जैन धर्म के मूल सिद्धांत पर विदिशा में आयोजित शिविर में अनुभव शास्त्री ने वीतरागता, सिद्धत्व और आत्मज्ञान का गहरा संदेश दिया। जानें पूरी खबर।
जैन धर्म के मूल सिद्धांत: वीतरागता और सिद्धत्व प्राप्ति का मार्ग स्वाध्याय से ही मिलेगा — अनुभव शास्त्री
विदिशा से विशेष रिपोर्ट
विदिशा। जैन धर्म के मूल सिद्धांत को आत्मसात कराने के उद्देश्य से श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में 3 मई से 9 मई तक आयोजित जिन देशना बाल युवा संस्कार शिविर के द्वितीय दिन विभिन्न कक्षाओं का सफल संचालन किया गया।प्रवक्ता शोभित जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि शिविर में कुल 210 शिविरार्थी शामिल हैं, जिनमें से 14 वर्ष तक के 120 बच्चे प्रतिदिन प्रातः समय से मंदिर में उपस्थित होकर नियमित सहभागिता कर रहे हैं।
शिविर में बच्चों की सक्रिय भागीदारी
जैन धर्म के मूल सिद्धांत को व्यवहार में लाने के लिए बच्चों को विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है।प्रतिदिन सुबह 7 बजे से नित्य पूजन एवं कक्षाएं प्रारंभ होती हैं। वहीं सायंकालीन समय में छोटे-छोटे बच्चों द्वारा अद्भुत नाटकों का मंचन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में अभिभावक एवं समाजजन भी भाग ले रहे हैं।धार्मिक गतिविधियों की बारीक जानकारी बच्चों को दी जा रही है, जिससे उनमें संस्कारों का विकास हो सके।
धार्मिक लकी ड्रॉ बना आकर्षण का केंद्र
समर्थ शास्त्री द्वारा प्रतिदिन धार्मिक प्रश्नों के माध्यम से लकी ड्रॉ का आयोजन किया जा रहा है।इसमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है, और सही उत्तर देने वालों को पर्ची निकालकर पुरस्कार प्रदान किए जा रहे हैं।शिविर आयोजकों एवं ट्रस्ट द्वारा अधिक से अधिक धर्म लाभ लेने की अपील की गई है।
अनुभव शास्त्री का प्रवचन: जैन धर्म के मूल सिद्धांत का सार
अनुभव शास्त्री द्वारा “लघु जैन सिद्धांत प्रवेशिका” पर आधारित प्रवचन में जैन धर्म के मूल सिद्धांत को विस्तार से समझाया गया।उन्होंने वीतरागता के महत्व, सर्वज्ञ (तीर्थंकर) की प्रामाणिकता और मोक्ष मार्ग पर विशेष प्रकाश डाला।
वीतरागता: जैन धर्म का परम लक्ष्य
अनुभव शास्त्री ने बताया कि जैन धर्म के मूल सिद्धांत का अंतिम उद्देश्य वीतरागता की प्राप्ति है।वीतरागता का अर्थ है—राग और द्वेष से पूर्णतः मुक्त होना।इसी अवस्था में आत्मा शुद्ध होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।
सर्वज्ञ की प्रामाणिकता
जैन धर्म के मूल सिद्धांत में सर्वज्ञ (तीर्थंकर) को तीन लोक और तीन काल का ज्ञाता माना गया है।उन्होंने बताया कि स्वर्ग, नरक और कर्म जैसे गूढ़ विषयों का ज्ञान केवल सर्वज्ञ के माध्यम से ही संभव है।साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जैन दर्शन में किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर की मान्यता नहीं है।
परिग्रह त्याग का महत्व
जैन धर्म के मूल सिद्धांत में परिग्रह त्याग को अत्यंत आवश्यक बताया गया है।अत्यधिक संग्रह, आरंभ और दूसरों के परिग्रह की अनुमोदना ही दुख और संसार का कारण है।इसलिए संयम और संतोष ही जीवन का आधार होना चाहिए।
जैन धर्म का सार
जैन धर्म के मूल सिद्धांत के अनुसार—
- आत्मा के प्रति समर्पण
- सभी जीवों के प्रति प्रेम
- द्वेष रहित भाव
यही सच्चा धर्म है।
अज्ञानता और चमत्कार पूजा का निषेध
अनुभव शास्त्री ने कहा कि जिन देव के पास जाकर धन-दौलत मांगना अज्ञानता का प्रतीक है।वीतरागी में चमत्कार देखना और उसे पूज्य मानना दर्शन मोह का कारण है।अशरीरी आत्मा को मानने वाले के लिए देह पूजा का कोई महत्व नहीं है।
जिन मंदिर का महत्व
जैन धर्म के मूल सिद्धांत के अनुसार जिन मंदिर को कल्पवृक्ष और समवसरण के समान माना गया है।यह केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि आत्मचिंतन का केंद्र है।
जिन दर्शन का वास्तविक अर्थ
जिन दर्शन का वास्तविक अर्थ भगवान के चेतन स्वरूप को देखकर स्वयं के चेतन स्वरूप का अनुभव करना है।यही सच्चा आत्मदर्शन है।
अंतिम लक्ष्य: सिद्धत्व (मोक्ष) की प्राप्ति
अनुभव शास्त्री ने स्पष्ट किया कि जैन धर्म के मूल सिद्धांत का अंतिम लक्ष्य सिद्धत्व यानी मोक्ष प्राप्त करना है।उन्होंने “लघु जैन सिद्धांत प्रवेशिका” को मुक्ति की ओर ले जाने वाली प्रेरणादायक ग्रंथ बताया।




