अंक वही रहे, अधिकतम अंक कैसे बढ़े?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रारंभिक परिणाम में अधिकतम अंक 1600 किस आधार पर तय किए गए थे। यदि चारों सेमेस्टर के कुल प्राप्तांक 1604 थे, तो परिणाम जारी करने से पहले अंक गणना और अधिकतम अंकों का मिलान क्यों नहीं किया गया?
दूसरा सवाल यह है कि शिकायत के बाद अधिकतम अंकों को 1600 से बढ़ाकर 2100 करने का आधार क्या था। विश्वविद्यालय की ओर से परिणाम में इस बदलाव का स्पष्ट कारण क्या बताया गया है, यह भी महत्वपूर्ण है।
परीक्षा परिणाम तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल
यह मामला केवल एक छात्रा की मार्कशीट तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे विश्वविद्यालय की परीक्षा परिणाम तैयार करने और जांचने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होते हैं। परिणाम जारी करने से पहले अंक तालिका की जांच, कुल प्राप्तांक और अधिकतम अंकों का मिलान तथा प्रतिशत की गणना जैसी प्रक्रियाएं की जाती हैं।
ऐसे में प्रारंभिक परिणाम में 1600 में 1604 अंक दर्ज होना परीक्षा परिणाम की जांच व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। यदि शिकायत सामने नहीं आती तो क्या यही परिणाम अंतिम माना जाता? यह भी जांच का विषय है।
संशोधित परिणाम के बाद भी उठ रहे सवाल
संशोधित मार्कशीट जारी होने के बाद छात्रा के परिणाम में अधिकतम अंक 2100 कर दिए गए हैं और प्रतिशत 76.38 दर्ज किया गया है। इससे छात्रा का परिणाम तकनीकी रूप से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन प्रारंभिक परिणाम में हुई विसंगति को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी विश्वविद्यालय के परीक्षा परिणाम में पारदर्शिता और सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। छात्रों का भविष्य उनके परीक्षा परिणाम और मार्कशीट पर निर्भर करता है। इसलिए परिणाम में किसी भी तरह की विसंगति सामने आने पर उसका स्पष्ट कारण और सुधार की प्रक्रिया सार्वजनिक होना जरूरी है।

विश्वविद्यालय से स्पष्ट जवाब की जरूरत
इस मामले में अब विश्वविद्यालय प्रशासन से यह स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा है कि प्रारंभिक मार्कशीट में 1600 अधिकतम अंक किस आधार पर दर्ज किए गए थे। साथ ही संशोधित परिणाम में अधिकतम अंक 2100 किए जाने का आधार क्या था और इस बदलाव को किस स्तर पर स्वीकृति दी गई।
मामले को लेकर विश्वविद्यालय की परीक्षा शाखा की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि यह तकनीकी या डाटा एंट्री की त्रुटि थी तो परिणाम जारी होने से पहले इसकी जांच क्यों नहीं हुई? वहीं यदि अधिकतम अंक वास्तव में 2100 थे, तो शुरुआती परिणाम में 1600 अंक क्यों दर्ज किए गए?
फिलहाल संशोधित परिणाम में छात्रा के 1604 अंक, 76.38 प्रतिशत और First Division के साथ PASS दर्ज है। लेकिन प्रारंभिक परिणाम में सामने आई 1600 में 1604 अंकों की विसंगति ने विक्रम विश्वविद्यालय की परीक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
