निष्काम भक्ति ही आत्मा को भगवान बनने की दिशा में ले जाती है: आचार्य उदारसागरजी महाराज
धर्मसभा में आचार्यश्री ने बताया भक्ति का वास्तविक स्वरूप, आत्मशुद्धि और मोक्ष मार्ग पर चलने की दी प्रेरणा
मुरैना (मनोज जैन नायक)। परम पूज्य आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप निस्वार्थ और निष्काम होना चाहिए। जब तक पूजा, आराधना और भक्ति किसी सांसारिक लाभ, धन, पद, प्रतिष्ठा, संतान, व्यवसाय या अन्य इच्छाओं की पूर्ति के उद्देश्य से की जाती है, तब तक वह आत्मकल्याण का माध्यम नहीं बन सकती।
उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें आत्मशुद्धि, कर्मों की निर्जरा और मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने की भावना हो। भक्ति में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होना चाहिए, तभी वह आत्मा को ऊंचाई की ओर ले जाने वाली साधना बनती है।
भगवान से मांगने की बजाय उनके गुणों को अपनाएं
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि निष्काम भक्ति की भावना को जीवन में विकसित करना चाहिए। भगवान से सांसारिक वस्तुओं की मांग करने के स्थान पर उनके आदर्शों और गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान किसी व्यक्ति का भाग्य नहीं बदलते, बल्कि उनका आदर्श जीवन मनुष्य को स्वयं अपने कर्मों के माध्यम से जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।
इसलिए भक्ति का उद्देश्य बाहरी उपलब्धियां प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए।
जैन दर्शन में हर आत्मा में भगवान बनने की क्षमता
आचार्यश्री ने जैन दर्शन की विशेषता बताते हुए कहा कि इस दर्शन में प्रत्येक आत्मा के भीतर परमात्मा बनने की अनंत संभावनाएं मौजूद हैं। तीर्थंकरों और सिद्ध भगवान ने भी साधना, संयम, तप और निष्काम भक्ति के माध्यम से परम पद प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि अन्य कई परंपराओं में भक्त और भगवान के बीच अंतर बना रहता है, लेकिन जैन दर्शन में आत्मा को परमात्मा बनने की क्षमता वाला माना गया है। यदि मनुष्य संयम, साधना और शुद्ध भावों के साथ जीवन जीता है तो भगवान बनना केवल कल्पना नहीं, बल्कि जैन दर्शन का सिद्धांत है।

निस्वार्थ भाव से की गई आराधना ही सार्थक
आचार्यश्री ने कहा कि पूजा और भक्ति तभी सार्थक होती है, जब उसमें स्वार्थ, अपेक्षा और अहंकार का त्याग हो। भगवान को किसी धन, वैभव या बाहरी प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं है। उन्हें केवल निर्मल भाव, पवित्र श्रद्धा और सच्चे समर्पण की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जिस दिन भक्ति से स्वार्थ समाप्त हो जाता है, उसी दिन आत्मा की वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ होती है।
माला और माल का प्रदर्शन साधना को कमजोर करता है: उपशांतसागर महाराज
धर्मसभा में उपशांतसागर महाराज ने भी प्रेरणादायी प्रवचन देते हुए कहा कि “माला और माल चौराहे पर नहीं गिनना चाहिए, माला गिनोगे तो मालामाल हो जाओगे।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि जप, तप, दान और भक्ति का प्रदर्शन करने से साधना का प्रभाव कम हो जाता है। सच्ची साधना वह है, जो विनम्रता, निस्वार्थ भाव और आत्मसमर्पण के साथ की जाए।
उन्होंने कहा कि साधना में केवल माला के मनकों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि श्रद्धा, एकाग्रता और पवित्र भाव ही उसे सफल बनाते हैं। जब भक्ति केवल प्रभु को समर्पित होती है, तभी वह आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

मंगलाचरण के साथ हुआ धर्मसभा का शुभारंभ
धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती गुंजन जैन द्वारा प्रस्तुत मधुर एवं भक्तिमय मंगलाचरण के साथ हुआ। इसके बाद समाज के सम्माननीय सदस्यों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।
पूरे कार्यक्रम का प्रभावशाली एवं व्यवस्थित संचालन विद्वान श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। उन्होंने धर्मसभा को गरिमामय रूप प्रदान करते हुए संतों के विचारों को श्रद्धालुओं तक पहुंचाया।
प्रवचनों से भक्तों का वातावरण हुआ आध्यात्मिक
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आचार्यश्री और संतों के अमृतमय प्रवचनों को सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
संपूर्ण सभा स्थल धर्म, भक्ति, ज्ञान और आत्मजागरण के दिव्य वातावरण से भर गया। श्रद्धालुओं ने संतों के संदेशों को जीवन में अपनाने और निष्काम भाव से धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

