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माँ ही राष्ट्र की पहली पाठशाला है, मातृत्व पर Dr. Jayendra Jain का प्रेरणादायक लेख

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Published On: 8 May 2026
Mother is the first school of the nation; inspiring article on motherhood by Dr. Jayendra Jain

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माँ ही राष्ट्र की पहली पाठशाला

विश्व मातृत्व दिवस पर विशेष लेख
Dr. Jayendra Jain “निप्पू चन्देरी”
राष्ट्रीय गौरव, विधायक प्रतिनिधि
मो. 9407222244

गुजरात की एक साधारण-सी गली, सुबह की हल्की धूप, घर के आँगन में बैठी एक वृद्ध माँ—चेहरे पर झुर्रियाँ, आँखों में गहरा स्नेह और हाथों में वर्षों के संघर्ष की कहानी। वह कोई रानी नहीं थी, न ही उसके पास कोई भौतिक वैभव था, लेकिन उसके आँचल में वह अनमोल संपत्ति थी जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता—संस्कार।

वह माँ थीं—Heeraba ।

माँ केवल जन्म देने वाली नहीं होती, वह जीवन की पहली पाठशाला होती है। बच्चा पहला शब्द माँ से सीखता है, पहला व्यवहार माँ से देखता है और पहला संस्कार माँ से प्राप्त करता है। यदि संसार में कोई रिश्ता पूर्णतः निस्वार्थ है, तो वह माँ का रिश्ता है।

मातृत्व: त्याग का मौन उत्सव

विश्व मातृत्व दिवस केवल औपचारिक बधाई देने या फूल अर्पित करने का दिन नहीं है। यह उस त्याग को नमन करने का अवसर है, जो बिना किसी अपेक्षा के जीवनभर चलता है।

माँ अपने दर्द को छुपाकर बच्चों की मुस्कान सजाती है। वह भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चे को भूखा नहीं देख सकती। वह थक सकती है, लेकिन उसके कर्तव्य कभी नहीं थकते।

भारतीय संस्कृति में माँ को “मातृदेवो भव” कहकर देवत्व का स्थान दिया गया है। यह केवल श्लोक नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है।

हीराबा: साधारण जीवन में असाधारण शक्ति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माँ हीराबा एक साधारण जीवन जीने वाली असाधारण महिला थीं। गरीबी उनके जीवन का हिस्सा थी, लेकिन उन्होंने उसे कभी अपने बच्चों के भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

वे अक्सर कहती थीं कि गरीब होना अपराध नहीं है, लेकिन गरीब सोच रखना अपराध है। उनके जीवन में कोई राजसी सुविधा नहीं थी, परंतु उनका जीवन अनुशासन, श्रम और संस्कारों से भरा हुआ था।

सुबह की शुरुआत से लेकर रात के अंत तक उनका जीवन परिवार की सेवा में समर्पित रहता था। घर के छोटे-छोटे कार्य, दूसरों के घरों में काम, और बच्चों के भविष्य की चिंता—यह सब उनका रोजमर्रा का जीवन था।

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माँ का सरल दर्शन

एक बार बालक नरेंद्र घर लौटा। थका हुआ था। माँ ने पूछा—“खाना खाएगा?”

बच्चे ने मुस्कराकर कहा—“पहले आप बैठिए।”

माँ ने सहजता से कहा—“माँ कभी थकती है क्या?”

यह वाक्य केवल एक संवाद नहीं था, बल्कि भारतीय मातृत्व का सार था। माँ का शरीर थकता है, पर उसका प्रेम कभी नहीं थकता।

माँ: समाज की आधारशिला

हमारे समाज में अनगिनत माताएँ हैं, जिनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं होते, लेकिन वही इतिहास की नींव रखती हैं।

कोई खेतों में काम करती है, कोई घर-घर जाकर मजदूरी करती है, कोई सीमित साधनों में बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करती है। वे कभी मंच पर नहीं आतीं, लेकिन उनका योगदान राष्ट्र निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण होता है।

आधुनिकता और टूटता पारिवारिक ढांचा

आज का समय आधुनिकता की दौड़ का समय है। ऊँची इमारतें, तेज़ तकनीक, डिजिटल दुनिया—सब कुछ बदल गया है, लेकिन संवेदनाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।

वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं और घरों में अकेलापन बढ़ रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि जिसने हमें चलना सिखाया, वही आज सहारे के लिए तरसती है।

सभ्यता ने हमें शिक्षित तो किया है, लेकिन संवेदनशीलता कहीं पीछे छूट गई है।

माँ का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता

मनुष्य चाहे कितना भी बड़ा बन जाए—अधिकारी, व्यापारी या नेता—माँ के सामने वह हमेशा बच्चा ही रहता है।

माँ का प्रेम बिना शर्त होता है। वह न पद देखती है, न प्रतिष्ठा। उसके लिए उसका बच्चा हमेशा सबसे प्रिय होता है।

मातृत्व: राष्ट्र निर्माण की नींव

एक माँ केवल परिवार नहीं बनाती, वह समाज और राष्ट्र का चरित्र भी गढ़ती है।

जब माँ ईमानदारी सिखाती है, तो चरित्र बनता है।
जब वह करुणा सिखाती है, तो मानवता जन्म लेती है।
जब वह संघर्ष सिखाती है, तो राष्ट्र मजबूत होता है।

इसलिए कहा गया है—
“यदि एक माँ संस्कारित है, तो पूरा परिवार संस्कारित होता है।”

हीराबा: भारतीय मातृत्व का प्रतीक

हीराबा का जीवन भारतीय नारी शक्ति का प्रतीक है। सादगी, सेवा, त्याग और संस्कार—यही उनकी पहचान थी।

उन्होंने यह साबित किया कि महान व्यक्तित्व केवल बड़े विद्यालयों या सुविधाओं में नहीं बनते, बल्कि माँ की गोद में बनते हैं।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि महानता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि भीतर की सादगी में होती है।

माँ का मौन संदेश

माँ अक्सर कम बोलती है, लेकिन बहुत कुछ सिखा जाती है। उसका मौन ही उसका सबसे बड़ा संदेश होता है।

उसकी आँखों में छुपा प्रेम, उसकी थकान में छुपी चिंता और उसके त्याग में छुपा जीवन—ये सब मिलकर उसे ईश्वर के सबसे निकट बना देते हैं।

विश्व मातृत्व दिवस का संदेश

विश्व मातृत्व दिवस हमें केवल सम्मान व्यक्त करने का अवसर नहीं देता, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर देता है।

क्या हम अपनी माँ के त्याग को समझ पा रहे हैं?
क्या हम उनके मौन को सुन पा रहे हैं?
क्या हम उन्हें वह सम्मान दे पा रहे हैं जिसकी वे अधिकारी हैं?

निष्कर्ष

माँ धरती पर ईश्वर का सबसे सजीव रूप है। वह बिना कुछ माँगे सब कुछ देती है। वह टूटकर भी अपने बच्चों को संभालती है।

हीराबा जैसी माताएँ हमें यह संदेश देती हैं कि सच्ची महानता सादगी और संस्कारों में है।

आज आवश्यकता है कि हम मातृत्व को केवल उत्सव न मानें, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारें।

अंत में केवल इतना ही—
माँ वह दीपक है जो खुद जलकर दूसरों का जीवन रोशन करती है।
उसके बिना घर केवल भवन रह जाता है, घर नहीं बनता।

विश्व मातृत्व दिवस पर हर माँ को शत-शत नमन।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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