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25 जुलाई को देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का होगा शुभारंभ, 20 नवंबर तक विवाह सहित मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम

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Published On: 23 July 2026
Devotees offer prayers to Lord Vishnu on Devshayani Ekadashi, marking the beginning of Chaturmas and four months of spiritual observance
— Devotees offer prayers to Lord Vishnu on Devshayani Ekadashi, marking the beginning of Chaturmas and four months of spiritual observance

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25 जुलाई को देवशयनी एकादशी: चातुर्मास का होगा शुभारंभ, 20 नवंबर तक विवाह सहित मांगलिक कार्यों पर रहेगा विराम

संवाददाता: मनोज जैन नायक
मुरैना।
सनातन धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी का व्रत शनिवार, 25 जुलाई को रखा जाएगा। इसी दिन से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करेंगे और आगामी चार माह तक चलने वाला चातुर्मास प्रारंभ होगा। चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत, नवीन भवन निर्माण जैसे अधिकांश मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। यह अवधि 20 नवंबर 2026 को आने वाली देवोत्थान (देवउठनी) एकादशी तक चलेगी।

ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने बताया कि चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना, तप, दान, स्वाध्याय और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु की आराधना कर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संकल्प लेते हैं।

25 जुलाई को मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी

ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन के अनुसार इस वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जुलाई (शुक्रवार) सुबह 9:13 बजे होगा और इसका समापन 25 जुलाई (शनिवार) सुबह 11:34 बजे होगा।

चूंकि एकादशी तिथि का उदयकाल 25 जुलाई को प्राप्त हो रहा है, इसलिए शास्त्रों के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को रखा जाएगा।

उदयातिथि के आधार पर व्रत एवं पूजा का विधान किया जाएगा।

क्या है देवशयनी एकादशी?

सनातन धर्म में आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी, हरिशयनी एकादशी तथा पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्री विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। भगवान के इस दिव्य विश्राम काल को ही चातुर्मास की शुरुआत माना जाता है।

चार माह तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन जागृत होते हैं।

20 नवंबर को होगी देवोत्थान एकादशी

चार माह बाद 20 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागृत होंगे।

इसी कारण इस एकादशी को—

  • देवोत्थान एकादशी
  • देवउठनी एकादशी
  • प्रबोधिनी एकादशी

के नाम से जाना जाता है।

देवोत्थान एकादशी के साथ ही पुनः विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है।

क्या होता है चातुर्मास?

ol.huiklotguikfgtदेवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक के लगभग चार माह के समय को चातुर्मास कहा जाता है।

सनातन परंपरा में इसे अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक साधना का काल माना गया है।

इस अवधि में व्यक्ति को—

  • संयमित जीवन
  • सात्विक भोजन
  • ईश्वर भक्ति
  • जप
  • तप
  • ध्यान
  • स्वाध्याय
  • सेवा
  • दान

जैसे पुण्य कार्यों में अधिक समय देना चाहिए।

धर्मग्रंथों के अनुसार चातुर्मास में किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

मांगलिक कार्यों पर क्यों लगता है विराम?

धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब विवाह और अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते।

इसी कारण देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थान एकादशी तक सामान्यतः निम्नलिखित मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है—

  • विवाह
  • गृह प्रवेश
  • नए भवन का शुभारंभ
  • देव प्रतिष्ठा
  • यज्ञोपवीत संस्कार
  • बड़े धार्मिक एवं पारिवारिक शुभ संस्कार

हालांकि विशेष परिस्थितियों में विद्वान आचार्यों के मार्गदर्शन में अपवाद संभव हो सकते हैं।

साधना और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ अवसर

ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन के अनुसार चातुर्मास का उद्देश्य केवल मांगलिक कार्यों का निषेध नहीं है।

इस अवधि का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को बाहरी भौतिक जीवन से कुछ समय निकालकर आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करना है।

चार माह तक व्यक्ति अपने आचरण, विचार और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।

वर्षा ऋतु से भी जुड़ी है परंपरा

चातुर्मास का संबंध केवल धार्मिक मान्यताओं से ही नहीं बल्कि भारतीय जीवन शैली और प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है।

वर्षा ऋतु में अधिक भ्रमण करने से छोटे-छोटे जीव-जंतुओं की हिंसा होने की संभावना रहती है।

इसी कारण प्राचीनकाल से साधु-संत वर्षा ऋतु में एक स्थान पर ही निवास करते हैं।

इस अवधि में वे समाज को धर्मोपदेश देते हैं और श्रद्धालुओं को संयम, सेवा तथा आध्यात्मिक जीवन का संदेश देते हैं।

साधु-संतों के प्रवचन से मिलता है धर्मलाभ

चातुर्मास के दौरान देशभर में विभिन्न स्थानों पर साधु-संतों के प्रवचन, कथा, भागवत, रामायण, गीता, जैन धर्मोपदेश, सत्संग एवं धार्मिक आयोजन होते हैं।

श्रद्धालु बड़ी संख्या में इन कार्यक्रमों में भाग लेकर धर्म लाभ प्राप्त करते हैं।

इस दौरान अनेक लोग विशेष व्रत, उपवास और नियम भी धारण करते हैं।

इन कार्यों का विशेष महत्व

चातुर्मास में निम्न धार्मिक कार्य अत्यंत पुण्यदायक माने गए हैं—

  • भगवान विष्णु की पूजा
  • तुलसी पूजन
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ
  • गीता पाठ
  • जप एवं ध्यान
  • दान-पुण्य
  • गौ सेवा
  • संत सेवा
  • सत्संग
  • व्रत एवं उपवास
  • धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन
  • गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता

भगवान विष्णु की आराधना से मिलता है विशेष फल

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास में भगवान विष्णु की भक्ति करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

श्रद्धालु इस दौरान श्रीहरि विष्णु, माता लक्ष्मी एवं तुलसी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

ऐसा माना जाता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया जप, तप और दान कई गुना अधिक फल प्रदान करता है।

आत्मसंयम का संदेश देता है चातुर्मास

डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने कहा कि वर्तमान समय की भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवनशैली में चातुर्मास आत्मसंयम और अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

यह अवधि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण, सात्विक जीवनशैली अपनाने और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है।

समाज में बढ़ती है धार्मिक चेतना

देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रहता।

इस दौरान मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं में—

  • कथा
  • प्रवचन
  • भजन-कीर्तन
  • सामूहिक पूजा
  • धार्मिक शिविर
  • सेवा कार्य
  • दान अभियान

जैसे अनेक आयोजन किए जाते हैं।

इससे समाज में धार्मिक चेतना, नैतिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।

श्रद्धालुओं से की गई विशेष अपील

ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद हिमांशु जैन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे देवशयनी एकादशी के अवसर पर श्रद्धा एवं विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें और चातुर्मास के दौरान धर्म, दान, सेवा, स्वाध्याय तथा आत्मसंयम को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।

उन्होंने कहा कि यह चार माह केवल धार्मिक परंपरा निभाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने, मन को निर्मल करने और ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को मजबूत करने का सुनहरा अवसर है।

 

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