स्वाध्याय से मिलता है सुख, शांति और सकारात्मकता : महासती डॉ. कुमुदलताजी म.सा.
इंदौर में चातुर्मास धर्मसभा में आगम, अहिंसा और आत्मशुद्धि पर हुआ प्रेरक प्रवचन
इंदौर। धर्म, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के महत्व को समझाने के उद्देश्य से दिवाकर दरबार, एयरपोर्ट रोड स्थित नरसिंह वाटिका में आयोजित चातुर्मास धर्मसभा में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन का संदेश दिया गया। इस अवसर पर अनुष्ठान आराधिका महासती डॉ. कुमुदलताजी म.सा. एवं साध्वी पद्मकीर्तीजी म.सा. ने आगम, धर्म, अहिंसा और आत्मकल्याण के विषयों पर प्रभावशाली प्रवचन देते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। साध्वीवृंद के प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुनते हुए श्रद्धालुओं ने जीवन में संयम, सदाचार और सकारात्मक सोच अपनाने का संकल्प लिया।
स्वाध्याय जीवन को देता है नई दिशा
धर्मसभा में साध्वी पद्मकीर्तीजी म.सा. ने सुखविपाक सूत्र के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नियमित स्वाध्याय व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख बाहरी संसाधनों से नहीं, बल्कि धर्म और आत्मिक विकास से प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन में अनेक परिस्थितियों का सामना करता है। कभी सुख आता है तो कभी दुख, लेकिन धर्म से जुड़े व्यक्ति का मन दोनों परिस्थितियों में संतुलित रहता है। भगवान महावीर के संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “दुःख में घबराना नहीं और सुख में इतराना नहीं” जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि स्वाध्याय केवल धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन नहीं है, बल्कि अपने भीतर झांकने और आत्मा को समझने की प्रक्रिया है। नियमित स्वाध्याय से विचारों में शुद्धता आती है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है।
आगम हैं संतों की सबसे बड़ी संपत्ति
महासती डॉ. कुमुदलताजी म.सा. ने अपने प्रवचन में जैन आगमों के महत्व को बताते हुए कहा कि आगम जीवन को सही दिशा प्रदान करने वाले अमूल्य ग्रंथ हैं। संतों के लिए आगम सबसे बड़ी संपत्ति हैं, क्योंकि इनमें जीवन के प्रत्येक पहलू से जुड़े मार्गदर्शन और आत्मकल्याण का मार्ग बताया गया है।
उन्होंने कहा कि आगमों का अध्ययन करने से व्यक्ति को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझ में आता है और वह अपने जीवन में संयम, अहिंसा एवं करुणा जैसे गुणों को अपना सकता है।
महासतीजी ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है, लेकिन स्थायी शांति और आनंद केवल आत्मिक विकास से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए धर्म, ध्यान और स्वाध्याय को जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

वास्तु शांति का बताया वास्तविक अर्थ
प्रवचन के दौरान महासती डॉ. कुमुदलताजी म.सा. ने वास्तु शांति के विषय पर भी महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वास्तु शांति का उद्देश्य केवल किसी भवन में धार्मिक क्रिया करना नहीं है, बल्कि इसके पीछे अहिंसा और क्षमा का भाव छिपा हुआ है।
उन्होंने बताया कि भवन निर्माण के दौरान अनेक सूक्ष्म जीवों की अनजाने में हिंसा हो जाती है। ऐसे में उन जीवों के प्रति क्षमाभाव रखते हुए आत्मशुद्धि करना ही वास्तविक वास्तु शांति है।
उन्होंने कहा कि धर्म हमें संवेदनशील बनाता है और प्रत्येक जीव के प्रति दया तथा सम्मान का भाव रखना सिखाता है। अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धांत है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार में अपनाना चाहिए।
पार्श्व पद्मावती 16 शुक्रवार एकासना आराधना का शुभारंभ
इस अवसर पर पार्श्व पद्मावती 16 शुक्रवार एकासना आराधना का शुभारंभ भी किया गया। धार्मिक अनुष्ठान में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस विशेष आराधना में 800 से अधिक श्रद्धालुओं ने एकासना कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
श्रद्धालुओं ने संयम और भक्ति के साथ आराधना करते हुए आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया। आयोजन में भक्तों का उत्साह और श्रद्धा देखते ही बन रहा था।
लाभार्थी परिवारों ने प्राप्त किया धर्मलाभ
कार्यक्रम के लाभार्थी श्री वीरेंद्र-रेखा जैन, श्री विवेक-शारदा जैन एवं स्वर्णिम-हार्मनी जैन परिवार, इंदौर रहे। लाभार्थी परिवारों ने धार्मिक आयोजन में सहयोग प्रदान कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
धर्मसभा का संचालन जिनेश्वर जैन ने प्रभावी रूप से किया। उन्होंने कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित किया।
धर्म और आत्मचिंतन का दिया संदेश
धर्मसभा के समापन अवसर पर साध्वीवृंद ने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे जीवन में धर्म, स्वाध्याय और सेवा को महत्व दें। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने विचारों और कर्मों को शुद्ध बनाते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में अच्छे विचार, विनम्रता, करुणा और अहिंसा का पालन करना ही सच्चा धर्म है।
चातुर्मास के दौरान आयोजित इस धर्मसभा ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान की और उन्हें जीवन में सकारात्मकता, संयम एवं शांति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
