छत्तीसगढ़ में भारतमाला परियोजना को लेकर एक और बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। अभनपुर और कुरुद के बाद अब Rajnandgaon जिले में भूमि अधिग्रहण और मुआवजा वितरण में भारी अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। नए दस्तावेज सामने आने के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है, जिसमें करोड़ों रुपये के गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है।
घोटाले का विस्तार और शुरुआती खुलासा
मामले की शुरुआत तब हुई जब भारतमाला सड़क परियोजना के अंतर्गत आने वाले गांवों में भूमि अधिग्रहण और मुआवजा वितरण के रिकॉर्ड की जांच की गई। जांच में सामने आया कि कई स्थानों पर एक ही भूमि को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर बार-बार मुआवजा लिया गया।
नईदुनिया को मिले दस्तावेजों के अनुसार ग्राम देवादा, पटवारी हल्का 63 में मुआवजा वितरण प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं पाई गईं। आरोप है कि फर्जी फसल, पौधारोपण और भूमि उपयोग का गलत विवरण देकर मुआवजे की राशि बढ़ाई गई।
पूर्व मंत्री के रिश्तेदारों पर आरोप
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप पूर्व मंत्री के चचेरे भाई भूपेंद्र चंद्राकर और नान घोटाले के आरोपी रोशन चंद्राकर पर लगे हैं। आरोप है कि इन्होंने भारतमाला सड़क परियोजना के प्रस्तावित रूट को पहले से जानकर उन गांवों में जमीन खरीदी जहां से सड़क गुजरनी थी।
जमीन खरीदने के बाद इन लोगों ने मुआवजा प्रक्रिया शुरू होने पर उसी भूमि के लिए भारी भरकम मुआवजा प्राप्त किया। यह पूरा नेटवर्क सुनियोजित तरीके से काम करता हुआ प्रतीत होता है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है।
भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में गड़बड़ी
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार भारतमाला परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2018 में शुरू हुई थी। प्रारंभिक अधिसूचना 9 मार्च 2018 को जारी की गई थी, जबकि अवार्ड 25 फरवरी 2019 को पारित किया गया था। इसके बाद 2022 और 2024 में संशोधित अवार्ड जारी किए गए।
इन सभी चरणों के बीच नामांतरण, रजिस्ट्री और मुआवजा वितरण प्रक्रिया में बार-बार संशोधन किए गए, जिससे संदेह गहराता गया। कई खसरों में एक ही भूमि के लिए अलग-अलग प्रविष्टियां दर्ज की गईं और भुगतान कई बार किया गया।
फर्जी नामांतरण और रिकॉर्ड में हेरफेर
शिकायत में दावा किया गया है कि आरजीएस कॉलोनाइजर प्रा. लि. और उससे जुड़े डायरेक्टरों ने भूमि को छोटे-छोटे खसरा टुकड़ों में विभाजित किया। इसके बाद अलग-अलग नामों से उन टुकड़ों को दर्शाकर कई बार मुआवजा लिया गया।
दस्तावेजों में पाया गया कि बसंत कुमार जैन, देवेंद्र मध्यानी और भूपेंद्र चंद्राकर के नाम पर भूमि को अलग-अलग खातेदारों के रूप में दिखाया गया। जबकि वास्तविकता में यह एक ही फर्म की संपत्ति थी।
डबल मुआवजे का खेल
जांच में यह भी सामने आया कि कई मामलों में एक ही जमीन के लिए दो या तीन बार मुआवजा भुगतान किया गया। खसरा 162, 130, 129, 128 और 127 जैसी भूमि श्रृंखलाओं में समान रकबे और समान दरों पर बार-बार भुगतान दर्ज किया गया।
इसके अलावा दीप्ति, रोशन, सीमा और भूपेंद्र जैसे नामों में बदलाव कर अलग-अलग लाभार्थी बनाकर भुगतान लिया गया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ।
12 करोड़ से अधिक का नुकसान
प्रारंभिक अनुमान के अनुसार इस पूरे घोटाले में शासन को लगभग 12.35 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। ई-स्टांप और रजिस्ट्री रिकॉर्ड में भी कई जगह विसंगतियां पाई गई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि संगठित अनियमितता हो सकती है।
फर्जी फसल और पेड़ों का दावा
कई खसरों में फर्जी फसल और पेड़ों का उल्लेख कर अतिरिक्त मुआवजा लेने का आरोप भी सामने आया है।
उदाहरण के तौर पर खसरा 130/02 में 149 पेड़ दर्शाकर लगभग 19 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा लिया गया, जबकि रजिस्ट्री रिकॉर्ड में इन पेड़ों का कोई उल्लेख नहीं था।
इसी तरह खसरा 131/10 में असिंचित सोयाबीन फसल दिखाकर 27 लाख रुपये से अधिक और खसरा 131/5 में लगभग 19 लाख रुपये का मुआवजा लिया गया।
आरजीएस कॉलोनाइजर की भूमिका पर सवाल
आरजीएस कॉलोनाइजर प्रा. लि. की भूमिका इस पूरे मामले में बेहद संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि कंपनी के डायरेक्टरों ने भूमि को अलग-अलग नामों पर विक्रय कर मुआवजा प्राप्त किया।
इसके अलावा यह भी आरोप है कि एक ही भूमि को कई बार अलग-अलग खातेदारों के नाम पर दर्ज कर मुआवजा लिया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रक्रिया में जानबूझकर हेरफेर किया गया।
नामांतरण और रजिस्ट्री में गड़बड़ी
भूमि के नामांतरण और रजिस्ट्री रिकॉर्ड में भी कई असंगतियां पाई गई हैं। एक ही खसरे में अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रविष्टियां दर्ज की गईं, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि वास्तविक लाभार्थी कौन था।
कई मामलों में भूमि का आकार और रकबा बदलकर दर्ज किया गया, जिससे मुआवजे की राशि स्वतः बढ़ गई।
प्रशासनिक चूक या संगठित घोटाला?
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि यह केवल लापरवाही का मामला है या एक सुनियोजित घोटाला, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि का भुगतान बिना अंदरूनी सहयोग के संभव नहीं है।
जांच और आगे की कार्रवाई
फिलहाल मामले की जांच जारी है और कई दस्तावेजों को खंगाला जा रहा है। प्रशासन द्वारा कहा गया है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
जांच में यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े भूमि मुआवजा घोटालों में से एक साबित हो सकता है।
राजनीतिक असर और जन प्रतिक्रिया
इस घोटाले के सामने आने के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। विपक्ष ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
स्थानीय लोगों में भी नाराजगी देखी जा रही है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण के नाम पर पारदर्शिता की कमी ने जनता का विश्वास कमजोर किया है।
निष्कर्ष
राजनांदगांव का भारतमाला मुआवजा घोटाला न केवल एक वित्तीय अनियमितता का मामला है, बल्कि यह प्रशासनिक प्रणाली की कमजोरियों को भी उजागर करता है। करोड़ों रुपये की हेराफेरी, फर्जी दस्तावेज और नामांतरण में हेरफेर यह संकेत देते हैं कि यह मामला बेहद गंभीर है।
यदि जांच निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ती है, तो कई बड़े नाम और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। यह मामला आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासन दोनों पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
