हिंसक प्रवृत्ति दुख का कारण बताते हुए Silwani के श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान मुनि श्री महासागर जी ने कहा कि किसी भी जीव को दुख पहुंचाना हिंसा है। जानिए प्रेम, अहिंसा और सहयोग पर आधारित उनका प्रेरणादायक संदेश।
हिंसक प्रवृत्ति दुख का कारण: मुनि श्री महासागर ने बताया प्रेम और अहिंसा ही सच्चे सुख का मार्ग
Silwani | संवाददाता: वैभव जैन मस्ताना
हिंसक प्रवृत्ति दुख का कारण: मुनि श्री महासागर का संदेश
Silwani नगर स्थित श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान मुनि श्री महासागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हिंसक प्रवृत्ति दुख का कारण बनती है। जो व्यक्ति हिंसा करता है या हिंसक विचार रखता है, वह कभी भी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा, करुणा और सभी जीवों के प्रति प्रेम की भावना है।मुनि श्री ने कहा कि हिंसा केवल किसी जीव की हत्या करना ही नहीं है, बल्कि किसी भी इंसान या जीव की आत्मा को दुख पहुंचाना भी हिंसा की श्रेणी में आता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार, वाणी और विचारों में संयम रखना चाहिए।
किसी भी जीव को दुख देना भी हिंसा
मुनि श्री महासागर जी ने कहा कि संसार में हिंसा के अनेक स्वरूप हैं। केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं बल्कि कटु वचन, अपमान, ईर्ष्या, द्वेष और किसी को मानसिक कष्ट देना भी हिंसा का ही रूप है।उन्होंने कहा कि हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी भी जीव या मनुष्य को पीड़ा पहुंचे। यदि हमारी वजह से कोई व्यक्ति दुखी होता है तो वह भी हिंसक प्रवृत्ति मानी जाती है।उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि छोटे से छोटे जीव की रक्षा करने का प्रयास करें तथा अपने मन में किसी के प्रति बैर, द्वेष और बुराई न रखें।
प्रेम, स्नेह और सहयोग से सफल बनेगा जीवन
अपने प्रवचन में मुनि श्री महासागर जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के मन में सभी जीवों के प्रति प्रेम, स्नेह और सहयोग की भावना होनी चाहिए। यही वास्तविक धर्म है और यही मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपने मन से क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और हिंसक विचारों को समाप्त कर देता है तो उसका जीवन स्वतः ही सुख, शांति और आनंद से भर जाता है।
जैन धर्म की मूल पहचान है अहिंसा
मुनि श्री ने कहा कि जैन धर्म की पहचान कभी भी हिंसा नहीं रही है। जैन धर्म सदैव अहिंसा, दया, क्षमा, करुणा और आत्मकल्याण का संदेश देता आया है।उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने दैनिक जीवन में अहिंसा का पालन करें, जीव दया को अपनाएं तथा सभी के प्रति सद्भाव रखें। यही सच्ची धार्मिक साधना है।
निष्कर्ष
धर्मसभा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने मुनि श्री महासागर जी के प्रेरणादायक प्रवचनों को गंभीरता से सुना। उन्होंने कहा कि यदि समाज में प्रेम, सहयोग और अहिंसा की भावना विकसित होगी तो परिवार, समाज और राष्ट्र सभी सुखी एवं समृद्ध बनेंगे।
