Vidisha । श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में आयोजित द्वितीय जिन देशना बाल युवा संस्कार शिविर निरंतर धार्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों और युवाओं को जैन धर्म के सिद्धांतों से जोड़ रहा है। शिविर का पांचवां दिन विशेष रूप से जैन दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धांत “छह द्रव्य” की विस्तृत व्याख्या के लिए यादगार रहा।
इस अवसर पर प्रसिद्ध विद्वान पंडित अनुभव शास्त्री करेली ने जैन सिद्धांत प्रवेशिका के अंतर्गत “छह द्रव्य” विषय पर अत्यंत गहन, तार्किक और ज्ञानवर्धक प्रवचन दिया। उन्होंने उदाहरणों और सरल भाषा के माध्यम से समझाया कि संसार की प्रत्येक क्रिया के संचालन के लिए छह द्रव्यों की आवश्यकता होती है।
शिविर में बच्चों और युवाओं के लिए धार्मिक शिक्षा, संस्कार, स्वाध्याय, सांस्कृतिक कार्यक्रम और ज्ञानवर्धक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। पांचवें दिन का कार्यक्रम आध्यात्मिक ऊर्जा, अनुशासन और उत्साह से भरपूर रहा।
नियमित अभिषेक, पूजन और स्वाध्याय से दिन की शुरुआत
शिविर की शुरुआत प्रतिदिन की तरह भगवान के अभिषेक, पूजन और स्वाध्याय से हुई। सुबह के समय मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। बच्चों और युवाओं ने पूर्ण श्रद्धा और अनुशासन के साथ धार्मिक गतिविधियों में भाग लिया।
आयोजकों ने बताया कि शिविर का उद्देश्य केवल धार्मिक जानकारी देना नहीं, बल्कि बच्चों में संस्कार, अनुशासन और आध्यात्मिक सोच विकसित करना भी है। इसी कारण प्रतिदिन प्रार्थना, पूजन और ध्यान जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
शिविर में भाग लेने वाले बच्चों को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों और व्यवहारिक जीवन में धर्म के महत्व के बारे में भी बताया जा रहा है।
बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाओं का संचालन
शिविर में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाएं संचालित की जा रही हैं। प्रत्येक कक्षा में बच्चों की समझ और आयु के अनुसार पाठ्य सामग्री तैयार की गई है।
इन कक्षाओं में जैन धर्म का इतिहास, तीर्थंकरों का जीवन, पंचमहाव्रत, संस्कार, आचरण, ध्यान, स्वाध्याय और जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों की जानकारी दी जा रही है।
आयोजकों का मानना है कि बच्चों को छोटी उम्र से ही धार्मिक और नैतिक शिक्षा मिलेगी तो वे जीवन में सही दिशा प्राप्त करेंगे।
“हम बनेंगे ज्ञानवान” कार्यक्रम बना आकर्षण का केंद्र
शिविर के अंतर्गत रात्रिकालीन सत्र में “हम बनेंगे ज्ञानवान” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में खेल-खेल में धार्मिक प्रश्नोत्तरी कराई गई, जिसमें बच्चों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
प्रश्नोत्तरी के दौरान जैन धर्म, तीर्थंकरों, धार्मिक ग्रंथों और नैतिक मूल्यों से जुड़े प्रश्न पूछे गए। सही उत्तर देने वाले बच्चों को प्रोत्साहन स्वरूप सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में धर्म के प्रति रुचि बढ़ाना और सीखने की प्रक्रिया को रोचक बनाना था। बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए अपनी धार्मिक जानकारी का प्रदर्शन किया।

“छह द्रव्य” विषय पर पंडित अनुभव शास्त्री का विशेष प्रवचन
पांचवें दिन का मुख्य आकर्षण पंडित अनुभव शास्त्री करेली का “छह द्रव्य” विषय पर दिया गया प्रवचन रहा। उन्होंने जैन दर्शन के इस गूढ़ विषय को अत्यंत सरल और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि संसार की प्रत्येक क्रिया छह द्रव्यों के सहयोग से ही संपन्न होती है। न तो पाँच द्रव्य पर्याप्त हैं और न ही सात की आवश्यकता है। जैन दर्शन ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से छह द्रव्यों को स्वीकार किया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी भी क्रिया में एक भी द्रव्य अनुपस्थित हो जाए तो वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता।
छह द्रव्य ही क्यों आवश्यक हैं?
पंडित अनुभव शास्त्री ने इस विषय को समझाने के लिए एक सरल उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि “जब हम पेन से कॉपी में लिखते हैं, तब भी यह कार्य छह द्रव्यों के सहयोग से ही संभव होता है।”
उन्होंने बताया कि संसार में जितने प्रकार की क्रियाएं दिखाई देती हैं, उनके लिए उतने ही कारण आवश्यक होते हैं। जैन दर्शन के अनुसार ये कारण छह द्रव्यों के रूप में कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म केवल आस्था पर आधारित नहीं है, बल्कि इसमें गहरा तर्क और विज्ञान भी समाहित है।
धर्म और अधर्म द्रव्य की भूमिका को किया स्पष्ट
प्रवचन के दौरान उपस्थित श्रोताओं ने प्रश्न किया कि जब जीव और पुद्गल आकाश में ही गमन और स्थिति करते हैं, तो धर्म और अधर्म द्रव्य की आवश्यकता क्यों है?
