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भारत की पहली Bullet Train: पक्के घर नहीं, फिर भी इस आदिवासी गांव से गुजरेगी देश की सबसे तेज रफ्तार ट्रेन

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Published On: 21 May 2026
भारत की पहली Bullet Train: पक्के घर नहीं, फिर भी इस आदिवासी गांव से गुजरेगी देश की सबसे तेज रफ्तार ट्रेन

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भारत की पहली Bullet Train: पक्के घर नहीं, फिर भी इस आदिवासी गांव से गुजरेगी देश की सबसे तेज रफ्तार ट्रेन

बड़े बदलाव के केंद्र में छोटा सा गांव

मुंबई से लगभग 118 किलोमीटर दूर पालघर जिले की दहानू तहसील का सखारे गांव आज एक बड़े बदलाव का हिस्सा बन गया है। यह एक छोटा आदिवासी बहुल गांव है, जहां आज भी कच्चे घर और साधारण जीवनशैली देखने को मिलती है, लेकिन अब यही गांव देश के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट — मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर — का अहम हिस्सा बन चुका है।

गांव की शांति के बीच अब भारी मशीनों की आवाज, ऊंचे-ऊंचे वायाडक्ट और आधुनिक निर्माण कार्य की हलचल साफ दिखाई देती है। यह तस्वीर विकास और परंपरा के बीच एक बड़ा अंतर दिखाती है।

जापान की तकनीक पर आधारित Bullet Train प्रोजेक्ट

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट जापान की मशहूर “शिंकानसेन” तकनीक पर आधारित है। इस ट्रेन की रफ्तार 320 किलोमीटर प्रति घंटे तक होगी, जिससे मुंबई और अहमदाबाद के बीच लगभग 508 किलोमीटर की दूरी सिर्फ दो घंटे में तय की जा सकेगी।

सखारे गांव इस हाई-स्पीड कॉरिडोर का हिस्सा है, जहां इस समय बड़े स्तर पर निर्माण कार्य चल रहा है।

50 एकड़ में फैला हाई-टेक यार्ड

सखारे गांव में करीब 50 एकड़ जमीन पर एक विशाल लॉन्चिंग और कास्टिंग यार्ड बनाया गया है। यह महाराष्ट्र के उन 9 प्रमुख यार्ड्स में शामिल है, जहां बुलेट ट्रेन के लिए जरूरी बड़े-बड़े कंक्रीट गर्डर तैयार किए जाते हैं।

यहां आधुनिक मशीनें लगातार काम कर रही हैं। खास तौर पर नीला “स्ट्रैडल कैरियर” लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, जो किसी साइंस फिक्शन मशीन जैसा दिखता है। यह 380 टन वजनी मशीन 80 पहियों पर चलती है और 1000 टन तक वजनी 40 मीटर लंबे गर्डर को आसानी से उठा सकती है।

जापान से भी तेज निर्माण की रफ्तार

नेशनल हाई-स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) और एलएंडटी के इंजीनियर इस परियोजना पर दिन-रात काम कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, इस यार्ड में 22 किलोमीटर के हिस्से के लिए 527 गर्डर तैयार किए जा रहे हैं। पूरे 508 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर में लगभग 11,500 गर्डर लगाए जाएंगे, जिनमें से करीब 8,500 गर्डर पहले ही लगाए जा चुके हैं।

अधिकारियों का दावा है कि यहां गर्डर लगाने की रफ्तार जापान की तुलना में भी 7 से 8 गुना अधिक है।

हर गर्डर के पीछे है बड़ी इंजीनियरिंग

Bullet Train के लिए बनाए जा रहे गर्डर बेहद खास और तकनीकी रूप से जटिल हैं। इन गर्डर को बीच से खोखला रखा जाता है ताकि वजन कम रहे और पिलर्स पर दबाव कम पड़े, लेकिन इसकी मजबूती लगभग 50 मेगापास्कल तक रखी जाती है।

एक गर्डर बनाने में लगभग 65 ट्रक कंक्रीट यानी करीब 400 घन मीटर कंक्रीट लगता है। इसके अंदर हाई-टेन्साइल स्टील की तारें डाली जाती हैं, जिन्हें बेहद मजबूती से खींचकर बांधा जाता है, ताकि तेज रफ्तार ट्रेन का दबाव सहा जा सके।

स्टेशन नहीं, सिर्फ रफ्तार का गवाह बनेगा सखारे

करीब 1,000 इंजीनियर और कर्मचारी इस साइट पर लगातार काम कर रहे हैं। यह इलाका अब देश के सबसे व्यस्त निर्माण क्षेत्रों में से एक बन गया है।

हालांकि, सखारे गांव में बुलेट ट्रेन का कोई स्टेशन नहीं होगा। तय रूट के अनुसार ट्रेन मुंबई के बीकेसी (BKC) से शुरू होकर ठाणे और विरार होते हुए सीधे पालघर स्टेशन पर रुकेगी।

इसका मतलब यह है कि सखारे के लोग इस हाई-स्पीड ट्रेन को अपने गांव से गुजरते तो देखेंगे, लेकिन उन्हें स्टेशन की सुविधा नहीं मिलेगी।

विकास के साथ उम्मीदें भी जुड़ी

गांव के आदिवासी समुदाय के लिए यह परियोजना मिश्रित भावनाएं लेकर आई है। एक तरफ यह देश के विकास और तकनीकी प्रगति का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को अपने इलाके के विकास की उम्मीदें भी हैं।

लोगों की मांग है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट के जरिए उन्हें रोजगार के अवसर मिलें और गांव की बुनियादी सुविधाएं भी बेहतर हों।

निष्कर्ष

सखारे गांव आज भारत के विकास की उस तस्वीर का हिस्सा है, जहां परंपरागत जीवन और आधुनिक तकनीक एक साथ नजर आते हैं। यह गांव भले ही स्टेशन से वंचित हो, लेकिन देश की पहली बुलेट ट्रेन को अपनी जमीन से गुजरते देखने का गवाह जरूर बनेगा।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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