Dhariwal परिवार की बाल तपस्वी सृष्टि–समृद्धि ने शत्रुंजय महातीर्थ की नवाणु यात्रा कर अर्जित किया महान पुण्य
छोटी उम्र में बड़ी तपस्या, जैन समाज में श्रद्धा और उत्साह का माहौल
रतलाम नगर से एक अत्यंत प्रेरणादायक और आध्यात्मिक समाचार सामने आया है, जहां धर्मनिष्ठ एवं समाजसेवी सुश्रावक राजेंद्र सुमित्रा धारीवाल की पौत्री तथा विशाल एवं मोना Dhariwal की सुपुत्री, बाल तपस्वी रत्न सृष्टि और समृद्धि धारीवाल ने अपनी अल्पायु में ऐसी कठिन तपस्या पूर्ण की है, जिसे जैन समाज में अत्यंत उच्च कोटि का आध्यात्मिक साधन माना जाता है।
दोनों बालिकाओं ने शत्रुंजय महातीर्थ गिरिराज की पावन नवाणु यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न कर एक महान पुण्य अर्जित किया है। इस उपलब्धि के बाद पूरे जैन समाज में हर्ष, श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण देखा गया।
शत्रुंजय महातीर्थ को जैन परंपरा में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तीर्थ माना जाता है, जहां की गई साधना को आत्मिक उन्नति का मार्ग माना जाता है। ऐसे में छोटी उम्र की बालिकाओं द्वारा इस कठिन यात्रा को पूर्ण करना समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।
आदिनाथ दादा और भेरूजी की कृपा से पूर्ण हुई यात्रा
धारीवाल परिवार द्वारा बताया गया कि यह नवाणु यात्रा भगवान आदिनाथ दादा और भेरूजी की असीम कृपा से सफलतापूर्वक संपन्न हुई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवाणु यात्रा एक अत्यंत कठिन और तपस्वी साधना है, जिसे पूर्ण करने के लिए गहरी श्रद्धा, अनुशासन और आत्मिक समर्पण की आवश्यकता होती है।
सृष्टि और समृद्धि धारीवाल ने यह यात्रा पूर्ण कर समाज में यह संदेश दिया कि आस्था और संकल्प से कोई भी आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, चाहे आयु कितनी भी कम क्यों न हो।
भव्य राजेंद्र सूरी गुरु पद महापूजन का आयोजन
यात्रा की पूर्णाहुति के अवसर पर धारीवाल परिवार द्वारा एक भव्य धार्मिक आयोजन “राजेंद्र सूरी गुरु पद महापूजन” का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में समाजजन और आमंत्रित अतिथि शामिल हुए।
पूजन का शुभारंभ दोपहर 12:39 के विजय मुहूर्त में विधि-विधान के साथ किया गया, जिसे शुभ और मंगलकारी समय माना जाता है। इस अवसर पर वातावरण पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

विधि-विधान और भक्ति संगीत से सजा कार्यक्रम
इस महापूजन का संचालन सुप्रसिद्ध विधिकारक हेमंत जी मुथा (मक्सी) द्वारा किया गया। उन्होंने पूरे पूजन को शास्त्रीय विधियों के अनुसार संपन्न कराया।
साथ ही, संगीतकारों द्वारा प्रस्तुत भक्ति गीतों ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। ढोल, मंत्रोच्चार और भजनों के बीच उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर होकर भक्ति में लीन हो गए।
करीब तीन घंटे तक चले इस महापूजन में सभी उपस्थित महानुभावों ने पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से भाग लिया और पुण्य लाभ अर्जित किया।
कार्यक्रम के दौरान बार-बार “परमात्मा गुरुदेव के मंगलकारी जयकारे” गूंजते रहे, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
99 यात्राओं की तपस्वी बालिकाओं का भव्य सम्मान
इस अवसर पर सृष्टि और समृद्धि धारीवाल, जिन्होंने 99 यात्राओं की तपस्या पूर्ण की है, उनका समाज द्वारा विशेष रूप से सम्मान किया गया।
दोनों बालिकाओं का “अक्षत वधामणा” के माध्यम से पारंपरिक जैन रीति से स्वागत एवं बहुमान किया गया। समाज के गणमान्य सदस्यों और अतिथियों ने उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने बाल तपस्वियों के इस समर्पण को जैन धर्म की महान परंपरा का जीवंत उदाहरण बताया।
सहभोज का आयोजन और सामाजिक सहभागिता
धार्मिक आयोजन के पश्चात सभी आमंत्रित महानुभावों के लिए सहभोज (भोजन प्रसाद) का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में समाजजनों ने भाग लिया और एकता एवं भाईचारे का संदेश दिया।
यह सहभोज केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि समाज में आपसी सहयोग और धार्मिक एकता का प्रतीक भी बना।
Dhariwal परिवार का योगदान और आभार
संपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन धारीवाल परिवार—राजेंद्र कुमार, विशाल कुमार और वैभव कुमार धारीवाल द्वारा किया गया। परिवार ने आयोजन को सफल बनाने में पूर्ण समर्पण दिखाया।
उन्होंने सभी आमंत्रित अतिथियों और समाजजनों का आभार व्यक्त किया और कहा कि यह आयोजन केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक उत्सव है।

जैन समाज में श्रद्धा और प्रेरणा का वातावरण
इस भव्य धार्मिक आयोजन के सम्पन्न होने के बाद पूरे जैन समाज में अत्यंत गहरी श्रद्धा और आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण देखने को मिला। शत्रुंजय महातीर्थ की नवाणु यात्रा जैसी कठिन और तपस्वी साधना को छोटी आयु में पूर्ण करना सृष्टि और समृद्धि धारीवाल के लिए एक असाधारण उपलब्धि मानी जा रही है। समाज के वरिष्ठजनों से लेकर युवा वर्ग तक सभी ने इस तपस्या को सराहते हुए इसे धार्मिक परंपरा और संस्कारों की जीवंत मिसाल बताया।
सृष्टि और समृद्धि धारीवाल की यह साधना केवल उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जैन समाज के लिए गौरव का विषय बन गई है। उनके इस समर्पण और अनुशासन को देखकर लोग भावविभोर हो उठे और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण माना गया।
समाज के लोगों का मानना है कि इस प्रकार की तपस्या और धार्मिक अनुशासन युवा पीढ़ी को धर्म, संयम, त्याग और आस्था की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा। यह आयोजन सामाजिक एकता और आध्यात्मिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करने वाला सिद्ध हुआ।
निष्कर्ष
धारीवाल परिवार की बाल तपस्वी सृष्टि और समृद्धि का यह आध्यात्मिक सफर यह दर्शाता है कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण के साथ की गई साधना किसी भी आयु सीमा से परे होती है।
शत्रुंजय महातीर्थ की नवाणु यात्रा पूर्ण कर उन्होंने न केवल महान पुण्य अर्जित किया, बल्कि जैन परंपरा की गहराई और तपस्या की शक्ति को भी समाज के सामने प्रस्तुत किया।
यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह आस्था, अनुशासन और आध्यात्मिक समर्पण की जीवंत मिसाल बन गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को धर्म और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।
