“संसार में हमें मेहमान बनकर रहना है, मालिक बनकर नहीं” — आचार्य श्री विश्वरत्न सागरजी महाराज का प्रेरक प्रवचन
महिदपुर रोड में सोमवार को एक भव्य धार्मिक वातावरण देखने को मिला, जब परम पूज्य आचार्य नवरत्न सागर सूरीश्वरजी महाराज साहब के कृपापात्र शिष्य एवं महामंगलिक प्रदाता आचार्य श्री विश्वरत्न सागर सूरीश्वरजी महाराज साहब आदि ठाणा-5 का नगर में मंगल प्रवेश हुआ। यह आयोजन जैन समाज के लिए अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।
सुबह लगभग 8:00 बजे ताल रोड से ढोल-नगाड़ों के साथ आचार्य श्री का नगर प्रवेश प्रारंभ हुआ। सकल जैन श्री संघ सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर उपस्थित रहे। पूरे नगर में “जय गुरुदेव” के मंगलकारी जयकारों से वातावरण गूंज उठा।
मंगल प्रवेश का भव्य आयोजन
आचार्य श्री के नगर प्रवेश को लेकर पूरे क्षेत्र में विशेष उत्साह का माहौल था। श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर गुरुदेव का स्वागत किया। जैन समाज के विभिन्न संगठनों, महिला मंडलों, युवक मंडलों एवं बालिका परिषद ने भी इस अवसर पर सक्रिय सहभागिता निभाई।
नगर प्रवेश के पश्चात मंदिर परिसर में आचार्य श्री के मुखारविंद से सामूहिक चैत्यवंदन का आयोजन किया गया। इस दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया और आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।
धर्मसभा और आचार्य श्री का मंगल प्रवचन
नगर प्रवेश के पश्चात सुबह लगभग 9:30 बजे धर्मसभा का आयोजन किया गया, जिसमें आचार्य श्री विश्वरत्न सागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन से उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन का गूढ़ संदेश दिया।
अपने प्रवचन में उन्होंने कहा—
“हमें संसार में मेहमान बनकर रहना है, मालिक बनकर नहीं। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।”
उन्होंने समझाया कि यह संसार अस्थायी है और यहां कोई भी स्थायी रूप से नहीं रहता। जो लोग स्वयं को संसार का मालिक समझकर मोह, माया और आसक्ति में उलझ जाते हैं, वे दुख और बंधन के मार्ग पर चले जाते हैं।
जीवन का मूल संदेश: त्याग और वैराग्य
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में अनेक राजा-महाराजा अपनी सत्ता, संपत्ति और वैभव छोड़कर अंततः खाली हाथ ही इस संसार से विदा हुए हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन जन्म से खाली हाथ आता है और अंत में भी उसे खाली हाथ ही जाना पड़ता है। इसलिए जीवन का उद्देश्य केवल संग्रह करना नहीं, बल्कि आत्मकल्याण करना होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रबल पुण्य के कारण ही मनुष्य को उत्तम जाति, उत्तम कुल और जैन धर्म जैसे पवित्र धर्म का ज्ञान प्राप्त होता है। यह अवसर बहुत दुर्लभ है और इसका सदुपयोग करना ही सच्चा धर्म है।
कर्म और मोक्ष का संदेश
अपने प्रवचन में आचार्य श्री ने कर्म सिद्धांत पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य अपने कर्मों का क्षय नहीं करता, तो उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।
उन्होंने कहा कि संसार में दुख, सुख, जन्म और मृत्यु सभी कर्मों के अनुसार ही होते हैं। यदि मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध नहीं करता, तो उसे नरक जैसी स्थितियों का भी सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए जीवन का मुख्य उद्देश्य कर्मों का क्षय कर आत्मा को शुद्ध करना होना चाहिए।

कषाय और माया जाल पर उपदेश
आचार्य श्री ने आगे कहा कि कषाय (क्रोध, मान, माया और लोभ) ही संसार का मूल कारण है। यह कषाय ही मनुष्य को माया जाल में फंसाकर संसार के बंधन को मजबूत करता है।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य राग, द्वेष और मोह के बंधनों से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे सच्ची शांति प्राप्त नहीं हो सकती।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे धर्म आराधना के माध्यम से अपने मन को शुद्ध करें और मोह-माया के बंधनों से स्वयं को मुक्त करें।
आत्मकल्याण का मार्ग
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत मूल्यवान है और इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म आराधना, तपस्या और साधना के माध्यम से ही आत्मकल्याण संभव है।
उन्होंने कहा—
“हमें अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाना है और आत्मा के उत्थान के मार्ग पर चलना है।”
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को साधार्मिक भक्ति, सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
साधार्मिक भक्ति और समाज सेवा
इस अवसर पर साधार्मिक भक्ति का लाभ समरथमल शुभम और संकेश कुमार चौरड़िया परिवार द्वारा लिया गया। कार्यक्रम में जैन समाज के अनेक गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे।
समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी, क्षेत्रीय विधायक एवं समाज गौरव दिनेश जैन बौस, जैन श्री संघ अध्यक्ष अजय चौरड़िया सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस धर्मसभा में भाग लिया।
महिला मंडल, नवयुवक मंडल, तरुण बालिका परिषद एवं अन्य सामाजिक संगठनों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और अधिक भव्य बना दिया।
आध्यात्मिक वातावरण और श्रद्धालुओं की सहभागिता
पूरे कार्यक्रम के दौरान वातावरण अत्यंत आध्यात्मिक और भक्तिमय रहा। ढोल-नगाड़ों की ध्वनि, जयकारों की गूंज और धार्मिक मंत्रोच्चार ने पूरे नगर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रवचन को ध्यानपूर्वक सुना और जीवन में धर्म के महत्व को समझने का प्रयास किया।
आगामी विहार और कार्यक्रम
आचार्य श्री विश्वरत्न सागरजी महाराज का विहार संध्या समय यहां से रूपेटा, नागदा, खाचरोद होते हुए पेटलावद की ओर प्रस्तावित है। वहां 17 तारीख को महामंगलिक का आयोजन किया जाएगा, जो आचार्य श्री की पावन निश्रा में संपन्न होगा।
इसके पश्चात उनका आगामी चातुर्मास महाराष्ट्र के नागपुर में होगा, जिसका मंगल प्रवेश 19 जुलाई को निर्धारित किया गया है।
निष्कर्ष
आचार्य श्री विश्वरत्न सागरजी महाराज का यह प्रवचन केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है। “संसार में मेहमान बनकर रहो, मालिक बनकर नहीं” यह संदेश मनुष्य को विनम्रता, त्याग और आत्मकल्याण की ओर प्रेरित करता है।
यह आयोजन न केवल जैन समाज के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आध्यात्मिक जागृति का संदेश लेकर आया है। धर्म, त्याग, संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य सच्चे अर्थों में जीवन को सफल बना सकता है।
