मयूर पिच्छी विवाद: पिच्छी हिंसक उपकरण नहीं, बल्कि संयम और अहिंसा का प्रतीक है
मयूर पिच्छी विवाद: देशभर में चर्चा का विषय
मयूर पिच्छी विवाद इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। दिल्ली में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज के समक्ष पूर्व केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिए गए एक बयान के बाद जैन समाज में व्यापक नाराजगी देखने को मिल रही है।
मेनका गांधी ने कथित रूप से कहा कि जैन संतों द्वारा उपयोग की जाने वाली मयूर पिच्छी के लिए लाखों राष्ट्रीय पक्षी मोरों की हत्या की जाती है। इस बयान के बाद देशभर के जैन समाज ने इसे तथ्यहीन, भ्रामक और जैन धर्म की मूल भावना पर आघात बताया है।
भजन में भी वर्णित है मयूर पिच्छी का महत्व
जैन समाज में एक प्रसिद्ध भजन वर्षों से गाया जाता है—“पिच्छी रे पिच्छी इतना बता, तूने कौन सा पुण्य किया है, गुरुवर ने खुश होकर के हाथों में थाम लिया है…”यह भजन स्वयं इस बात का प्रतीक है कि मयूर पिच्छी केवल एक धार्मिक वस्तु नहीं, बल्कि संयम, करुणा और अहिंसा का जीवंत प्रतीक है।
जैन धर्म में मयूर पिच्छी का वास्तविक महत्व
दिगंबर जैन परंपरा में मुनिराज द्वारा धारण की जाने वाली मयूर पिच्छी (पिच्छिका) पाँच प्रमुख गुणों का प्रतीक मानी जाती है—
- कोमलता
- मृदुता
- लघुता
- निस्पृहता
- अपरिग्रह
यह किसी भी प्रकार की हिंसा का नहीं, बल्कि जीवों की रक्षा और संयम का उपकरण है।
पिच्छी कैसे बनाई जाती है?
मयूर पिच्छी विवाद को लेकर सबसे बड़ा प्रश्न यही उठाया गया कि क्या इसके लिए मोरों की हत्या होती है?जैन परंपरा के अनुसार इसका स्पष्ट उत्तर नहीं है।
- मोर प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक रूप से अपने पंख छोड़ देता है।
- उन्हीं गिरे हुए पंखों को एकत्र किया जाता है।
- किसी भी मोर को मारकर पंख नहीं निकाले जाते।
- प्रत्येक पंख की सावधानीपूर्वक जांच की जाती है।
- यदि उसमें कोई सूक्ष्म जीव दिखाई देता है तो वह पंख उपयोग में नहीं लिया जाता।
पिच्छी का उपयोग क्यों किया जाता है?
दिगंबर जैन मुनि चलते समय, बैठते समय अथवा किसी स्थान पर विराजमान होने से पहले पिच्छी से उस स्थान को धीरे-धीरे साफ करते हैं ताकि—
- चींटी,
- सूक्ष्म जीव,
- कीट-पतंग
अनजाने में भी उनके नीचे दबकर मर न जाएँ।यही जैन धर्म की अहिंसा परमो धर्मः की भावना है।धूप से छांव में जाने या किसी स्थान का मार्जन भी अत्यंत कोमल पिच्छी से किया जाता है।
मयूर पिच्छी हिंसा नहीं, जीव रक्षा का साधन
जैन धर्म में एक चींटी को कष्ट पहुँचाना भी पाप माना गया है। ऐसे धर्म पर लाखों मोरों की हत्या का आरोप लगाना जैन समाज के अनुसार पूरी तरह निराधार और असत्य है।यदि किसी के पास ऐसे आरोपों के समर्थन में प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
देशभर में जैन समाज ने जताया विरोध
मयूर पिच्छी विवाद के बाद देशभर के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों एवं महानगरों में जैन समाज ने मेनका गांधी के बयान का विरोध किया।समाज के लोगों का कहना है कि यह बयान जैन धर्म की मूल भावना और अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत है।कई स्थानों पर ज्ञापन सौंपे गए तथा बयान वापस लेने की मांग की गई।
जैन समाज की प्रमुख मांग
जैन समाज ने मांग की है कि—
- मेनका गांधी अपने बयान को वापस लें।
- जैन संतों एवं जैन समाज से सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगें।
- भविष्य में बिना प्रमाण किसी धार्मिक परंपरा पर टिप्पणी करने से बचें।
अहिंसा का संदेश
जैन धर्म विश्व को सदियों से अहिंसा, करुणा और जीव दया का संदेश देता आया है।मयूर पिच्छी उसी संदेश की प्रतीक है। यह किसी हिंसा का नहीं बल्कि जीवों की रक्षा, संयम और आत्मसंयम का उपकरण है।इसलिए इसे हिंसा का प्रतीक बताना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत माना जा रहा है बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति भी अनुचित बताया जा रहा है।
निष्कर्ष
मयूर पिच्छी विवाद ने पूरे देश में धार्मिक परंपराओं और तथ्यों पर आधारित संवाद की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। जैन समाज का कहना है कि किसी भी धार्मिक मान्यता पर टिप्पणी करने से पहले उसके इतिहास, परंपरा और वास्तविक स्वरूप को समझना आवश्यक है।मयूर पिच्छी किसी जीव की हत्या से नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से गिरे हुए मोरपंखों से बनाई जाती है और इसका उद्देश्य केवल जीवों की रक्षा तथा अहिंसा का पालन करना है।
प्रस्तुति
✍🏻 राष्ट्र गौरव पारस जैन “पार्श्वमणि”
पत्रकार, कोटा (राजस्थान)
मो.: 9414764980
:::

