दिगंबर Jain मंदिर क्लर्क कॉलोनी में भगवान नेमीनाथ का निर्वाण लाडू चढ़ाया गया
आचार्य 108 सुनील सागर जी महाराज के ससंघ आशीर्वाद से श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ धार्मिक आयोजन
क्लर्क कॉलोनी स्थित दिगंबर Jain मंदिर में आषाढ़ शुक्ल सप्तमी के पावन अवसर पर भगवान श्री 1008 नेमीनाथ भगवान का निर्वाण लाडू चढ़ाने का भव्य धार्मिक आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ संपन्न हुआ। चतुर्थ पट्टाचार्य 108 आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के ससंघ पावन आशीर्वाद से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
भगवान नेमीनाथ के निर्वाण दिवस के अवसर पर मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्तों का आगमन शुरू हो गया था। श्रद्धालुओं ने भगवान की आराधना करते हुए धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। पूरे मंदिर परिसर को आकर्षक रूप से सजाया गया था और वातावरण भक्ति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर दिखाई दे रहा था।
अभिषेक और शांतिधारा से हुआ धार्मिक कार्यक्रम का शुभारंभ
धार्मिक आयोजन की शुरुआत प्रातःकाल भगवान श्री नेमीनाथ भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा के साथ हुई। विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालुओं ने भगवान का जलाभिषेक कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
इसके बाद देव, शास्त्र और गुरु की पूजा-अर्चना की गई। जैन परंपरा के अनुसार श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ पूजा विधान में भाग लिया। मंदिर में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में नमन कर धर्म और संयम के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
निर्वाण कांड पाठ के बाद चढ़ाया गया निर्वाण लाडू
भगवान नेमीनाथ की विशेष पूजा के उपरांत निर्वाण कांड का पाठ किया गया। जैन धर्म में तीर्थंकरों के निर्वाण दिवस पर निर्वाण लाडू चढ़ाने की विशेष परंपरा है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए श्रद्धालुओं ने भगवान नेमीनाथ को श्रद्धापूर्वक निर्वाण लाडू अर्पित किया।
निर्वाण लाडू चढ़ाने के समय मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने भगवान नेमीनाथ के जयकारे लगाए और धार्मिक उत्साह के साथ इस पवित्र आयोजन में सहभागिता की।

संगीतमय आरती में झूमे श्रद्धालु
निर्वाण लाडू अर्पण के पश्चात भगवान नेमीनाथ की भव्य आरती की गई। आरती के दौरान बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। संगीत की मधुर धुनों और भक्ति गीतों के बीच श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर आरती की।
कई श्रद्धालु भक्ति भाव में लीन होकर नृत्य करते हुए नजर आए। मंदिर परिसर में जयकारों और धार्मिक भजनों से आध्यात्मिक माहौल बना रहा। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने भी उत्साहपूर्वक आयोजन में भाग लिया।
भगवान नेमीनाथ का धार्मिक महत्व
मीडिया प्रभारी प्रवीण जैन ने बताया कि भगवान श्री नेमीनाथ जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर हैं। भगवान नेमीनाथ का चिन्ह शंख है। जैन धर्म में उनका विशेष स्थान है और उनके जीवन से त्याग, तपस्या और अहिंसा का संदेश मिलता है।
मान्यता के अनुसार भगवान नेमीनाथ ने गुजरात के जूनागढ़ स्थित पवित्र गिरनार पर्वत पर मोक्ष प्राप्त किया था। उनके साथ शम्भव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध सहित अनेक साधकों ने भी मोक्ष मार्ग प्राप्त किया। गिरनार पर्वत जैन समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र माना जाता है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं।
धर्म और संस्कारों को बढ़ावा देने का माध्यम बने आयोजन
जैन समाज में इस प्रकार के धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि समाज में धर्म, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम भी बनते हैं। भगवान के जीवन चरित्र और उनके उपदेशों से प्रेरणा लेकर श्रद्धालु अहिंसा, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
निर्वाण लाडू जैसे धार्मिक कार्यक्रम नई पीढ़ी को भी जैन संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करते हैं। बच्चों और युवाओं की सहभागिता से धार्मिक संस्कारों का संरक्षण और प्रचार-प्रसार होता है।
समाजजनों ने लिया धर्म लाभ
इस पावन अवसर पर सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद गोधा, कार्याध्यक्ष नवीन गोधा, एमके जैन, दिलीप बज, संजय जैन, मनीष जैन, विदर्भ जैन, एसके सोगानी, महेंद्र सिंघई, दिलीप अजमेरा सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
सभी श्रद्धालुओं ने भगवान नेमीनाथ की पूजा-अर्चना कर धर्म लाभ प्राप्त किया। उपस्थित समाजजनों ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे धार्मिक कार्यक्रम समाज में एकता, संस्कार और आध्यात्मिक भावना को मजबूत करते हैं।
श्रद्धा और आस्था के साथ हुआ समापन
धार्मिक आयोजन का समापन भक्तिभाव और उत्साह के साथ हुआ। पूरे दिन मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही और वातावरण धार्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत रहा।
भगवान नेमीनाथ के निर्वाण दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम समाजजनों के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का केंद्र बना। श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में नमन करते हुए जीवन में संयम, अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
