गुरु पूर्णिमा संगीत समारोह में शास्त्रीय संगीत और कथक का अद्भुत संगम: राग मेघ, शिव वंदना और भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध
दमोह | रिपोर्टर: सोनू अठया, स्वराज वाणी, दमोह (मध्य प्रदेश)
दमोह जिले के ग्राम बकायन में आयोजित 132वें मृदंगाचार्य पंडित नाना साहेब पानसे स्मृति गुरु पूर्णिमा संगीत समारोह की प्रातःकालीन संगीत सभा भारतीय शास्त्रीय संगीत, कथक नृत्य और गुरु-शिष्य परंपरा के अद्भुत संगम की साक्षी बनी। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिष्ठित कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट प्रस्तुतियों से उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। राग मेघ की मधुर स्वर लहरियों, कथक की सशक्त अभिव्यक्ति और भक्ति संगीत की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा से भर दिया।
यह प्रतिष्ठित आयोजन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत एवं कला अकादमी, मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा जिला प्रशासन दमोह एवं उत्थान साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था के सहयोग से आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य और गुरु-शिष्य परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ नई पीढ़ी को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना रहा।
भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित आयोजन
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इसी पावन अवसर पर आयोजित इस संगीत समारोह ने भारतीय कला, संगीत और नृत्य की परंपराओं को एक भव्य मंच प्रदान किया।
कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत, कथक नृत्य और भक्ति संगीत के माध्यम से कलाकारों ने भारतीय संस्कृति की विविधता और आध्यात्मिकता का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया। उपस्थित संगीत प्रेमियों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।
शिव रुद्राष्टकम से हुआ समारोह का मंगलमय शुभारंभ
प्रातःकालीन संगीत सभा की शुरुआत ग्वालियर की युवा कथक कलाकार हृदयांशी केतकर की प्रभावशाली प्रस्तुति से हुई।
उन्होंने भगवान शिव को समर्पित शिव रुद्राष्टकम की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कथक की मुद्राओं, भाव-भंगिमाओं और लयबद्ध पद संचालन के माध्यम से उन्होंने भगवान शिव की महिमा को जीवंत कर दिया।
शिव वंदना के दौरान पूरा सभागार आध्यात्मिक वातावरण में डूब गया और दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति की मुक्त कंठ से सराहना की।
जयपुर घराने की कथक शैली ने बिखेरा आकर्षण
शिव वंदना के बाद हृदयांशी केतकर ने जयपुर घराने की पारंपरिक कथक शैली का शानदार प्रदर्शन किया।
उन्होंने आमद, उठान, तोड़े, परण, कवित्त और तिहाइयों जैसी कथक की जटिल एवं पारंपरिक शैलियों को अत्यंत सहजता और उत्कृष्ट तकनीकी कौशल के साथ प्रस्तुत किया।
उनकी प्रस्तुति में लय, ताल, भाव और अभिनय का अद्भुत संतुलन दिखाई दिया। दर्शकों ने प्रत्येक प्रस्तुति के बाद तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का समापन उन्होंने एक पारंपरिक ठुमरी पर भावपूर्ण कथक नृत्य प्रस्तुत कर किया, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
राग मेघ की मधुर स्वर लहरियों से गूंजा सभागार
इसके बाद भोपाल की प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका श्रद्धा जैन ने अपनी सुरमयी प्रस्तुति से कार्यक्रम को नई ऊंचाई प्रदान की।
वर्षा ऋतु के अनुरूप उन्होंने राग मेघ में बड़ा खयाल और छोटा खयाल प्रस्तुत किया। उनकी मधुर एवं गंभीर गायकी ने श्रोताओं को भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहराई का अनुभव कराया।
राग मेघ की प्रस्तुति के दौरान सभागार पूरी तरह शांत रहा और संगीत प्रेमी कलाकार की प्रत्येक बंदिश का आनंद लेते दिखाई दिए।
तराना और भजन ने बांधा भक्तिमय वातावरण
राग मेघ की प्रस्तुति के बाद श्रद्धा जैन ने एक आकर्षक तराना प्रस्तुत किया, जिसमें उनकी लयकारी और स्वर साधना स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
इसके पश्चात उन्होंने प्रसिद्ध भजन “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
