गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों के निर्माण और विपणन से गौशालाओं की आय बढ़ाने पर दमोह के तेंदूखेड़ा में जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित हुई। जानिए राज्यमंत्री श्री पटेल और श्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने आत्मनिर्भर गौशालाओं को लेकर क्या कहा।
गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद: गौशालाओं की आय बढ़ाने की दिशा में दमोह में बड़ी पहल
गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद: गौशालाओं की आय बढ़ाने की दिशा में दमोह में बड़ी पहल
रिपोर्टर सोनू अठया दमोह मध्य प्रदेश
दमोह। गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों के निर्माण और विपणन के माध्यम से गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार लगातार प्रयास कर रही है। इसी उद्देश्य से दमोह जिले के तेंदूखेड़ा स्थित दयोदय गौशाला में जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम में राज्यमंत्री श्री पटेल एवं राज्यमंत्री श्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने गौशाला संचालकों, किसानों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों के उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देने का आह्वान किया।
दमोह के तेंदूखेड़ा में आयोजित हुई जिला स्तरीय कार्यशाला
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य गौशालाओं को केवल सरकारी सहायता पर निर्भर रखने के बजाय उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना था। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों का वैज्ञानिक तरीके से निर्माण किया जाए और उनकी प्रभावी मार्केटिंग हो तो गौशालाएं स्वयं अपनी आय बढ़ा सकती हैं।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गौशाला संचालकों, किसानों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया।
राज्यमंत्री श्री पटेल ने बताया आत्मनिर्भरता का रास्ता
राज्यमंत्री श्री पटेल ने कहा कि गौशालाओं में उपलब्ध गोबर का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट, जैविक खाद और अन्य कृषि उत्पादों के निर्माण में किया जा सकता है। वहीं गोमूत्र से फिनाइल, जैविक कीटनाशक, ग्रोथ प्रमोटर तथा अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि इन गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी और उनका उचित विपणन किया जाएगा तो गौशालाओं की आय कई गुना बढ़ सकती है।
मुख्यमंत्री की योजना से मिल रहा सहयोग
राज्यमंत्री श्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश सरकार प्रत्येक गाय के भरण-पोषण के लिए 1200 रुपये प्रतिमाह उपलब्ध करा रही है।
उन्होंने कहा कि सरकारी सहायता महत्वपूर्ण है लेकिन इसके साथ-साथ गौशालाओं को स्वयं भी आय के स्थायी स्रोत विकसित करने होंगे। गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद इस दिशा में सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों की बढ़ रही है मांग
विशेषज्ञों ने बताया कि आज जैविक खेती का तेजी से विस्तार हो रहा है। ऐसे में निम्न उत्पादों की बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है—
- वर्मी कम्पोस्ट
- जैविक खाद
- गोमूत्र आधारित फिनाइल
- जैविक कीटनाशक
- पौधों के लिए ग्रोथ प्रमोटर
- पंचगव्य उत्पाद
- प्राकृतिक कृषि में उपयोग होने वाले जैविक घोल
इन गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों की बिक्री से गौशालाओं को नियमित आय प्राप्त हो सकती है।
किसानों को भी मिलेगा बड़ा लाभ
विशेषज्ञों ने बताया कि जैविक खाद और गोमूत्र आधारित उत्पादों के उपयोग से—
- मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।
- रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होती है।
- खेती की लागत घटती है।
- उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर होती है।
- पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
इसी कारण गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी दिया गया जोर
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने बताया कि केवल उत्पाद बनाना ही पर्याप्त नहीं है।यदि गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद अच्छी पैकेजिंग, आकर्षक ब्रांडिंग और ऑनलाइन-ऑफलाइन मार्केटिंग के साथ बाजार में उतारे जाएं तो उनकी मांग और कीमत दोनों बढ़ सकती हैं।
स्थानीय रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का कहना है कि इन उत्पादों के निर्माण से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।गौशालाओं में ही उत्पादन इकाइयां स्थापित कर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित किया जा सकता है।
जैविक खेती को मिलेगा नया आयाम
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि आने वाले वर्षों में प्राकृतिक खेती और ऑर्गेनिक कृषि की मांग तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पाद किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगे।
निष्कर्ष
दमोह के तेंदूखेड़ा स्थित दयोदय गौशाला में आयोजित यह जिला स्तरीय कार्यशाला गौशालाओं की आर्थिक मजबूती की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल गौ संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि गोबर व गोमूत्र आधारित उत्पादों के माध्यम से गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाना, किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना भी है।
यदि इन उत्पादों का वैज्ञानिक उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण पैकेजिंग और प्रभावी विपणन किया जाता है तो आने वाले समय में गौशालाएं स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम बन सकती हैं।


