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Bastar SP कार्यालय में वेतन घोटाला: करोड़ों की हेराफेरी से पुलिस महकमे में हड़कंप

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Published On: 1 July 2026
Bastar SP कार्यालय में वेतन घोटाला: करोड़ों की हेराफेरी से पुलिस महकमे में हड़कंप

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Bastar SP कार्यालय में वेतन घोटाला: करोड़ों की हेराफेरी से पुलिस महकमे में हड़कंप

बस्तर जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय में वेतन शाखा से जुड़े एक बड़े वित्तीय घोटाले का खुलासा हुआ है। इस मामले ने पूरे पुलिस महकमे को हिला कर रख दिया है। आरोप है कि कार्यालय में पदस्थ तीन आरक्षकों ने सुनियोजित तरीके से वेतन देयकों में हेरफेर कर पिछले तीन वर्षों में दो करोड़ रुपये से अधिक की शासकीय राशि का गबन किया।

यह मामला सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं कि आखिर इतनी बड़ी अनियमितता लंबे समय तक कैसे छिपी रही।

CAG ऑडिट रिपोर्ट से हुआ खुलासा

इस पूरे मामले का खुलासा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों के बाद हुआ। ऑडिट टीम ने वेतन भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जांच के दौरान कई अनियमितताएं पाईं।

22 जून को ऑडिट आपत्ति सामने आने के बाद पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने तत्काल आंतरिक जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच में वित्तीय गड़बड़ी की पुष्टि होते ही मामला गंभीर होता चला गया।

ऑडिट रिपोर्ट को इस पूरे घोटाले का सबसे महत्वपूर्ण सुराग माना जा रहा है, क्योंकि इसी के आधार पर जांच की दिशा तय हुई।

तीन आरक्षकों पर गबन का आरोप

जांच के बाद जिन तीन आरक्षकों पर आरोप तय हुए हैं, उनमें शामिल हैं—

  • आरक्षक क्रमांक 450 गिरीश राय
  • आरक्षक क्रमांक 289 राजकुमार कतलम
  • डीएसएफ आरक्षक क्रमांक 4003 हेमंत मैथ्यू

पुलिस के अनुसार, इन तीनों ने आपराधिक साजिश के तहत वेतन देयकों में कूटरचना की और सरकारी धन का दुरुपयोग किया।

इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66(C) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

डिजिटल सिग्नेचर का दुरुपयोग: कैसे हुआ पूरा खेल

जांच में सामने आया है कि यह पूरा घोटाला केवल कागजी हेराफेरी तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें डिजिटल तकनीक का भी गलत इस्तेमाल किया गया।

आरोपियों ने डीडीओ (Drawing and Disbursing Officer) के डिजिटल हस्ताक्षर वाली पेन ड्राइव का दुरुपयोग किया। इसी डिजिटल सिग्नेचर के जरिए वेतन और भत्तों की राशि में बदलाव किया गया।

इसके बाद फर्जी तरीके से बढ़ाई गई रकम को सरकारी सिस्टम से मंजूरी दिलाकर खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था।

यह तरीका काफी सुनियोजित और तकनीकी रूप से जटिल माना जा रहा है, जिससे शुरुआत में किसी को शक नहीं हुआ।

250 पुलिसकर्मियों के वेतन में हेरफेर

प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस घोटाले में केवल कुछ फाइलों में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर वेतन प्रणाली को प्रभावित किया गया।

सूत्रों के अनुसार, करीब 250 पुलिसकर्मियों के वेतन देयकों में हेरफेर किया गया।

जिन कर्मचारियों का वास्तविक वेतन लगभग 50 हजार रुपये था, उनके खाते में एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक का भुगतान दिखाया गया।

इस अतिरिक्त राशि को बाद में अलग-अलग तरीकों से निकालकर आरोपियों तक पहुंचाया जाता था।

तीन साल तक चलता रहा फर्जीवाड़ा

यह घोटाला किसी एक बार की गलती नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया का परिणाम बताया जा रहा है।

जांच में अनुमान लगाया गया है कि पिछले तीन वर्षों में इस तरीके से दो करोड़ रुपये से अधिक की शासकीय राशि का गबन किया गया।

हालांकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह आंकड़ा प्रारंभिक जांच पर आधारित है और विस्तृत जांच के बाद यह राशि और बढ़ सकती है।

कैसे छिपा रहा घोटाला इतने समय तक?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता लंबे समय तक कैसे छिपी रही।

विशेषज्ञों के अनुसार, वेतन प्रणाली में डिजिटल हस्ताक्षर और आंतरिक प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण यह गड़बड़ी तुरंत पकड़ में नहीं आ सकी।

इसके अलावा, नियमित ऑडिट न होना और निगरानी व्यवस्था में ढील भी इस घोटाले को बढ़ावा देने का कारण बनी।

CAG की आपत्ति आने तक यह मामला पूरी तरह से सामने नहीं आया था।

गिरफ्तारी और न्यायिक कार्रवाई

जांच में ठोस सबूत मिलने के बाद तीनों आरक्षकों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है।

पुलिस अब उनसे पूछताछ कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

मास्टरमाइंड की भूमिका पर शक

जांच में आरक्षक गिरीश राय को इस पूरे घोटाले का कथित मास्टरमाइंड माना जा रहा है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उसकी आर्थिक स्थिति में अचानक बड़ा बदलाव देखा गया।

उसने महंगी गाड़ियां खरीदीं, खर्चों में अचानक वृद्धि हुई और कई यात्राएं भी कीं।

अब जांच एजेंसियां उसकी संपत्ति, बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन की गहराई से जांच कर रही हैं।

पैसे के लेन-देन की जांच तेज

पुलिस और जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि गबन की गई राशि किन-किन माध्यमों से खर्च या निवेश की गई।

इसके लिए बैंक ट्रांजैक्शन, डिजिटल भुगतान और संपत्ति रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।

अधिकारियों का मानना है कि इस मामले में और भी बड़े नाम सामने आ सकते हैं।

आगे की जांच और प्रशासनिक सख्ती

पुलिस अधीक्षक कार्यालय ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और आंतरिक जांच जारी है।

अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यदि अन्य कर्मचारियों या अधिकारियों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इसके अलावा वेतन भुगतान प्रणाली में सुधार और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर भी विचार किया जा रहा है।

निष्कर्ष

बस्तर एसपी कार्यालय में सामने आया यह वेतन घोटाला न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला है, बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी और डिजिटल सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।

CAG की रिपोर्ट ने जिस तरह इस घोटाले का पर्दाफाश किया है, उसने साफ कर दिया है कि पारदर्शिता और नियमित ऑडिट की व्यवस्था कितनी जरूरी है।

अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि जांच में और कौन-कौन लोग सामने आते हैं और क्या इस घोटाले की पूरी परतें खुल पाती हैं या नहीं।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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