थांदला में 17 वर्षों बाद दिगम्बर संतों का ऐतिहासिक मंगल प्रवेश हुआ। आचार्य 108 श्री कुशाग्रनन्दी जी महाराज, 104 वर्षीय अजयऋषि जी महाराज एवं आर्यिका संघ के भव्य स्वागत, धर्मसभा और चातुर्मास संदेश की पूरी खबर पढ़ें।
17 वर्षों बाद थांदला में दिगम्बर संतों का मंगल प्रवेश
थांदला में दिगम्बर संतों का मंगल प्रवेश रविवार को पूरे नगर के लिए ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उल्लास का अवसर बन गया। लगभग 17 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद नगर में दिगम्बर जैन संतों का मंगल प्रवेश हुआ, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़े। पूरा नगर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर दिखाई दिया।
आचार्य 108 श्री कुशाग्रनन्दी जी महाराज के नेतृत्व में संघ ने कुशलगढ़ रोड से नगर में प्रवेश किया। उनके साथ 104 वर्षीय तपस्वी संत 108 श्री अजयऋषि जी महाराज, गणिनी आर्यिका जिनवाणी माताजी, गणिनी आर्यिका कीर्तिवाणी माताजी, छुल्लिका विनम्रज्योति माताजी, अचलज्योति माताजी, पुण्यभारती माताजी, स्वस्ति डॉ. पद्मकीर्ति स्वामीजी, ब्रह्मचारिणी आराधना दीदी एवं अमृतप्रिया दीदी सहित पूरा संघ उपस्थित रहा।
भव्य शोभायात्रा ने बनाया भक्तिमय माहौल
थांदला में दिगम्बर संतों का मंगल प्रवेश नगर के इतिहास में एक अविस्मरणीय क्षण बन गया। श्रद्धालु एक जैसी पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए। बैंड-बाजों की मधुर धार्मिक धुनों, जय-जयकार और गुलाब के फूलों की वर्षा के बीच संत संघ का स्वागत किया गया।
“जय गुरुदेव” और “नमोस्तु गुरुदेव” के गगनभेदी उद्घोष पूरे नगर में गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने पूरे मार्ग पर संत संघ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
धर्मसभा में आचार्य श्री का प्रेरक संदेश
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य 108 श्री कुशाग्रनन्दी जी महाराज ने कहा कि—
“अनायास ही बहती गंगा थांदला आ गई है। अब सभी को धर्म रूपी इस गंगा में डुबकी लगाकर अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि पहले वे समाज के आग्रह पर थांदला आए हैं, अब समाज को उनके बताए मार्ग पर चलना होगा। धर्म, संयम और सदाचार को अपनाकर ही जीवन के दुखों का अंत संभव है।
आचार्य श्री ने चातुर्मास की महत्ता बताते हुए कहा कि प्रारंभ में संतों की पहचान होती है, लेकिन चातुर्मास के अंत में समाज की पहचान होती है कि उसने संतों के सान्निध्य का कितना लाभ लिया।
संघ अध्यक्ष ने बताया थांदला की गौरवशाली परंपरा
संघ अध्यक्ष अरुण कोठारी ने स्वागत भाषण में कहा कि थांदला संतों की तपोभूमि रही है। यहां से अनेक संत और साध्वियों ने दीक्षा ग्रहण कर जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया है। इसी कारण थांदला को “संत नगरी” कहा जाता है।
उन्होंने आचार्य श्री सहित पूरे संत संघ के नगर आगमन पर सकल जैन समाज की ओर से कृतज्ञता व्यक्त की।
संचालन एवं श्रद्धालुओं की सहभागिता
कार्यक्रम का संचालन संघ पदाधिकारी संजय कोठारी एवं महिला मंडल अध्यक्षा अरुणा मेहता ने संयुक्त रूप से किया।
इस अवसर पर वरिष्ठ समाजजन कांतिलाल मेहता, राजेन्द्र पिंडरमा, इन्द्रवर्धन मेहता, अनूप मिंडा, विजय भीमावत, पारस मेहता, देवेन्द्र मेहता, दीपक पिंडरमा एवं शशिकांत बोबड़ा सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं, युवा और बच्चों ने उपस्थित होकर संतों के दर्शन किए तथा सेवा-सुश्रुषा का सौभाग्य प्राप्त किया।
चातुर्मास के दौरान होंगे धार्मिक आयोजन
आचार्य श्री के सान्निध्य में आगामी दिनों में चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन प्रवचन, स्वाध्याय, पूजा, ध्यान, संस्कार शिविर तथा विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।
निष्कर्ष
थांदला में दिगम्बर संतों का मंगल प्रवेश केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि नगर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का ऐतिहासिक क्षण है। 17 वर्षों बाद हुए इस मंगल प्रवेश ने पूरे नगर को धर्म, संयम, सद्भाव और आत्मकल्याण का संदेश दिया। श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि वे पूरे चातुर्मास में आचार्य श्री के प्रवचनों से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को धर्ममय बनाएंगे।


