शहरों में जलभराव की समस्या लगातार बढ़ रही है। जानिए कैसे सुनियोजित नगर नियोजन की कमी, नालों की सफाई में भ्रष्टाचार और अव्यवस्थित शहरी विकास लोगों के लिए मुसीबत बन रहे हैं। इंजी. कवि अतिवीर जैन ‘पराग’ का विशेष लेख।
शहरों में जलभराव: भ्रष्टाचार और सुनियोजित नगर नियोजन की कमी बनी बड़ी चुनौती
Focus Keyword: शहरों में जलभराव
देशभर में मानसून की शुरुआत होते ही एक बार फिर शहरों में जलभराव की समस्या सामने आने लगी है। जून माह में लोग बारिश का इंतजार कर रहे थे, लेकिन जुलाई में जैसे ही बारिश शुरू हुई, अधिकांश शहरों की सड़कें, गलियां और बाजार पानी से भर गए। कई स्थानों पर नालियों का गंदा पानी लोगों के घरों और दुकानों तक पहुंच गया, जिससे आम नागरिकों का जनजीवन प्रभावित हो गया।
बारिश शुरू होते ही शहर क्यों डूब जाते हैं?
हर वर्ष मानसून के दौरान लगभग यही स्थिति देखने को मिलती है। थोड़ी सी बारिश होते ही अधिकांश शहरों में सड़कें तालाब बन जाती हैं। गलियों में पानी भर जाता है और लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि शहरों में जलभराव केवल प्राकृतिक समस्या नहीं, बल्कि शहरी प्रबंधन की बड़ी विफलता भी है।
सुनियोजित नगर नियोजन की कमी बनी सबसे बड़ी वजह
सरकार चाहे किसी भी दल की हो, अधिकांश शहरों में नगर नियोजन की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। नई कॉलोनियां बसाई जाती हैं, लेकिन जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं की जाती। परिणामस्वरूप वर्षा का पानी सड़कों और बस्तियों में जमा हो जाता है।यदि शहरों का विकास वैज्ञानिक और सुनियोजित तरीके से किया जाए तो शहरों में जलभराव जैसी समस्या को काफी हद तक रोका जा सकता है।
नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों का भ्रष्टाचार
हर वर्ष मानसून से पहले नगर निगमों द्वारा नालों और नालियों की सफाई का अभियान चलाया जाता है। समाचार पत्रों और सोशल मीडिया पर सफाई के फोटो भी जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिखाई देती है।लेखक का कहना है कि सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दिखाए जाते हैं, जबकि वास्तविक सफाई पर्याप्त नहीं होती। परिणामस्वरूप पहली ही बारिश में नालियां जाम हो जाती हैं और शहरों में जलभराव की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
अतिक्रमण और अव्यवस्थित शहरी विकास
शहरों में जगह-जगह नालों और नालियों पर अतिक्रमण किया जा चुका है। कई व्यापारियों ने नालियों को ढंककर दुकानें बढ़ा ली हैं। फुटपाथों पर ठेले, अस्थायी बाजार और अवैध पार्किंग आम बात हो गई है।इसके कारण—
- जल निकासी बाधित होती है।
- पैदल चलने वालों को परेशानी होती है।
- ट्रैफिक जाम बढ़ता है।
- सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
ट्रैफिक व्यवस्था भी बनी बड़ी चुनौती
लेख में कहा गया है कि अधिकांश शहरों में—
- पर्याप्त फुटओवर ब्रिज नहीं हैं।
- अंडरपास की कमी है।
- सुरक्षित यू-टर्न नहीं बने हैं।
- कई चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल काम नहीं करते।
मजबूरी में लोग गलत दिशा से वाहन निकालते हैं, जिससे जाम की समस्या और बढ़ जाती है।
स्थायी समाधान क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न कदम आवश्यक हैं—
- वैज्ञानिक नगर नियोजन।
- आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम।
- समय पर नालों की सफाई।
- अतिक्रमण हटाने की प्रभावी कार्रवाई।
- ट्रैफिक प्रबंधन में सुधार।
- भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई।
- नागरिकों की सहभागिता।
- वर्षा जल संचयन को बढ़ावा।
यदि इन उपायों को गंभीरता से लागू किया जाए तो शहरों में जलभराव जैसी समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
निष्कर्ष
मानसून हर वर्ष आता है, लेकिन उसके साथ आने वाली समस्याएं अब सामान्य नहीं रह गई हैं। यदि नगर निकाय ईमानदारी से कार्य करें और शहरों का विकास सुनियोजित तरीके से किया जाए, तो नागरिकों को जलभराव, गंदगी और ट्रैफिक जाम जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। लेखक का मानना है कि जब तक भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश नहीं लगेगा और नगर नियोजन को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक शहरों का यह संकट जारी रहेगा।
लेखक
इंजी. कवि अतिवीर जैन ‘पराग’
पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय
कवि | लेखक | व्यंग्यकार | साहित्यकार | स्वतंत्र पत्रकार | स्तंभकार | सामाजिक कार्यकर्ता
संस्थापक अध्यक्ष :
राष्ट्रीय साहित्य परिषद
जैन साहित्य परिषद
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