वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग से हटाने के प्रस्ताव पर केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने बिहार सरकार को पत्र लिखा। राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ और राजेश जैन दद्दू की मांग पर जैन समाज ने आभार जताया।
राजेश जैन दद्दू
वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान को लेकर बढ़ी चिंता
वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग से हटाकर कला, संस्कृति एवं संग्रहालय निदेशालय को हस्तांतरित करने के प्रस्ताव को लेकर देशभर के जैन समाज में चिंता बढ़ गई है। इस महत्वपूर्ण विषय पर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने बिहार सरकार को पत्र लिखकर संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग में ही बनाए रखने का आग्रह किया है।
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी देते हुए बताया कि संघ द्वारा दिए गए ज्ञापन पर कार्रवाई करते हुए केंद्रीय मंत्री ने बिहार सरकार से गंभीर पुनर्विचार करने की मांग की है।
Shivraj Singh Chouhan ने बिहार सरकार को लिखा पत्र
केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक धरोहर है। यदि इसे उच्च शिक्षा विभाग से हटाया गया तो इसकी शैक्षणिक और शोध गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।उन्होंने पत्र में यह भी स्पष्ट किया कि यह संस्थान केवल एक भवन नहीं बल्कि जैन दर्शन, प्राकृत भाषा और अहिंसा की परंपरा को संरक्षित करने वाला राष्ट्रीय केंद्र है। ऐसे में इसका स्वरूप बदला जाना उचित नहीं होगा।
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ की पहल
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ लंबे समय से इस विषय को लेकर सक्रिय है। संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए विभिन्न जनप्रतिनिधियों और शासन स्तर पर ज्ञापन सौंपे थे।संघ ने आशंका जताई थी कि यदि संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग से हटाया गया तो उसकी अकादमिक पहचान कमजोर हो जाएगी। साथ ही शोध कार्यों और विद्यार्थियों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
संघ की इस पहल के बाद अब केंद्रीय मंत्री द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखे जाने से जैन समाज में सकारात्मक संदेश गया है।
1956 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था शिलान्यास
वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान का ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत बड़ा है। केंद्रीय मंत्री ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि इस संस्थान का शिलान्यास भारत के प्रथम राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने वर्ष 1956 में किया था।यह संस्थान वर्षों से प्राकृत भाषा, जैन दर्शन, भारतीय संस्कृति और अहिंसा के क्षेत्र में शोध कार्य करता आ रहा है। यहां से जुड़े अनेक विद्वानों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया है।
प्राकृत भाषा और जैन दर्शन का प्रमुख केंद्र
वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान को देश में प्राकृत भाषा के सबसे महत्वपूर्ण शोध केंद्रों में माना जाता है। यहां जैन आगम, प्राचीन साहित्य, दर्शन और संस्कृति पर गहन अध्ययन एवं शोध किया जाता है।संस्थान ने हजारों विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को दिशा देने का कार्य किया है। जैन धर्म की अहिंसा आधारित विचारधारा को विश्व स्तर पर पहुंचाने में भी इसकी बड़ी भूमिका रही है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस संस्थान की मूल पहचान शैक्षणिक एवं शोध आधारित है, इसलिए इसे उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत ही बनाए रखना आवश्यक है।
मुख्यमंत्री से पुनर्विचार का आग्रह
केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने बिहार सरकार से आग्रह किया कि इस विषय पर संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ निर्णय लिया जाए। उन्होंने योग्य शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित करने तथा संस्थान को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर का उत्कृष्ट शोध केंद्र बनाने की दिशा में पहल करने की बात भी कही।उन्होंने विश्वास जताया कि बिहार सरकार जैन समाज की भावनाओं का सम्मान करेगी और देश की इस महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का निर्णय लेगी।
जैन समाज ने जताया आभार
केंद्रीय मंत्री द्वारा लिखे गए इस पत्र के बाद राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ सहित देशभर के सकल जैन समाज ने आभार व्यक्त किया है।प्राकृत भाषा के विद्वानों और जैन समाज के विभिन्न संगठनों ने इसे सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि इससे देश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिलेगा।संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि जैन समाज इस विषय को लेकर लगातार जागरूक रहेगा और संस्थान की मूल पहचान बनाए रखने के लिए प्रयास जारी रखेगा।
निष्कर्ष
वैशाली प्राकृत जैन शोध संस्थान केवल बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक और शैक्षणिक पहचान का प्रतीक है। जैन दर्शन, प्राकृत भाषा और अहिंसा की परंपरा को संरक्षित करने वाले इस संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग में बनाए रखने की मांग अब राष्ट्रीय स्तर पर उठने लगी है।
केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan द्वारा उठाया गया यह कदम जैन समाज के लिए उम्मीद की नई किरण माना जा रहा है।