इसका उत्तर देते हुए पंडित शास्त्री ने कहा कि आकाश स्वयं गति का कारण नहीं है। यदि आकाश को गति का कारण मान लिया जाए, तो लोक और अलोक की सीमाएं समाप्त हो जाएंगी।
उन्होंने कहा कि सिद्ध भगवान लोक के अंतिम भाग में विराजमान रहते हैं और उससे आगे नहीं जाते। यदि केवल आकाश ही गति का कारण होता, तो जीव अनंत काल तक चलता रहता।
पंचास्तिकाय संग्रह का उल्लेख
पंडित अनुभव शास्त्री ने आचार्य कुंदकुंद देव के प्रसिद्ध ग्रंथ पंचास्तिकाय संग्रह का उल्लेख करते हुए बताया कि धर्म द्रव्य ही लोक और अलोक का विभाजन करता है।
उन्होंने कहा कि जीव और पुद्गल तीन लोक से बाहर गमन नहीं करते। यह व्यवस्था धर्म द्रव्य के कारण ही संभव है।
उन्होंने अत्यंत सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे तैरने के लिए पानी आवश्यक है, लेकिन पानी स्वयं किसी को तैराता नहीं, उसी प्रकार धर्म द्रव्य भी केवल गमनशील जीव और पुद्गल के लिए निमित्त बनता है।
अधर्म द्रव्य की भूमिका
पंडित शास्त्री ने आगे बताया कि अधर्म द्रव्य स्थिरता का निमित्त है।
उन्होंने कहा कि अधर्म द्रव्य किसी को रोकता नहीं, बल्कि ठहरने वाले जीव-पुद्गल के लिए उपयुक्त स्थिति प्रदान करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म द्रव्य चलाता नहीं और अधर्म द्रव्य रोकता नहीं। दोनों केवल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं, जिनके माध्यम से क्रियाएं संभव हो पाती हैं।
अज्ञानी जीव और कर्तृत्व का अहंकार
प्रवचन के दौरान पंडित अनुभव शास्त्री ने आत्मा और कर्तृत्व के विषय में भी विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि अज्ञानी जीव वास्तव में कुछ नहीं करता, बल्कि केवल कर्तृत्व का अहंकार करता है। संसार में होने वाली प्रत्येक क्रिया छह द्रव्यों के परस्पर सहयोग से होती है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, तब उसका अहंकार समाप्त होने लगता है और वह आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है।
अलोकाकाश और गति का सिद्धांत
उन्होंने यह भी बताया कि अलोकाकाश में धर्म द्रव्य नहीं होता, इसलिए वहां गति संभव नहीं है।
यदि सर्वज्ञ को स्वीकार नहीं किया जाए, तो तीन लोक की सिद्धि भी संभव नहीं होगी और तीन लोक के बिना छह द्रव्य का सिद्धांत भी अधूरा रह जाएगा।
उन्होंने बच्चों और युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जैन दर्शन अत्यंत वैज्ञानिक और तार्किक है। इसे समझने के लिए निरंतर अध्ययन और स्वाध्याय आवश्यक है।
बच्चों और युवाओं में दिखा उत्साह
शिविर में शामिल बच्चों और युवाओं ने पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ कार्यक्रमों में भाग लिया।
धार्मिक प्रश्नोत्तरी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और प्रवचन सत्रों में बच्चों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
आयोजकों ने बताया कि बच्चों को धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ व्यक्तित्व विकास, आत्मविश्वास और सामाजिक जिम्मेदारी का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बढ़ाया उत्साह
शिविर में धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है।
बच्चों ने भक्ति गीत, नाटक, समूह प्रस्तुति और संस्कार आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाई।
इन प्रस्तुतियों ने उपस्थित श्रद्धालुओं और अभिभावकों का मन मोह लिया।
जैन धर्म के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास
आयोजकों का कहना है कि वर्तमान समय में बच्चों और युवाओं को संस्कारों से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
मोबाइल और डिजिटल युग में बच्चों का ध्यान धार्मिक और नैतिक मूल्यों की ओर आकर्षित करने के लिए इस प्रकार के शिविर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शिविर के माध्यम से बच्चों को जैन धर्म के सिद्धांतों, संयम, अहिंसा और आत्मचिंतन की शिक्षा दी जा रही है।
समाज में सकारात्मक संदेश
शिविर के माध्यम से समाज में यह संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि धार्मिक शिक्षा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है।
पंडित अनुभव शास्त्री के प्रवचनों ने बच्चों और युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कठिन विषयों को सरल भाषा में समझाकर सभी को जैन दर्शन के वैज्ञानिक स्वरूप से परिचित कराया।

आयोजन में समाजजनों का सहयोग
शिविर के सफल संचालन में समाजजनों और स्वयंसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
आयोजकों ने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु शिविर में पहुंचकर बच्चों का उत्साहवर्धन कर रहे हैं।
अभिभावकों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे शिविर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और संस्कार निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
प्रवक्ता ने दी जानकारी
अखिल भारतीय जैन युवा फेडरेशन विदिशा के प्रवक्ता शोभित जैन ने बताया कि शिविर का उद्देश्य बच्चों और युवाओं को जैन धर्म के सिद्धांतों से जोड़ना और उनमें संस्कारों का विकास करना है।
उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में भी शिविर के अंतर्गत कई विशेष कार्यक्रम, प्रवचन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी।
निष्कर्ष
द्वितीय जिन देशना बाल युवा संस्कार शिविर का पांचवां दिन ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। पंडित अनुभव शास्त्री द्वारा “छह द्रव्य” विषय पर दिया गया प्रवचन बच्चों और युवाओं के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक साबित हुआ।
शिविर के माध्यम से न केवल धार्मिक शिक्षा दी जा रही है, बल्कि बच्चों में नैतिक मूल्यों, अनुशासन और आत्मविश्वास का भी विकास किया जा रहा है।
इस प्रकार के आयोजन समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति एवं जैन दर्शन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
