*मित्रता : जीवन-नौका की सबसे विश्वसनीय पतवार*
जो टोकता है, रोकता है, वही सच्चा मित्र कहलाता है
(मनोज जैन नायक, मुरैना की कलम से)
मुरैना (मनोज जैन नायक) मनुष्य का जीवन एक अथाह समुद्र के समान है। इस समुद्र में कभी शांत लहरें होती हैं तो कभी प्रचंड तूफान। जब चारों ओर संकट का अंधकार छा जाता है, तब समुद्र के बीच छोटी-सी नाव ही जीवन की सबसे बड़ी आशा बन जाती है। वह आकार में भले ही छोटी हो, परंतु उसी के सहारे मनुष्य सुरक्षित तट तक पहुँचता है। ठीक इसी प्रकार जीवन-यात्रा में मित्रता वह नौका है, जो हमें संघर्षों, विपत्तियों और निराशा के तूफानों से निकालकर सफलता और सुख के किनारे तक पहुँचाती है।
मित्र केवल साथ चलने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन का पथ-प्रदर्शक, प्रेरक और सच्चा शुभचिंतक होता है। एक योग्य मित्र मनुष्य को शिखर तक पहुँचा सकता है, जबकि कुसंगति उसे पतन के गर्त में भी धकेल सकती है। इसलिए कहा गया है कि यदि किसी व्यक्ति के चरित्र को पहचानना हो, तो उसके मित्रों को देख लेना पर्याप्त है। मनुष्य की संगति ही उसके व्यक्तित्व, विचार और भविष्य का निर्माण करती है।
अति समझदार लोग अक्सर ज़िंदगी में मित्रता को ‘बैलेंस शीट की तरह देखते हैं- कितना दिया, कितना मिला, कितना सही है, कितना गलत। लेकिन मित्रता कोई हिसाब-किताब नहीं है, यह तो एक नशा है। जहाँ दिमाग सवाल पूछता है, वहाँ मित्रता मौन हो जाती है। मित्रता में तर्क हार मान लेता है और दिल अपनी मनमानी करने लगता है। एक समझदार इंसान मित्रता में भी सुरक्षा ढूंढता है, जबकि एक ‘पागल’ मित्र बस खुद को समर्पित कर देता है । मित्रता कोई परीक्षा नहीं है जिसे बुद्धि के सहारे पास किया जाए; यह तो एक अनुभव है जिसे दिल की मासूमियत से जीया जाता है।
अगर मित्रता में थोड़ा ‘पागलपन’ और थोड़ी ‘नादानी’ नहीं है, तो वह एक सुंदर समझौता तो हो सकता है, लेकिन मित्रता नहीं।
मित्रता का अर्थ केवल स्वतंत्रता देना नहीं, बल्कि परवाह करना भी है। यदि कोई आपको हर बात पर खुली छूट दे देता है और आपको रोकता टोकता नहीं तो समझ लो वो आपका हमदर्द अथवा मित्र नहीं हैं । सच्ची मित्रता करने वाला व्यक्ति आपके प्रति समर्पित होता है, इसलिए वह आपको गलत राह पर जाने से रोकता भी है और टोकता भी है।
मित्रता में हक जताना, छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी दिखाना और कभी-कभी शक करना-ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि आप उनके लिए कितने महत्वपूर्ण हैं । जिसे आपकी फिक्र होती है, वह आपकी हर हरकत पर ध्यान रखता है ताकि आप सुरक्षित रहें और सही निर्णय ले सकें।
*भारतीय साहित्य* में मित्रता को सदैव अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त हुआ है। संस्कृत के महान *नीतिकार महाकवि भर्तृहरि* ने *नीतिशतक* में सच्चे मित्र के स्वरूप का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है। उनके अनुसार वही मित्र सच्चा है जो सुख-दुःख दोनों में समान रूप से साथ निभाए, हितकारी परामर्श दे, संकट में सहायता करे, मित्र के दोषों को ढककर उसके गुणों को प्रोत्साहित करे। भर्तृहरि यह भी स्पष्ट करते हैं कि स्वार्थी और दुष्ट व्यक्ति से मित्रता अंततः दुःख और विनाश का कारण बनती है। अतः मित्र का चयन सदैव विवेकपूर्वक करना चाहिए।
*गोस्वामी तुलसीदास* ने *रामचरितमानस* में मित्रता को संवेदना और समर्पण का नाम दिया है। उनके अनुसार सच्चा मित्र वही है जो मित्र के दुःख को अपना दुःख समझे और विपत्ति के समय कभी साथ न छोड़े। संकट की घड़ी ही मित्रता की वास्तविक कसौटी होती है।
*संत कबीरदास* ने सत्संग और श्रेष्ठ मित्रों के महत्व पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि अच्छी संगति मनुष्य को ऊँचे आदर्शों तक ले जाती है, जबकि बुरी संगति उसके जीवन का पतन कर देती है। इसलिए मित्रता सदैव सद्गुणों वाले व्यक्तियों से करनी चाहिए।
*अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना (रहीम* ) ने मित्रता में प्रेम, विश्वास और मर्यादा को अनिवार्य बताया। उनका प्रसिद्ध दोहा—
” *रहिमन धागा प्रेम का,* *मत तोड़ो चटकाय* ।
*टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ* *पड़ जाय॥”*
यह संदेश देता है कि मित्रता का संबंध अत्यंत कोमल होता है। एक बार विश्वास टूट जाए तो संबंध फिर जुड़ भी जाए, पर उसकी सहजता और मधुरता पहले जैसी नहीं रहती।
*महाकवि कालिदास* की रचनाओं में भी मित्रता विश्वास, सहयोग और आत्मीयता की आधारशिला के रूप में चित्रित हुई है। उनके पात्र यह सिद्ध करते हैं कि सच्चा मित्र केवल सुख का सहभागी नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक संघर्ष का सहयात्री होता है।
*आचार्य श्री विद्यासागर जी* *महाराज ने मित्रता को* आत्म-विकास का माध्यम माना है।
उनके अनुसार मित्र वह नहीं जो केवल हमारी प्रशंसा करे, बल्कि वह है जो हमारी कमियों का साहसपूर्वक बोध कराए, बुराइयों से दूर रखे, संयम और सदाचार की प्रेरणा दे तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाए।
जो मित्र सत्य कहने का साहस रखता है और कठिन समय में भी साथ नहीं छोड़ता, वही वास्तविक मित्र कहलाने योग्य है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि मित्रता केवल एक सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि जीवन का अमूल्य धन है। सच्चा मित्र ईश्वर का दिया हुआ ऐसा उपहार है, जो निराशा में आशा, अंधकार में प्रकाश और संघर्ष में संबल बन जाता है। इसलिए मित्र चुनते समय केवल व्यवहार नहीं, बल्कि उसके चरित्र, संस्कार और विचारों को भी परखना चाहिए। श्रेष्ठ मित्रता मनुष्य के जीवन को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई ऊँचाइयाँ प्रदान करती है।
*लेखक -*
मनोज जैन नायक
(स्वतंत्र पत्रकार) मुरैना
