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MP News: 3 संतान होने पर उप पंजीयक बर्खास्त, मुख्यमंत्री द्वारा नियम हटाने के बाद भी हुई कार्रवाई, प्रशासनिक गलियारों में छिड़ी बहस

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Published On: 13 June 2026
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MP News: तीन संतान होने पर उप पंजीयक बर्खास्त, मुख्यमंत्री द्वारा नियम हटाने के बाद भी हुई कार्रवाई

भोपाल/सिंगरौली। MP में शासकीय सेवाओं में लागू दो-बच्चे संबंधी नियम को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। सिंगरौली जिले में पदस्थ उप पंजीयक अशोक सिंह परिहार को तीन जीवित संतान होने के आधार पर शासकीय सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है जब कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शासकीय सेवा में दो बच्चों की अधिकतम सीमा से जुड़े प्रावधान को समाप्त करने के निर्देश दिए थे। ऐसे में यह मामला प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक दृष्टि से चर्चा का विषय बन गया है।

महानिरीक्षक पंजीयन एवं अधीक्षक मुद्रांक, मध्य प्रदेश द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि अशोक सिंह परिहार के विरुद्ध विभागीय जांच और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर यह पाया गया कि उनकी दो से अधिक जीवित संतान हैं, जो तत्कालीन लागू सेवा नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर उन्हें शासकीय सेवा से पृथक करने का निर्णय लिया गया।

इस कार्रवाई के सामने आने के बाद प्रदेशभर में यह सवाल उठने लगे हैं कि जब मुख्यमंत्री स्वयं इस नियम को समाप्त करने का निर्णय ले चुके हैं, तब उसके कुछ ही दिनों बाद किसी कर्मचारी के विरुद्ध उसी प्रावधान के आधार पर कार्रवाई कैसे की गई। हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच और विभागीय प्रक्रिया काफी पहले से चल रही थी तथा कार्रवाई उस समय लागू नियमों के अनुसार की गई है।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार सिंगरौली जिले में पदस्थ उप पंजीयक अशोक सिंह परिहार के खिलाफ शिकायत प्राप्त हुई थी कि उनकी दो से अधिक जीवित संतान हैं। शिकायत के आधार पर मामले की जांच शुरू की गई। जांच के लिए जिला प्रशासन की ओर से संयुक्त जांच समिति गठित की गई थी, जिसने संबंधित दस्तावेजों, जन्म प्रमाण पत्रों और अन्य अभिलेखों का परीक्षण किया।

जांच में पाया गया कि अशोक सिंह परिहार की तीसरी संतान, पुत्र अभिषेक सिंह, का जन्म 19 नवंबर 2003 को हुआ था। जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की पुष्टि की। विभागीय रिकॉर्ड और कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण में भी इस जानकारी का उल्लेख पाया गया।

रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारी ने मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियमों के उस प्रावधान का उल्लंघन किया है, जिसमें 26 जनवरी 2001 के बाद दो से अधिक जीवित संतान होने पर व्यक्ति को शासकीय सेवा के लिए अयोग्य माना गया था।

मुख्यमंत्री ने हाल ही में हटाया था दो-बच्चे वाला प्रावधान

मामले को लेकर सबसे अधिक चर्चा इस कारण हो रही है क्योंकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 9 जून को ही दो बच्चों की अधिकतम सीमा संबंधी प्रावधान को समाप्त करने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार द्वारा मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम संशोधन प्रारूप 2026 तैयार किया गया था, जिसमें यह प्रावधान यथावत रखा गया था।

जब यह मसौदा सार्वजनिक हुआ तो मुख्यमंत्री ने स्वयं संज्ञान लेते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि दो से अधिक जीवित संतान होने पर किसी व्यक्ति को शासकीय सेवा के लिए अपात्र मानने वाला प्रावधान हटाया जाए। उन्होंने सामान्य प्रशासन विभाग को नया प्रारूप तैयार करने के निर्देश भी दिए थे।

मुख्यमंत्री के इस निर्णय को व्यापक रूप से सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण में बदलाव के रूप में देखा गया। कई वर्गों ने इसका स्वागत किया, जबकि कुछ लोगों ने जनसंख्या नियंत्रण संबंधी नीतियों के संदर्भ में इस पर सवाल भी उठाए।

नियम हटने और कार्रवाई होने के बीच बना विरोधाभास

अशोक सिंह परिहार की बर्खास्तगी ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार सार्वजनिक रूप से इस प्रकार के प्रावधान को समाप्त करने की घोषणा कर चुकी है। इसी वजह से यह मामला विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न करता दिखाई दे रहा है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मामले में यह देखा जाता है कि कथित उल्लंघन के समय कौन-सा नियम लागू था। यदि किसी कर्मचारी ने उस समय लागू नियम का उल्लंघन किया है और जांच उसी आधार पर पूरी हुई है, तो विभाग कार्रवाई कर सकता है। दूसरी ओर यदि नया संशोधन लागू हो चुका हो और उसमें पुराने प्रावधान समाप्त कर दिए गए हों, तो ऐसे मामलों में अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आ सकती हैं।

यही कारण है कि इस कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई लोगों का मानना है कि संबंधित कर्मचारी इस आदेश को न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।

क्या कहता था पुराना नियम?

मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम, 1961 के तहत एक प्रावधान शामिल था जिसके अनुसार 26 जनवरी 2001 के बाद दो से अधिक जीवित संतान होने पर व्यक्ति शासकीय सेवा के लिए पात्र नहीं माना जाता था। इस नियम का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना और छोटे परिवार की अवधारणा को प्रोत्साहित करना था।

ऐसे प्रावधान देश के कई राज्यों में विभिन्न समय पर लागू किए गए थे। कुछ राज्यों ने स्थानीय निकाय चुनावों, पंचायत प्रतिनिधियों और सरकारी नौकरियों के लिए भी दो-बच्चे संबंधी शर्तें लागू की थीं। हालांकि समय के साथ इन नियमों को लेकर बहस बढ़ी और कई राज्यों ने इन्हें संशोधित या समाप्त भी किया।

मध्य प्रदेश में भी लंबे समय से इस प्रावधान को लेकर चर्चा चल रही थी। अंततः मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद इसे हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई।

जांच समिति ने क्या पाया?

सिंगरौली कलेक्टर द्वारा गठित संयुक्त जांच समिति ने मामले की विस्तृत जांच की थी। समिति ने कर्मचारी के परिवार संबंधी रिकॉर्ड, जन्म तिथि संबंधी दस्तावेज, शासकीय अभिलेख और अन्य उपलब्ध प्रमाणों का अध्ययन किया।

रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि कर्मचारी की तीसरी संतान का जन्म निर्धारित तिथि के बाद हुआ था। जांच समिति ने यह भी माना कि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित होते हैं।

इसके बाद विभागीय स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई और संबंधित अधिकारी को अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया गया। विभाग के अनुसार प्रस्तुत स्पष्टीकरण में भी तीसरी संतान होने के तथ्य का खंडन नहीं किया गया।

विवादों से पुराना संबंध

अशोक सिंह परिहार का नाम इससे पहले भी विभिन्न विवादों में सामने आ चुका है। सिंगरौली में लंबे समय से पदस्थ रहने के कारण वे कई बार चर्चाओं में रहे हैं।

उन पर पूर्व में स्टांप शुल्क से जुड़े एक मामले में गंभीर आरोप लगे थे। आरोप था कि कुछ मामलों में अनियमितताओं के कारण सरकार को एक करोड़ दस लाख रुपये से अधिक के राजस्व का नुकसान हुआ। इस मामले में विभागीय जांच भी हुई थी और उन्हें निलंबन का सामना करना पड़ा था।

हालांकि उस मामले की अंतिम स्थिति अलग विषय है, लेकिन वर्तमान बर्खास्तगी के साथ पुराने विवादों का उल्लेख भी चर्चा में बना हुआ है। प्रशासनिक हलकों में यह माना जा रहा है कि लंबे समय से विवादों में रहने वाले अधिकारी के विरुद्ध यह नवीनतम कार्रवाई है।

प्रशासनिक दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है मामला?

यह मामला केवल एक कर्मचारी की बर्खास्तगी तक सीमित नहीं है। इसके कई व्यापक प्रशासनिक आयाम हैं। पहला, यह स्पष्ट करता है कि सेवा नियमों से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया कई वर्षों तक चल सकती है। दूसरा, यह प्रश्न भी उठता है कि जब किसी नियम को समाप्त करने की प्रक्रिया चल रही हो, तब उससे जुड़े लंबित मामलों का निपटारा किस प्रकार किया जाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में सरकार को ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने पड़ सकते हैं ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे। यदि नियम समाप्त कर दिया जाता है, तो पुराने मामलों पर उसका क्या प्रभाव होगा, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

कानूनी चुनौती की संभावना

कानूनी जानकारों के अनुसार यदि संबंधित अधिकारी चाहें तो वे इस आदेश को न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं। न्यायालय में यह तर्क दिया जा सकता है कि सरकार स्वयं इस नियम को समाप्त करने का निर्णय ले चुकी है, इसलिए कार्रवाई पर पुनर्विचार होना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर विभाग यह तर्क रख सकता है कि कथित उल्लंघन उस समय हुआ था जब नियम प्रभावी था और जांच भी उसी आधार पर पूरी की गई। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा तथ्यों और नियमों की व्याख्या के आधार पर किया जाता है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं

मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि नियम हटाने की घोषणा के बाद ऐसी कार्रवाई उचित नहीं प्रतीत होती, जबकि अन्य लोगों का मानना है कि यदि जांच पुराने नियमों के तहत पूरी हुई है तो विभागीय कार्रवाई को गलत नहीं कहा जा सकता।

सोशल मीडिया पर भी इस विषय पर व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोग इसे प्रशासनिक विसंगति बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे नियमों के पालन का उदाहरण मान रहे हैं।

आगे क्या?

फिलहाल उप पंजीयक अशोक सिंह परिहार की बर्खास्तगी का आदेश जारी हो चुका है और मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संबंधित अधिकारी इस आदेश के खिलाफ कानूनी कदम उठाते हैं और क्या राज्य सरकार इस मामले को लेकर कोई अतिरिक्त स्पष्टीकरण जारी करती है।

यह प्रकरण केवल एक विभागीय कार्रवाई नहीं बल्कि सरकारी नियमों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और बदलती नीतियों के बीच संतुलन का भी महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़े नए घटनाक्रम सामने आने की संभावना है, जिन पर प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों वर्गों की नजर बनी हुई है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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