MP Temples News: राम मंदिर चढ़ावे में चोरी के बाद उठी मांग, अब मंदिरों में डिजिटल दान व्यवस्था लागू करने पर जोर
MP Temples News: अयोध्या के श्रीराम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित गड़बड़ी और चोरी के मामले के सामने आने के बाद देशभर में मंदिरों की दान व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। इसी क्रम में मध्य प्रदेश में भी मंदिरों के चढ़ावे को डिजिटल और ऑनलाइन माध्यम से सुरक्षित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है।
अखिल भारतीय संत समिति ने देशभर के मठाधिपतियों, पुजारियों और मंदिर समितियों से अपील की है कि मंदिरों में आने वाले दान को पूरी तरह डिजिटल प्रणाली के तहत लाया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा सके।
मंदिरों में डिजिटल दान व्यवस्था की मांग तेज
अखिल भारतीय संत समिति के कार्यकारी अध्यक्ष महंत अनिलानंद ने कहा कि जिस तरह अन्य सभी क्षेत्रों में डिजिटलीकरण हो चुका है, उसी तरह मंदिरों की दान व्यवस्था को भी आधुनिक बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि डिजिटल और ऑनलाइन माध्यम से प्राप्त चढ़ावा सीधे मंदिरों के बैंक खातों में जमा हो, जिससे किसी भी तरह की अनियमितता की संभावना खत्म हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि मंदिरों के चढ़ावे का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास और मजबूत हो।
भोपाल के मंदिरों में कैसे होता है चढ़ावा संग्रह
राजधानी भोपाल के प्रमुख मंदिरों में दान और चढ़ावे की व्यवस्था पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरीकों से की जा रही है। अधिकांश मंदिर ट्रस्ट और समितियों द्वारा संचालित हैं, जहां दानपात्रों और रसीदों के माध्यम से चढ़ावा एकत्र किया जाता है।
दान पेटियों को अलग-अलग समय अंतराल पर—कहीं तीन महीने, कहीं छह महीने और कहीं साल में एक बार—सीसीटीवी कैमरों और बैंक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में खोला जाता है।
अब कई मंदिरों में क्यूआर कोड और डिजिटल भुगतान प्रणाली भी शुरू हो चुकी है, जिससे श्रद्धालु सीधे बैंक खाते में दान कर सकते हैं।
काली मंदिर तलैया में पारदर्शी व्यवस्था
भोपाल के काली मंदिर, तलैया में रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, दान देने वालों को तुरंत रसीद दी जाती है। यहां साल में एक बार पदाधिकारियों और आम लोगों की मौजूदगी में दान पेटी खोली जाती है।
मंदिर प्रशासन का कहना है कि यहां सालाना लगभग 15 लाख रुपये तक का दान प्राप्त होता है, जो मंदिर के रखरखाव और धार्मिक गतिविधियों में खर्च किया जाता है।
भवानी मंदिर सोमवारा में स्वर्ण दान की परंपरा
भवानी मंदिर, सोमवारा में हर तीन महीने में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में दान पेटी खोली जाती है। इस प्रक्रिया में मंदिर समिति के पदाधिकारी और बैंक प्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं।
मंदिर अध्यक्ष आशीष सैनी के अनुसार, यहां श्रद्धालु केवल नकद ही नहीं बल्कि स्वर्ण दान भी करते हैं। सामान्य दिनों में दान राशि दो से ढाई लाख रुपये तक रहती है, जबकि नवरात्र जैसे पर्वों में यह राशि काफी बढ़ जाती है।
बड़वाले महादेव मंदिर में नियमित ऑडिट
भोपाल के प्राचीन बड़वाले महादेव मंदिर में पूरे वर्ष धार्मिक उत्सव चलते रहते हैं। मंदिर समिति के अनुसार, यहां हर तीन से चार महीने में दान पेटी सार्वजनिक रूप से खोली जाती है।
समिति के संजय अग्रवाल ने बताया कि यहां सालाना लगभग 80 हजार से 1 लाख रुपये तक का चढ़ावा आता है। मंदिर का हर साल ऑडिट किया जाता है और नवनिर्माण कार्य भी दानदाताओं के सहयोग से किया जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 5 करोड़ रुपये है।
मरघटिया महावीर मंदिर में मासिक चढ़ावा व्यवस्था
शाहजहांनाबाद स्थित उदासीन आश्रम मरघटिया महावीर मंदिर में हर महीने दान पेटी खोली जाती है। महंत कन्हैयादास के अनुसार, यह प्रक्रिया कमेटी सदस्यों की देखरेख में पूरी पारदर्शिता के साथ की जाती है।
मंदिर में धार्मिक आयोजनों के लिए श्रद्धालु नियमित रूप से रसीद कटवाकर दान करते हैं। सभी आय-व्यय का रिकॉर्ड रखा जाता है।
श्रीराम मंदिर गुरुबख्श की तलैया में नियमित ऑडिट
गुरुबख्श की तलैया स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर में हर तीन महीने में दान पेटी खोली जाती है। मंदिर सचिव प्रमोद चुग के अनुसार, इस प्रक्रिया में ट्रस्टियों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी रहती है।
मंदिर की आय-व्यय का नियमित ऑडिट किया जाता है और आयकर रिटर्न भी हर साल विधिवत दाखिल किया जाता है।
डिजिटल सिस्टम से पारदर्शिता की उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि मंदिरों में डिजिटल दान प्रणाली लागू होने से पारदर्शिता बढ़ेगी और गड़बड़ी की संभावनाएं कम होंगी। क्यूआर कोड और ऑनलाइन भुगतान के बढ़ते उपयोग से पहले ही कई मंदिर इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं।
निष्कर्ष
राम मंदिर चढ़ावे से जुड़े विवाद के बाद देशभर में मंदिरों की दान व्यवस्था को लेकर नई सोच सामने आ रही है। MP में भी अब डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था की मांग तेज हो गई है। संत समाज और मंदिर समितियों का मानना है कि आधुनिक तकनीक के उपयोग से न केवल दान व्यवस्था सुरक्षित होगी, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास भी और मजबूत होगा।
