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सिलवानी के प्राचीन तारण तरण जैन चैत्यालय में वर्षावास कलश स्थापना संपन्न, ध्वजारोहण के साथ गूंजे जयघोष; बसंत जी महाराज बोले— विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति से ही मिलती है गुरु कृपा

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Published On: 30 July 2026
Devotees participate in the Varshavas Kalash Sthapana and Dhwajarohan ceremony at Taran Taran Jain Chaityalaya in Silwani during Guru Purnima, under the guidance of Ratnakar Bal Brahmachari Basant Ji Maharaj
— Devotees participate in the Varshavas Kalash Sthapana and Dhwajarohan ceremony at Taran Taran Jain Chaityalaya in Silwani during Guru Purnima, under the guidance of Ratnakar Bal Brahmachari Basant Ji Maharaj

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सिलवानी के प्राचीन तारण तरण जैन चैत्यालय में वर्षावास कलश स्थापना संपन्न, ध्वजारोहण के साथ गूंजे जयघोष; बसंत जी महाराज बोले— विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति से ही मिलती है गुरु कृपा

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गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़, वैदिक विधि-विधान से हुआ वर्षावास कलश स्थापना समारोह; धार्मिक वातावरण में दिनभर चले पूजा-अर्चना, मंगलाचरण और प्रवचन।

सिलवानी | संवाददाता – वैभव जैन ‘मस्ताना’

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर रायसेन जिले के सिलवानी नगर स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचीन तारण तरण जैन चैत्यालय में वर्षावास कलश स्थापना एवं ध्वजारोहण समारोह अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर नगर सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित हुए और धर्म लाभ प्राप्त किया।

समारोह का मुख्य आकर्षण रत्नाकर बाल ब्रह्मचारी श्री बसंत जी महाराज के वर्षावास कलश स्थापना का आयोजन रहा। प्रतिष्ठाचार्य पंडित निलेश जैन (सुहागपुर), पंडित विजय मोही (पिपरिया), राजेश जैन खन्ना पटेल एवं उत्सव जैन के निर्देशन में वैदिक एवं जैन परंपराओं के अनुसार विधि-विधान से कलश स्थापना कराई गई। पूरे चैत्यालय परिसर में धार्मिक मंत्रोच्चार, मंगलाचरण और जयघोष की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा।

ध्वजारोहण के साथ हुई धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत

कार्यक्रम की शुरुआत प्रातःकाल मंदिर परिसर में ध्वजारोहण के साथ हुई। श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र की पूजा-अर्चना कर मंगलकामना की। इसके बाद वर्षावास कलश स्थापना की तैयारियां प्रारंभ हुईं।

धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार मंत्रोच्चार के बीच कलश स्थापना संपन्न कराई गई। उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक अनुष्ठानों में भाग लिया और धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

समारोह के दौरान पूरे चैत्यालय परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। फूलों की सजावट, रंग-बिरंगी पताकाएं और धार्मिक ध्वज कार्यक्रम की भव्यता को और बढ़ा रहे थे।

भक्ति और श्रद्धा से सराबोर रहा पूरा वातावरण

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक समारोह में सुबह से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो गया था। महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर पूजा-अर्चना एवं धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।

मंगलाचरण, स्तुति, भजन और जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए आशीर्वाद प्राप्त किया।

वर्षावास का जैन धर्म में विशेष महत्व

जैन धर्म में वर्षावास का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। वर्षा ऋतु के दौरान साधु-संत एक ही स्थान पर निवास कर धर्मोपदेश, प्रवचन, स्वाध्याय और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करते हैं।

इस अवधि में श्रद्धालुओं को संतों के सान्निध्य में धर्म सुनने, आत्मचिंतन करने और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर प्राप्त होता है। वर्षावास केवल साधु-संतों का निवास नहीं बल्कि समाज के लिए धार्मिक जागरण और संस्कार निर्माण का भी महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

बसंत जी महाराज ने दिया जीवन को सार्थक बनाने का संदेश

वर्षावास कलश स्थापना के पश्चात आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए रत्नाकर बाल ब्रह्मचारी श्री बसंत जी महाराज ने श्रद्धालुओं को जीवन में विनम्रता, श्रद्धा और समर्पण का महत्व समझाया।

