MP के एससीएससी पर भारी कर्ज का बोझ, रोज 23 करोड़ का ब्याज, कमाई शून्य; वित्तीय प्रबंधन पर उठे सवाल
MP के कॉर्पोरेशन की वित्तीय स्थिति पर बड़ा सवाल
MP के सरकारी कॉर्पोरेशन और संस्थाओं की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। राज्य के स्टेट सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन (एससीएससी) पर भारी-भरकम कर्ज का बोझ बताया जा रहा है, जिस पर रोजाना करोड़ों रुपए का ब्याज चुकाया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिस संस्था की मूल भूमिका गेहूं और धान की खरीद एवं वितरण से जुड़ी है, उसकी दैनिक आय कई समयों में शून्य बताई जा रही है।
103 लाख करोड़ के कर्ज का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, एससीएससी पर अब तक का कर्ज बढ़कर 103 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। इस भारी-भरकम कर्ज पर रोजाना लगभग 23.20 करोड़ रुपए का ब्याज लग रहा है। इस स्थिति ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन और कॉर्पोरेशन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2024 में कॉर्पोरेशन पर लगभग 40,380 करोड़ रुपए का कर्ज था, जिस पर उस समय रोजाना 8.99 करोड़ रुपए का ब्याज देना पड़ रहा था। लेकिन रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अप्रैल 2026 तक यह कर्ज तेजी से बढ़कर 103 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जिससे ब्याज का बोझ भी कई गुना बढ़ गया है।
कमाई सीमित, खर्च लगातार बढ़ता गया
एससीएससी की मुख्य आय गेहूं और धान की खरीद के सीजन पर निर्भर करती है। इन सीजनों को छोड़कर कॉर्पोरेशन की दैनिक आय लगभग शून्य रहती है। हालांकि, खरीदी के समय मिलने वाले कमीशन से कुछ आय प्राप्त होती है, लेकिन यह राशि भी मूलधन और ब्याज के भुगतान में ही समाप्त हो जाती है।
इस असंतुलन के कारण संस्था लगातार कर्ज के दबाव में बनी हुई है और अपनी वित्तीय स्थिति को स्थिर नहीं कर पा रही है।
28 महीनों में कर्ज में तेज बढ़ोतरी
जानकारी के अनुसार, जनवरी 2024 में जहां कर्ज लगभग 40 हजार करोड़ रुपए था, वहीं केवल 28 महीनों में यह कई गुना बढ़कर 103 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसी अवधि में ब्याज का बोझ भी 8.99 करोड़ प्रतिदिन से बढ़कर 23.20 करोड़ प्रतिदिन हो गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की वृद्धि वित्तीय प्रबंधन की गंभीर खामियों की ओर संकेत करती है और यह स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।
खरीदी व्यवस्था पर भी सवाल
कॉर्पोरेशन की वित्तीय व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए जा रहे हैं। यह संस्था केंद्र सरकार की समर्थन मूल्य योजना के तहत गेहूं और धान की खरीद करती है और फिर इसे भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) या सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत राज्य सरकार को देती है।
इस प्रक्रिया के बदले में कॉर्पोरेशन को भुगतान प्राप्त होता है, लेकिन फिर भी बार-बार कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
बारदानों की खरीदी और विवाद
गेहूं खरीदी के दौरान बारदानों की खरीदी को लेकर भी विवाद सामने आया था। पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक अजय विश्नोई ने आरोप लगाया था कि पुराने बारदाने महंगे दामों पर खरीदे जा रहे थे। उनके अनुसार प्रति बोरा 54.20 रुपए में खरीद की जा रही थी, जो बाजार दर से काफी अधिक थी।
बाद में मामला सामने आने पर मुख्य सचिव ने टेंडर रद्द कर दिया और बारदानों की नई खरीद 37.20 रुपए प्रति बोरा के हिसाब से की गई।
वित्तीय प्रबंधन पर उठे सवाल
वर्तमान स्थिति में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ रहे हैं—
- जब कॉर्पोरेशन को खरीदी के समय कमीशन मिलता है, तो फिर इतनी भारी मात्रा में कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है?
- जनवरी 2024 से मई 2026 के बीच कर्ज इतनी तेजी से कैसे बढ़ गया?
- क्या यह वृद्धि वास्तविक है या आंकड़ों में किसी तरह की त्रुटि है?
- आरबीआई और अन्य वित्तीय संस्थानों से लिए गए कर्ज का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है?
विभाग का पक्ष
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव (एसीएस) रश्मि अरुण शमी के अनुसार, कॉर्पोरेशन पहले से अधिक मात्रा में अनाज की खरीद कर रहा है, जिसके कारण कर्ज पर आधारित वित्तीय व्यवस्था बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में अनाज को सुरक्षित गोदामों में रखा जाता है, जबकि कई अन्य राज्यों में इसे खुले में रखा जाता है। एफसीआई द्वारा उठाने में देरी होने के कारण भुगतान में भी समय लगता है, जिससे अस्थायी रूप से कर्ज बढ़ जाता है।
उनका यह भी कहना है कि जैसे ही एफसीआई या सरकार से भुगतान प्राप्त होता है, उस राशि से कर्ज का भुगतान कर दिया जाता है। विभाग के अनुसार, वित्तीय प्रबंधन में कोई गंभीर गड़बड़ी नहीं है।
आर्थिक विशेषज्ञों की चिंता
हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्ज और ब्याज का बोझ इसी तरह बढ़ता रहा तो यह प्रणाली पर गंभीर दबाव डाल सकता है। लगातार बढ़ता ब्याज और सीमित आय कॉर्पोरेशन की वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
निष्कर्ष
MP एससीएससी पर बढ़ता कर्ज और प्रतिदिन करोड़ों रुपए का ब्याज मध्य प्रदेश की वित्तीय व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। जहां सरकार और विभाग इसे प्रक्रियात्मक देरी और व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं, वहीं आंकड़े एक गंभीर आर्थिक दबाव की ओर संकेत कर रहे हैं। आने वाले समय में इस स्थिति पर नियंत्रण और सुधार बेहद जरूरी माना जा रहा है, ताकि कॉर्पोरेशन की वित्तीय स्थिरता बनी रह सके।
