विजयमुनिजी म.सा. नागदा प्रवचन में धर्म, पुण्य, विवेक और सन्मार्ग पर चलने का प्रेरणादायक संदेश दिया। उपप्रवर्तक चंद्रेश मुनिजी ने विवेकपूर्ण जीवन का महत्व बताया। पढ़ें पूरी खबर।
ऐसा पाप मत बढ़ाओ कि लोग आपको देखकर मुंह मोड़ें – विजयमुनिजी म.सा. का नागदा में प्रेरणादायक संदेश
रिपोर्टर : नितिन बुड़ावनवाला (मीडिया प्रभारी), नागदा
नागदा।
विजयमुनिजी म.सा. नागदा प्रवचन के दौरान श्रमणसंघीय जैन दिवाकर संघ के प्रवर्तक श्री विजय मुनिजी म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सन्मार्ग अपनाना चाहिए और कुमार्ग का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को सम्यक ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब उसके जीवन में सही मार्ग स्वतः खुल जाता है।
उन्होंने कहा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति सुख, समृद्धि और शांति चाहता है, जबकि कोई भी दुख और विपत्ति नहीं चाहता। धर्म से जुड़ना भी पुण्य के उदय का परिणाम होता है। जिस आत्मा में पुण्य का उदय होता है, वही धर्म के प्रति आकर्षित होती है।
पुण्य ऐसा बढ़ाओ कि लोग देखकर प्रसन्न हों
विजयमुनिजी म.सा. नागदा प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसा पुण्य अर्जित करें कि जो भी व्यक्ति आपको देखे या आपसे मिले, उसके मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न हो जाए। वहीं ऐसा पाप कभी न करें कि लोग आपको देखते ही अपना मुंह मोड़ लें।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का व्यवहार, उसके संस्कार और शुभ भावना ही उसकी सबसे बड़ी पहचान होते हैं। अच्छे कार्य करने वाला व्यक्ति समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इसलिए हर व्यक्ति को ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे उसका परिवार, समाज और संघ गौरवान्वित हो।
संसार की वाणी और वीतराग वाणी में अंतर
धर्मसभा में पूज्य उपप्रवर्तक चंद्रेश मुनिजी ने अपने प्रवचन में कहा कि संसार की वाणी और वीतराग की वाणी में बहुत बड़ा अंतर है।
उन्होंने कहा कि संसार की वाणी मनुष्य को संसार में और अधिक बांधती है, जबकि वीतरागों की वाणी मनुष्य के संसार को कम करती है और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाती है।
उन्होंने विवेक को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण गुण बताते हुए कहा कि विवेकशील व्यक्ति ही धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है। जो व्यक्ति प्रत्येक निर्णय विवेकपूर्वक लेता है, वही जीवन में सफल होता है।
धर्म से कमाया धन ही वास्तविक लाभ
उपप्रवर्तक चंद्रेश मुनिजी ने कहा कि प्रत्येक व्यापारी अपने व्यापार में लाभ चाहता है, कोई भी घाटा पसंद नहीं करता।
उसी प्रकार यदि धन धर्म, ईमानदारी और सत्य के मार्ग पर चलकर कमाया जाए तो वह वास्तविक लाभ देता है तथा जीवन में सुख, शांति और संतोष लाता है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य सन्मार्ग पर चलना शुरू कर देता है तो कुमार्ग स्वतः समाप्त होने लगता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
धर्मसभा में समाज के अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। इनमें चंदनमल संघवी, सुरेन्द्र पितलिया, निर्मल चपलोत, विनोद राठौर, रमेश तरवेचा, अजीत मारू, दिलीप काठेड़, नरेश ओरा, वर्द्धमान धोका, सुभाष छोरिया, अमरचंद जैन, संजय मुरडिया, श्रेणिक बम, अभय चपलोत, मुकेश धोका, नवीन तरवेचा, जितेश भंडारी, राजा कर्नावट, पारस पोखरना, सुशील काठेड़, हितेश काठेड़ सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ प्राप्त किया।
प्रभावना एवं तपस्या का अनुमोदन
प्रवचन के पश्चात प्रभावना का लाभ शिवानी सकलेचा के उपासना सिद्धितप की उग्र तपस्या के अनुमोदनार्थ संगीता एवं सुनील सकलेचा परिवार द्वारा लिया गया।
कार्यक्रम का सफल संचालन राजेंद्र काठेड़ ने किया जबकि आभार स्थानकवासी जैन श्री संघ के अध्यक्ष सतीश जैन सांवेर वाला ने व्यक्त किया।
निष्कर्ष
विजयमुनिजी म.सा. नागदा प्रवचन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि मनुष्य का वास्तविक धन उसका सदाचार, विवेक और पुण्य है। जीवन में सन्मार्ग अपनाकर, शुभ भावनाओं के साथ कार्य करते हुए और धर्म के अनुसार आचरण करके ही समाज में सम्मान प्राप्त किया जा सकता है। उनके प्रेरणादायक विचारों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
