MP HC का बड़ा फैसला: महापौर निधि खत्म करने के आदेश पर रोक, सरकार को नोटिस जारी
मध्य प्रदेश में नगर निगमों की वित्तीय व्यवस्था को लेकर चल रहे विवाद में MP HC की ग्वालियर बेंच ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा महापौर निधि (Mayor Fund) को खत्म करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
यह मामला राज्य में स्थानीय स्वशासन, बजट अधिकार और प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसे संवैधानिक मुद्दों से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार के नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने 2 मार्च 2026 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें नगर निगमों में महापौर निधि को समाप्त करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के बाद राज्य के कई नगर निगमों में विवाद शुरू हो गया।
इसी आदेश को चुनौती देते हुए ग्वालियर नगर निगम की महापौर डॉ. शोभा सिकरवार ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में याचिका दायर की।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.पी.एस. रघुवंशी ने कोर्ट में दलील दी कि सरकार का यह आदेश मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उनका कहना था कि महापौर निधि नगर निगमों के विकास कार्यों के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय स्रोत है और इसे समाप्त करना स्थानीय निकायों की स्वायत्तता पर सीधा हमला है।
याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार इस तरह के निर्णय के माध्यम से नगर निगमों के बजट और विकास कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप कर रही है, जो कानून के दायरे में उचित नहीं है।
MP HC की ग्वालियर बेंच का अंतरिम आदेश
सुनवाई के दौरान ग्वालियर बेंच ने राज्य सरकार के आदेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले की पूरी सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक महापौर निधि को समाप्त करने का आदेश लागू नहीं किया जाएगा।
इसके साथ ही कोर्ट ने नगरीय विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को नोटिस जारी करते हुए विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने यह भी पूछा है कि किस आधार पर यह निर्णय लिया गया और क्या यह संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है।
सरकार की दलील क्या रही?
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि महापौर निधि का स्पष्ट प्रावधान मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1956 में नहीं है। सरकार का कहना था कि विकास कार्यों को अधिक पारदर्शी और सुव्यवस्थित बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि नगर निगमों में विकास कार्य अब महापौर निधि की बजाय मेयर इन काउंसिल (MIC) की मंजूरी से कराए जा सकते हैं, जिससे कार्यों में जवाबदेही बढ़ेगी और अनियमितताओं पर रोक लगेगी।
संवैधानिक पहलू और विवाद
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि राज्य सरकार का आदेश उप सचिव स्तर से जारी किया गया है, जो संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 166(3) के अनुसार राज्य सरकार के आदेश राज्यपाल के नाम या उनके अधिकार से जारी होने चाहिए।
इस आधार पर याचिकाकर्ता ने आदेश की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
नगर निगमों की स्वायत्तता का मुद्दा
यह मामला केवल एक वित्तीय निर्णय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्वशासन की स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है। नगर निगमों को संविधान के तहत स्वशासी संस्था का दर्जा प्राप्त है, जिससे उन्हें अपने विकास कार्यों और बजट के प्रबंधन का अधिकार मिलता है।
याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार किसी विशेष बजट मद को समाप्त करने का सीधा निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि इससे नगर निगमों की स्वायत्तता प्रभावित होती है।
महापौर निधि का महत्व
महापौर निधि नगर निगमों में स्थानीय स्तर पर छोटे और त्वरित विकास कार्यों के लिए उपयोग की जाती है। इससे सड़क सुधार, स्वच्छता, सामुदायिक सुविधाएं और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े कार्य तेजी से पूरे किए जाते हैं।
इसी कारण इस निधि को स्थानीय विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव
इस फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल भी बढ़ गई है। एक ओर सरकार अपने निर्णय को प्रशासनिक सुधार का हिस्सा बता रही है, वहीं विपक्ष और स्थानीय जनप्रतिनिधि इसे स्थानीय निकायों की शक्तियों को कमजोर करने का प्रयास बता रहे हैं।
अब सभी की नजरें इस मामले की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि महापौर निधि का भविष्य क्या होगा।
कोर्ट का अगला कदम
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई तय की जाएगी। तब तक महापौर निधि को समाप्त करने का आदेश स्थगित रहेगा।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का यह अंतरिम फैसला स्थानीय स्वशासन और राज्य सरकार के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह मामला न केवल वित्तीय प्रबंधन का है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और प्रशासनिक सीमाओं की व्याख्या से भी जुड़ा हुआ है।
आने वाले दिनों में इस मामले पर होने वाली सुनवाई यह तय करेगी कि नगर निगमों की वित्तीय स्वतंत्रता किस हद तक सुरक्षित रहेगी।
