—Advertisement—

Indore में साफ हवा के बावजूद सांस की बीमारियां बढ़ीं, परागकण और कबूतर बने नए स्वास्थ्य खतरे का कारण

Author Picture
Published On: 24 April 2026
indore

—Advertisement—

Indore में साफ हवा के बावजूद बढ़ी सांस की बीमारियां: परागकण और कबूतर बने नए खतरे

Indore । देश के सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार इंदौर एक ओर जहां अपनी साफ-सफाई और बेहतर वायु गुणवत्ता के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर यहां एक चौंकाने वाला स्वास्थ्य संकट सामने आया है। शहर में हवा साफ दिखने के बावजूद सांस संबंधी बीमारियों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। हालिया अध्ययन में सामने आया है कि इसके पीछे केवल धूल और धुआं नहीं, बल्कि परागकण (पोलन) और कबूतरों से जुड़े जैव-एरोसोल्स भी प्रमुख कारण बन रहे हैं।

Indore साफ शहर, लेकिन बढ़ती बीमारियां

इंदौर लंबे समय से स्वच्छता सर्वेक्षण में देश में नंबर-1 या शीर्ष शहरों में शामिल रहा है। यहां कचरा प्रबंधन, सड़क सफाई और प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को लगातार सराहा गया है। लेकिन इसके बावजूद अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है कि शहर में सांस से जुड़ी बीमारियां कम होने के बजाय बढ़ रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल दिखाई देने वाले प्रदूषण की नहीं है, बल्कि हवा में मौजूद सूक्ष्म जैविक कण भी लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।

अध्ययन में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पब्लिक पॉलिसी एवं लॉ के विद्यार्थी और चिकित्सक डॉ. अंशुल तिवारी द्वारा किए गए एक कैपस्टोन अध्ययन में यह सामने आया है कि इंदौर में सांस संबंधी समस्याओं के पीछे नए प्रकार के पर्यावरणीय कारण सक्रिय हैं।

यह अध्ययन संस्था ‘आरोग्यम’ और नगर निगम के सहयोग से किया गया, जिसमें शहरी क्षेत्रों के निवासियों, डॉक्टरों और पर्यावरणीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन के अनुसार—

  • 75.5% लोगों ने माना कि धूल और सामान्य प्रदूषण में कमी आई है
  • 64% लोगों ने पिछले एक वर्ष में सांस संबंधी समस्याओं की शिकायत की
  • 67.5% लोगों ने कहा कि हवा साफ होने के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ
  • 74% लोगों ने अपने घरों या छतों पर कबूतरों की मौजूदगी बताई
  • 98% लोगों ने इस समस्या पर प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत जताई

परागकण और जैव-एरोसोल्स बन रहे बड़ा खतरा

अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि अब शहरी प्रदूषण केवल पीएम 2.5 और पीएम 10 तक सीमित नहीं है। इसके अलावा हवा में मौजूद जैविक कण भी स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं।

इनमें शामिल हैं—

  • पेड़ों के परागकण (पोलन)
  • कबूतरों की बीट के कण
  • पंखों और शरीर से निकलने वाले प्रोटीन
  • अन्य जैव-एरोसोल्स

ये सूक्ष्म कण हवा में मिलकर एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियों को बढ़ा रहे हैं।

कबूतर बन रहे नई स्वास्थ्य समस्या का कारण

शहर में कबूतरों की बढ़ती संख्या भी एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आई है। अध्ययन में पाया गया कि लगभग 74% लोग अपने घरों, छतों या बालकनी में कबूतरों की नियमित उपस्थिति देखते हैं।

चिकित्सकों का मानना है कि कबूतरों की बीट और पंखों से निकलने वाले सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर एलर्जी और संक्रमण का कारण बनते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक संपर्क में रहने से यह समस्या गंभीर फेफड़ों की बीमारियों का रूप ले सकती है।

लोगों में बढ़ रही श्वसन समस्याएं

अध्ययन में यह भी सामने आया कि पिछले एक वर्ष में इंदौर के 64% लोगों में किसी न किसी प्रकार की श्वसन संबंधी समस्या देखी गई है।

इन समस्याओं में शामिल हैं—

  • सांस लेने में कठिनाई
  • लगातार खांसी
  • एलर्जी
  • अस्थमा के लक्षण
  • मौसम बदलने पर परेशानी बढ़ना

51% लोगों ने बताया कि मौसम बदलने के साथ उनकी समस्याएं और बढ़ जाती हैं।

विशेषज्ञों की राय

अध्ययन में शामिल 90% विशेषज्ञों ने कहा कि केवल वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) और पार्टिकुलेट मैटर के आधार पर शहरी स्वास्थ्य को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जैविक प्रदूषकों को भी वायु गुणवत्ता विश्लेषण में शामिल करना आवश्यक है, क्योंकि ये सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

पेड़ों और हरियाली का भी प्रभाव

अध्ययन में यह भी बताया गया कि कुछ विशेष पेड़ जैसे सप्तपर्णी और कोनोकार्पस भी एलर्जी के मामलों में वृद्धि कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि शहरों में हरियाली जरूरी है, लेकिन पेड़ों के चयन में सावधानी बरतनी चाहिए ताकि एलर्जिक प्रभाव कम किया जा सके।

प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत

अध्ययन में 98% लोगों ने यह राय दी कि इस समस्या से निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।

सुझावों में शामिल हैं—

  • जैव-एरोसोल्स की निगरानी
  • कबूतरों की संख्या नियंत्रित करने के उपाय
  • एलर्जेनिक पेड़ों की पहचान
  • जनजागरूकता अभियान
  • नियमित स्वास्थ्य सर्वेक्षण

विशेषज्ञों के सुझाव

डॉ. अंशुल तिवारी के अनुसार, छोटे-छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। इनमें शामिल हैं—

  • सफाई प्रोटोकॉल को मजबूत करना
  • मौसम आधारित स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली
  • कम एलर्जेन पेड़ों का चयन
  • कबूतर प्रभावित क्षेत्रों में विशेष सफाई
  • लोगों को जागरूक करना

निष्कर्ष

इंदौर जैसे स्वच्छ शहर में सांस संबंधी बीमारियों का बढ़ना यह दिखाता है कि प्रदूषण केवल दृश्य धूल और धुएं तक सीमित नहीं है। अब जैविक प्रदूषक भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।

परागकण, कबूतर और अन्य जैव-एरोसोल्स धीरे-धीरे शहरी स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। यदि समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्वच्छ शहरों की परिभाषा भी बदल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सही निगरानी, जागरूकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही इस समस्या का समाधान संभव है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

Related News

Comments are closed.

Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp