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चातुर्मास में निःशुल्क भोजन व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता – Manoj Bakliwal

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Published On: 8 July 2026
चातुर्मास में निःशुल्क भोजन व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता - Manoj Bakliwal

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चातुर्मास में निःशुल्क भोजन व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता – Manoj Bakliwal

मुरैना/आगरा (मनोज जैन नायक) चातुर्मास केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक जीवन का एक महत्वपूर्ण पर्व है। विशेष रूप से जब किसी बड़े आचार्यश्री या संघ का चातुर्मास होता है, तब देशभर से हजारों श्रद्धालु, शिष्य, साधर्मी एवं दर्शनार्थी वहां पहुंचते हैं। ऐसे अवसर पर स्थानीय आयोजन समिति के सामने आवास, भोजन, जलपान, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं का विशाल दायित्व होता है।

आगरा के वरिष्ठ समाजसेवी, उद्यमी, मंच संचालक Manoj Kumar Jain बाकलीवाल ने बताया कि वर्षों से यह परम्परा रही है कि अधिकांश समितियां चातुर्मास के दौरान आने वाले सभी आगंतुकों के लिए निःशुल्क भोजन एवं जलपान की व्यवस्था करती हैं। समाज इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय मानता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह भावना सेवा और अतिथि सत्कार से प्रेरित होती है। किन्तु आज बदलते समय में यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या यह व्यवस्था दीर्घकाल तक व्यवहारिक और टिकाऊ है?

मेरे विचार से चातुर्मास में प्रतिदिन आने वाले सामान्य आगंतुकों के लिए पूर्णतः निःशुल्क भोजन व्यवस्था के स्थान पर न्यूनतम शुल्क वाली “कैंटीन व्यवस्था” अधिक उपयुक्त होगी। यह शुल्क इतना हो कि किसी पर आर्थिक बोझ न बने, परन्तु व्यवस्था के संचालन में सहयोग अवश्य मिले।

इस विषय में समाधिस्थ पूज्य आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का दृष्टिकोण अत्यंत प्रेरणादायक रहा है। उनके अनेक चातुर्मासों में भोजन के लिए नाममात्र का शुल्क रखा जाता था। श्रद्धालु अत्यंत प्रसन्नता और सम्मानपूर्वक वह राशि अदा करते थे। इसी प्रकार धर्मशालाओं में भी प्रतीकात्मक शुल्क लिया जाता था, जबकि अधिक सुविधायुक्त आवास की आवश्यकता होने पर उसे सामान्य बाजार दरों के अनुसार उपलब्ध कराया जाता था। इससे व्यवस्था भी सुचारु रहती थी और संसाधनों का सदुपयोग भी होता था!

यह प्रस्ताव किसी प्रकार से सेवा भावना को कम करने का नहीं है। आवश्यकतानुसार ब्रह्मचारियों, स्वयंसेवकों तथा आर्थिक रूप से असमर्थ श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क व्यवस्था यथावत रहनी चाहिए। किन्तु सामान्य आगंतुकों, स्थानिय भक्तो के लिए न्यूनतम सहयोग शुल्क लेकर भोजन अथवा आवास की व्यवस्था करना समय की आवश्यकता प्रतीत होती है।

आज जब चातुर्मासों का स्वरूप अधिक व्यापक और खर्चीला होता जा रहा है, तब हमें ऐसी व्यवस्थाओं पर विचार करना चाहिए जो सेवा, आत्मनिर्भरता और आर्थिक संतुलन—तीनों का समन्वय कर सकें। संभवतः “निःशुल्क भोजनशाला” की जगह “सहयोग आधारित कैंटीन” की व्यवस्था भविष्य के चातुर्मासों के लिए एक व्यावहारिक और अनुकरणीय मॉडल सिद्ध हो सकती है।
समाज को इस विषय पर खुले मन से विचार-विमर्श करना चाहिए, ताकि चातुर्मास की आध्यात्मिक गरिमा के साथ-साथ उसकी व्यवस्थाएं भी दीर्घकाल तक सुदृढ़ और टिकाऊ बनी रहें।

*भाव लेखक*
मनोज जैन बांकलीवाल
आगरा

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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