भजन की प्रस्तुति के दौरान अनेक श्रोता स्वयं भी सुरों के साथ गुनगुनाते नजर आए। कलाकार की भावपूर्ण अभिव्यक्ति ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कराया।
तबले पर मनोज पाटीदार की प्रभावशाली संगत
श्रद्धा जैन की गायकी के साथ मनोज पाटीदार ने तबले पर शानदार संगत प्रस्तुत की।
उनकी सधी हुई ताल, संतुलित लय और शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ ने पूरी प्रस्तुति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया।
श्रोताओं ने गायन और तबला वादन की इस सुंदर जुगलबंदी की भी खूब सराहना की।
समूह कथक प्रस्तुति बनी आकर्षण का केंद्र

प्रातःकालीन सत्र का अंतिम और सबसे आकर्षक कार्यक्रम भोपाल के चक्रधर नृत्य केंद्र की समूह कथक प्रस्तुति रही।
गुरु अल्पना वाजपेयी के निर्देशन में कलाकारों ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य की विविध शैलियों को मंच पर जीवंत कर दिया।
समूह ने गुरु वंदना से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की और उसके बाद रायगढ़ घराने की प्रसिद्ध बंदिशों, शुद्ध कथक, ठुमरी तथा राग मेघ पर आधारित मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किए।
सभी कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति में अनुशासन, तालमेल और भावाभिव्यक्ति का अद्भुत संगम दिखाई दिया।
संगीत और नृत्य का बेहतरीन समन्वय
समूह कथक प्रस्तुति के दौरान संगीत और नृत्य का शानदार समन्वय देखने को मिला।
सितार पर अनिरुद्ध जोशी, तबले पर अभिजीत गढ़ेकर, गायन में मुनि मालवीय तथा पढ़ंत में गुरु अल्पना वाजपेयी ने अपनी प्रभावशाली संगत से प्रस्तुति को और अधिक जीवंत बना दिया।
प्रत्येक कलाकार ने अपनी कला के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय परंपरा की समृद्धि को मंच पर साकार किया।
गुरु-शिष्य परंपरा को मिला सम्मान
पूरे समारोह का मूल उद्देश्य भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान करना था।
कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने अपने गुरुओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य की परंपरा गुरु के मार्गदर्शन से ही आगे बढ़ती है।
गुरु पूर्णिमा जैसे अवसर पर आयोजित इस समारोह ने यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति की आत्मा गुरु-शिष्य संबंधों में निहित है और इन्हीं मूल्यों के संरक्षण से हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकती है।
भारतीय शास्त्रीय कला के संरक्षण का प्रभावी प्रयास

आयोजकों ने बताया कि इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आज के आधुनिक दौर में जहां पाश्चात्य संगीत और मनोरंजन के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं, वहीं ऐसे सांस्कृतिक समारोह युवाओं को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि शास्त्रीय संगीत और कथक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, आध्यात्मिकता और अनुशासन की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
दर्शकों ने कलाकारों का किया जोरदार स्वागत
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी, कलाकार, विद्यार्थी, संस्कृति प्रेमी और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।
हर प्रस्तुति के बाद दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। कई दर्शकों ने इसे भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य का अविस्मरणीय अनुभव बताया।
संस्कृति संरक्षण का प्रेरणादायी संदेश
गुरु पूर्णिमा संगीत समारोह की यह प्रातःकालीन सभा केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि भारतीय कला, संगीत, नृत्य और आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण का सशक्त माध्यम बनकर सामने आई।
राग मेघ की मधुरता, कथक की गरिमा, शिव वंदना की आध्यात्मिक अनुभूति और भक्ति संगीत की भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने इस आयोजन को यादगार बना दिया।
132वें मृदंगाचार्य पंडित नाना साहेब पानसे स्मृति गुरु पूर्णिमा संगीत समारोह ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य आज भी लोगों के हृदय में उतनी ही गहरी आस्था और सम्मान के साथ जीवित हैं। यह आयोजन न केवल कलाकारों के लिए अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करने का मंच बना, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समझने और अपनाने की प्रेरणा भी बन गया।
