Indore के अहिल्या स्मारक में बनेगा “अहिल्या वन” और नर्मदा नदी का आर्टिफिशियल घाट
Indore में स्थित देवी अहिल्याबाई होलकर स्मारक को उसके मूल और ऐतिहासिक स्वरूप में वापस लाने के लिए बड़े स्तर पर पुनर्विकास कार्य किया जा रहा है। इस परियोजना के तहत परिसर में “अहिल्या वन” और नर्मदा नदी का एक आर्टिफिशियल घाट विकसित किया जाएगा, जो इस स्मारक को एक नया सांस्कृतिक और पर्यावरणीय स्वरूप देगा।
यह पूरा निर्माण कार्य पारंपरिक “लाइम वर्क” तकनीक के तहत किया जा रहा है, जिसमें चूने का उपयोग करके प्राचीन स्थापत्य शैली को पुनर्जीवित किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार यह परियोजना न केवल ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करेगी, बल्कि आधुनिक पर्यटन आकर्षण के रूप में भी विकसित होगी।
150 करोड़ की लागत से तीन चरणों में होगा विकास
यह पूरा प्रोजेक्ट लगभग साढ़े तीन एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जा रहा है और इसकी कुल लागत करीब 150 करोड़ रुपये आंकी गई है। निर्माण कार्य को तीन चरणों में पूरा किया जाएगा।
पहला चरण: भवन का नवीनीकरण
पहले चरण में पुराने आरटीओ भवन (रामपुर कोठी परिसर) का संपूर्ण नवीनीकरण किया जा रहा है। यहां मौजूद 28 कमरों का पुनर्निर्माण किया जाएगा और दो बेसमेंट भी तैयार किए जाएंगे।
दूसरा और तीसरा चरण: थीम आधारित विकास
अगले चरणों में परिसर में कुल 32 कमरों को “थीमेटिक जोन” के रूप में विकसित किया जाएगा। साथ ही होलकरकालीन शैली में एक भव्य किलेनुमा प्रवेश द्वार भी बनाया जाएगा।
अहिल्या वन और आर्टिफिशियल नर्मदा घाट होगा मुख्य आकर्षण
इस परियोजना का सबसे खास हिस्सा “अहिल्या वन” और “अहिल्या घाट” होगा। यहां नर्मदा नदी की प्रतीकात्मक झलक एक आर्टिफिशियल घाट के रूप में प्रस्तुत की जाएगी।
इस घाट में तकनीकी व्यवस्था के जरिए नर्मदा नदी से जुड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कहानियों को ऑडियो सिस्टम के माध्यम से दर्शाया जाएगा। आगंतुकों को मां नर्मदा की जीवन गाथा और देवी अहिल्याबाई के कार्यों की जानकारी एक अनुभवात्मक तरीके से दी जाएगी।
पर्यावरण संरक्षण को दी गई प्राथमिकता
परियोजना के दौरान एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि परिसर में मौजूद 60 से 70 वर्ष पुराने पेड़ों को सुरक्षित रखा जा रहा है। निर्माण कार्य में इन पेड़ों को काटने के बजाय संरक्षित करने की योजना अपनाई गई है।
इंजीनियरिंग डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि पेड़ों के चारों ओर संरचना बनाई जा सके और उन्हें किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है।
अहिल्या वन में औषधीय पौधों का विकास
“अहिल्या वन” को एक औषधीय और हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाएगा। यहां विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों के साथ अन्य वृक्षों का रोपण किया जाएगा।
इस वन का उद्देश्य न केवल पर्यावरण को मजबूत करना है, बल्कि आगंतुकों को प्रकृति और ऐतिहासिक विरासत के बीच एक अनूठा अनुभव देना भी है।
लाइम वर्क तकनीक से हो रहा पारंपरिक निर्माण
पूरे स्मारक में निर्माण कार्य पारंपरिक “लाइम वर्क पद्धति” से किया जा रहा है। इस तकनीक में सीमेंट की जगह चूने का उपयोग किया जाता है, जिससे भवनों को प्राचीन स्थापत्य शैली का स्वरूप मिलता है।
दीवारों और संरचनाओं पर पारंपरिक प्लास्टरिंग की जा रही है ताकि होलकरकालीन वास्तुकला को वास्तविक रूप में पुनर्जीवित किया जा सके।
होलकरकालीन विरासत को जीवंत करने की कोशिश
इस परियोजना का उद्देश्य केवल एक स्मारक का पुनर्निर्माण नहीं है, बल्कि होलकर वंश की गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है।
देवी अहिल्याबाई होलकर ने 18वीं शताब्दी में मालवा क्षेत्र पर शासन किया और अपने न्यायप्रिय प्रशासन, धार्मिक कार्यों और सामाजिक सुधारों के लिए इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त किया।
उनके कार्यकाल में महेश्वर को राजधानी बनाया गया, उद्योगों को बढ़ावा दिया गया और कई मंदिरों, धर्मशालाओं एवं सार्वजनिक स्थलों का निर्माण कराया गया।
थीम आधारित 32 कमरे और सांस्कृतिक जोन
स्मारक परिसर में बनने वाले 32 कमरों को अलग-अलग थीम के आधार पर तैयार किया जाएगा, जहां देवी अहिल्याबाई के जीवन, उनके कार्यों और होलकर शासनकाल की झलक दिखाई जाएगी।
इन थीम जोन के माध्यम से दर्शकों को इतिहास का जीवंत अनुभव मिलेगा, जिससे यह स्थान एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित हो सकेगा।
निर्माण कार्य की समयसीमा और प्रगति
अधिकारियों के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट को लगभग डेढ़ साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। फिलहाल पहले चरण का काम तेजी से चल रहा है, जिसमें प्लिंथ भराई, संरचनात्मक मजबूती और दीवारों का पुनर्निर्माण शामिल है।
निष्कर्ष
इंदौर का देवी अहिल्याबाई होलकर स्मारक अब एक नए रूप में सामने आने जा रहा है। “अहिल्या वन” और नर्मदा घाट जैसी नई संरचनाएं इसे केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और ऐतिहासिक अनुभव केंद्र बना देंगी।
यह परियोजना होलकरकालीन विरासत को आधुनिक तकनीक और पारंपरिक स्थापत्य कला के संगम के रूप में प्रस्तुत करेगी, जिससे इंदौर की पहचान और अधिक मजबूत होने की उम्मीद है

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