उन्होंने कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाले व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे जीवन को सही दिशा दिखाने वाले पथप्रदर्शक होते हैं। यदि व्यक्ति अपने जीवन में संस्कार, अनुशासन और सदाचार को अपनाता है, तो उसका जीवन सफल और सार्थक बन जाता है।

बसंत जी महाराज ने कहा कि—

“विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति से ही गुरु कृपा प्राप्त होती है। अहंकार मनुष्य को सत्य, धर्म और आत्मकल्याण के मार्ग से दूर ले जाता है।”

उन्होंने कहा कि आज के समय में मनुष्य भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में अपने नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। ऐसे समय में गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करता है।

संस्कार और अनुशासन ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

अपने प्रवचन में बसंत जी महाराज ने कहा कि माता-पिता और गुरु द्वारा दिए गए संस्कार व्यक्ति की सबसे बड़ी संपत्ति होते हैं।

उन्होंने कहा कि—

  • संस्कार जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं।
  • अनुशासन सफलता की पहली सीढ़ी है।
  • श्रद्धा से आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • समर्पण से जीवन में शांति आती है।
  • अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।

उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने परिवारों में धार्मिक संस्कारों को बढ़ावा दें और नई पीढ़ी को नैतिक मूल्यों से जोड़ें।

गुरु पूर्णिमा का महत्व भी बताया

बसंत जी महाराज ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है क्योंकि गुरु ही अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल पूजा का पर्व नहीं बल्कि आत्ममंथन और अपने जीवन को सुधारने का अवसर भी है।प्रतिष्ठाचार्यों के निर्देशन में संपन्न हुए सभी धार्मिक अनुष्ठान

समारोह के दौरान प्रतिष्ठाचार्य पंडित निलेश जैन (सुहागपुर) एवं पंडित विजय मोही (पिपरिया) ने धार्मिक विधियों का संचालन किया।

उनके साथ राजेश जैन खन्ना पटेल और उत्सव जैन ने भी अनुष्ठानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सभी धार्मिक कार्यक्रम पारंपरिक विधि-विधान और शास्त्रीय परंपराओं के अनुरूप संपन्न कराए गए।

श्रद्धालुओं ने लिया गुरु का आशीर्वाद

धर्मसभा के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने बसंत जी महाराज के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

कई श्रद्धालुओं ने वर्षावास के दौरान नियमित रूप से प्रवचन सुनने और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का संकल्प भी लिया। महिलाओं और युवाओं ने भी धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी निभाई।

सामूहिक भक्ति और सामाजिक एकता का बना संदेश

इस धार्मिक आयोजन ने केवल आध्यात्मिक वातावरण ही नहीं बनाया बल्कि समाज में एकता, सहयोग और सामूहिक सहभागिता का भी संदेश दिया।

जैन समाज के सदस्यों ने मिलकर आयोजन की सभी व्यवस्थाएं संभालीं। पूजा, स्वागत, प्रसाद वितरण, व्यवस्था संचालन और श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा गया।

वर्षावास के दौरान होंगे विभिन्न धार्मिक आयोजन

समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि वर्षावास अवधि में चैत्यालय में नियमित रूप से—

  • धर्मसभा
  • प्रवचन
  • स्वाध्याय
  • सामूहिक पूजा
  • जैन आगम अध्ययन
  • धार्मिक संस्कार शिविर
  • युवाओं के लिए नैतिक शिक्षा कार्यक्रम

जैसे अनेक धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य समाज में धर्म, संस्कार और नैतिक मूल्यों को मजबूत करना है।

धार्मिक चेतना और आध्यात्मिक ऊर्जा का बना केंद्र

गुरु पूर्णिमा पर आयोजित वर्षावास कलश स्थापना समारोह ने सिलवानी नगर को एक बार फिर धार्मिक चेतना और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। श्रद्धालुओं की आस्था, संतों का सान्निध्य और धार्मिक अनुष्ठानों की भव्यता ने आयोजन को यादगार बना दिया।

बसंत जी महाराज के प्रेरणादायी संदेश ने उपस्थित जनसमुदाय को यह सीख दी कि जीवन में सफलता केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि विनम्रता, श्रद्धा, अनुशासन, सेवा और गुरु के प्रति समर्पण से प्राप्त होती है। वर्षावास के आगामी दिनों में चैत्यालय धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहेगा तथा समाज को धर्म और संस्कारों से जोड़ने का कार्य निरंतर जारी रहेगा।

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