‘पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते।’ पहलगाम आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कथन भारत की नई जल नीति की एक तरह से प्रतीकात्मक लाइन बन गया है। दशकों से भारत और Pakistan के बीच 1960 की सिंधु जल संधि दोनों देशों के रिश्तों का सबसे स्थिर और तकनीकी रूप से संतुलित समझौता माना जाता रहा है। लेकिन अप्रैल 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इस संधि को “इन एबेयंस” यानी अस्थायी रूप से निलंबित करने का फैसला किया। इसके बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक और रणनीतिक हलचल तेज हो गई है।
भारत ने इस फैसले के साथ यह संदेश दिया कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तब तक जल सहयोग के पुराने ढांचे पर आगे बढ़ना संभव नहीं है। इसी बदलाव के बाद चिनाब नदी पर बने बगलिहार, सलाल और दुल्हस्ती जैसे बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट्स रणनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं।
चिनाब नदी क्यों अहम है
भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था सिंधु जल संधि के तहत तय की गई थी। इसके अनुसार पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत के हिस्से में आईं, जबकि पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश प्रवाह पाकिस्तान को मिला। हालांकि संधि भारत को यह अधिकार देती है कि वह पश्चिमी नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर प्रकार की बिजली परियोजनाएँ बना सकता है।
इसी प्रावधान के तहत भारत ने चिनाब बेसिन में कई हाइड्रो प्रोजेक्ट विकसित किए हैं, जो अब जल प्रबंधन और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
बगलिहार प्रोजेक्ट और प्रवाह नियंत्रण
जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में स्थित बगलिहार हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट लगभग 900 मेगावाट क्षमता का है। यह चिनाब पर भारत की प्रमुख परियोजनाओं में शामिल है।
इस बांध की खासियत इसके फ्लशिंग गेट्स हैं, जिनकी मदद से जल प्रवाह और गाद (सिल्ट) के प्रबंधन को नियंत्रित किया जा सकता है। इसी क्षमता के कारण भारत समय-समय पर जल प्रवाह की गति और मात्रा को तकनीकी रूप से संचालित कर सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2025 के आसपास जल प्रबंधन में बदलाव के बाद पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी की मात्रा में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई थी। यही घटना पाकिस्तान में चिंता और चर्चा का बड़ा कारण बनी।
सलाल बांध: रणनीतिक महत्व
चिनाब पर स्थित सलाल बांध लगभग 690 मेगावाट क्षमता का एक और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है, जो जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित है। यह पाकिस्तान सीमा के काफी करीब है, इसलिए इसका रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
सलाल बांध की भूमिका केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि यह जल प्रवाह के समय और मात्रा के नियंत्रण में भी सहायक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी तकनीकी संचालन बदलाव के दौरान नीचे की ओर जल स्तर में तेज उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है, जिसका प्रभाव पाकिस्तान के निचले क्षेत्रों पर पड़ता है।
दुल्हस्ती और आगे की योजना
किश्तवाड़ जिले में स्थित दुल्हस्ती हाइड्रो प्रोजेक्ट पहले से ही कार्यरत है। अब इसके विस्तार के तहत दुल्हस्ती स्टेज-II पर भी काम आगे बढ़ाया जा रहा है।
नई परियोजना में अतिरिक्त सुरंगों, भूमिगत पावर हाउस और आधुनिक जल प्रबंधन प्रणालियों को शामिल किया जा रहा है। इससे भारत को जल प्रवाह के समय और संचालन पर और अधिक तकनीकी नियंत्रण मिलने की संभावना है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य पूरी नदी को रोकना नहीं है, बल्कि जल के उपयोग और प्रवाह को अधिक कुशल और नियंत्रित बनाना है।
Pakistan की संरचनात्मक चुनौती
चिनाब नदी भारत से निकलकर सीधे पाकिस्तान के कृषि क्षेत्रों में प्रवेश करती है। लेकिन पाकिस्तान के पास सीमावर्ती क्षेत्र में बड़े जल भंडारण (स्टोरेज) की क्षमता सीमित है।
तारबेला और मंगला जैसे बड़े बांध मुख्य रूप से सिंधु और झेलम बेसिन से जुड़े हैं, जबकि चिनाब पर उतनी मजबूत स्टोरेज व्यवस्था मौजूद नहीं है। इसी कारण जल प्रवाह में अचानक बदलाव पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं।
यदि पानी कम आता है तो सिंचाई प्रभावित होती है, और यदि अचानक अधिक पानी छोड़ा जाता है तो बाढ़ और फसल नुकसान का जोखिम बढ़ जाता है।
डेटा साझा करने का मुद्दा
सिंधु जल संधि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा केवल जल बंटवारा नहीं, बल्कि हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना भी था। इसके तहत भारत पाकिस्तान को बारिश, बाढ़ और जल प्रवाह से जुड़ी जानकारी नियमित रूप से देता था।
निलंबन के बाद यह डेटा साझा करना बंद हो गया है। इससे पाकिस्तान को अब पहले से यह अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है कि भारत में बांधों का संचालन कब और कैसे बदलेगा।
इसी अनिश्चितता के कारण पाकिस्तान में जल प्रबंधन को लेकर चिंता बढ़ी है, खासकर कृषि और निचले इलाकों में।
कृषि और शहरी प्रभाव
पाकिस्तान का पंजाब क्षेत्र उसकी कृषि अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। लाहौर, फैसलाबाद और मुल्तान जैसे शहर चिनाब और उससे जुड़ी नहर प्रणाली पर निर्भर हैं।
जल प्रवाह में कमी या अनियमितता सीधे फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। वहीं दूसरी ओर अचानक अधिक पानी आने से नहरों और खेतों को नुकसान होने का खतरा भी रहता है।
कराची जैसे बड़े शहर पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं, जहां बड़ी आबादी पानी के टैंकर सिस्टम पर निर्भर है।
भारत की रणनीतिक स्थिति
भौगोलिक रूप से देखें तो चिनाब का ऊपरी हिस्सा भारत के नियंत्रण क्षेत्र में आता है। दुल्हस्ती, बगलिहार और सलाल जैसी परियोजनाएँ इसी ऊपरी हिस्से में स्थित हैं।
इस स्थिति के कारण भारत के पास जल प्रवाह के प्रबंधन में तकनीकी और संचालन स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत के पास इतनी विशाल स्टोरेज क्षमता नहीं है कि वह पूरी नदी का प्रवाह लंबे समय तक रोक सके।
इसका मतलब यह है कि नियंत्रण पूर्ण नहीं बल्कि आंशिक और संचालन आधारित है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और विवाद
भारत के इस कदम के बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाया है और कुछ परियोजनाओं पर आपत्ति जताई है। उसने विभिन्न मध्यस्थता संस्थानों में भी अपील की है।
भारत का रुख है कि जब तक संधि निलंबित है और सीमा पार आतंकवाद की समस्या बनी रहती है, तब तक किसी बाहरी मध्यस्थता की भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
भारत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानता है, जबकि पाकिस्तान इसे जल सुरक्षा का प्रश्न बताता है।
आगे की दिशा
आने वाले समय में भारत अपनी जल परियोजनाओं के विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिसमें नई सुरंगें, बेहतर भंडारण और बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजनाएँ शामिल हैं।
वहीं पाकिस्तान इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने और जल संकट को कूटनीतिक एजेंडे में शामिल करने की कोशिश कर रहा है।
इस प्रकार आने वाले वर्षों में भारत-पाकिस्तान संबंधों में केवल सुरक्षा और कूटनीति ही नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और संसाधन नियंत्रण भी एक प्रमुख रणनीतिक मुद्दा बना रहेगा।
