सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: TMC की याचिका पर कोई हस्तक्षेप नहीं
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना से ठीक पहले एक अहम कानूनी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने चुनाव आयोग के उस निर्देश को चुनौती दी थी जिसमें केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर के रूप में नियुक्त करने की बात कही गई थी।
TMC ने इस फैसले को संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। पार्टी का कहना था कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को मतगणना प्रक्रिया से बाहर रखना निष्पक्षता पर सवाल उठाता है और यह लोकतांत्रिक ढांचे के खिलाफ है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस मामले में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और चुनाव आयोग के बयान को रिकॉर्ड में लेते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
चुनाव आयोग का सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट आश्वासन
सुनवाई के दौरान भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने अदालत को भरोसा दिलाया कि मतगणना प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और संतुलित होगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को भी मतगणना प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। आयोग ने कहा कि उसके सर्कुलर का उद्देश्य किसी एक पक्ष को बाहर करना नहीं, बल्कि प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित और निष्पक्ष बनाना है।
नायडू ने अदालत में कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर को यह अधिकार होता है कि वह उपलब्ध अधिकारियों में से उपयुक्त कर्मचारियों की नियुक्ति करे और इसमें राज्य तथा केंद्र दोनों स्तर के अधिकारी शामिल हो सकते हैं।
TMC की दलील: संविधान के अनुच्छेद 324 का उल्लंघन
TMC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में जोरदार दलील दी कि चुनाव आयोग का यह निर्णय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का अधिकार देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आयोग किसी एक स्तर की सरकार के कर्मचारियों को पूरी तरह बाहर कर दे।
सिब्बल ने यह भी कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को मतगणना से दूर रखना न केवल प्रशासनिक असंतुलन पैदा करता है, बल्कि इससे राजनीतिक संदेह भी बढ़ता है।
उनका तर्क था कि यदि पहले से ही नियमों में राज्य और केंद्र दोनों के अधिकारियों को शामिल करने की व्यवस्था है, तो केवल केंद्र के कर्मचारियों को प्राथमिकता देना अनुचित है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: दोनों विकल्प नियमों में मौजूद
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव नियमों के तहत काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट दोनों पदों पर केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के कर्मचारियों की नियुक्ति का विकल्प मौजूद है।
कोर्ट ने कहा कि जब नियमों में दोनों विकल्प खुले हैं, तो चुनाव आयोग के फैसले को अवैध नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव प्रक्रिया एक अत्यंत संवेदनशील विषय है और इसमें न्यायालय को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन हो।
मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी आश्वासन दिया कि पूरी मतगणना प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की जाएगी।
आयोग ने कहा कि सभी राजनीतिक दलों के अधिकृत एजेंट मतगणना केंद्रों पर मौजूद रहेंगे ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता की संभावना को रोका जा सके।
इसके अलावा, सभी मतगणना केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे और उनकी रिकॉर्डिंग को कम से कम 45 दिनों तक सुरक्षित रखा जाएगा ताकि जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।
TMC की चिंता: निष्पक्षता पर सवाल
TMC का कहना है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय राज्य की भूमिका को कमजोर करता है और इससे मतगणना प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
पार्टी ने दावा किया कि राज्य सरकार के कर्मचारियों को पूरी तरह से बाहर रखने से प्रशासनिक संतुलन प्रभावित होता है और इससे राजनीतिक रूप से गलत संदेश जाता है।
TMC ने यह भी कहा कि यह निर्णय अचानक लिया गया और इससे चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की बजाय संदेह बढ़ता है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने जो आश्वासन दिया है, उसे रिकॉर्ड में लिया जाता है।
अदालत ने कहा कि जब आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके सर्कुलर का पालन पूरी तरह किया जाएगा, तो इस मामले में किसी अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता नहीं है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।
कलकत्ता हाई कोर्ट पहले ही कर चुका था याचिका खारिज
इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी TMC की याचिका को खारिज कर दिया था।
हाई कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है और यह मामला आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसके बाद TMC ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, लेकिन वहां भी उसे कोई राहत नहीं मिली।
राजनीतिक माहौल में बढ़ी हलचल
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट आ गई है।
विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सत्ताधारी पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है और सभी नियमों का पालन किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विवाद चुनावी माहौल को प्रभावित करते हैं, लेकिन अंतिम रूप से जनता का निर्णय ही सबसे महत्वपूर्ण होता है।
