MPESB भर्ती घोटाला: फर्जी डिग्री पर सरकारी नौकरी के आरोप, जांच की मांग तेज
इंदौर/भोपाल/ग्वालियर। मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन बोर्ड (MPESB) की 2022 की भर्ती प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में आ गई है। नगर निगम ग्वालियर, भोपाल और इंदौर में चयनित कुछ अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों और अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं।
इस मामले ने राज्य की भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और सत्यापन प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यूजीसी से मान्यता प्राप्त न होने वाले संस्थानों की डिग्रियों के आधार पर कई उम्मीदवारों को सरकारी पदों पर नियुक्त किया गया।
किन नगर निगमों में उठे सवाल
शिकायत के अनुसार यह मामला केवल एक शहर तक सीमित नहीं है। इंदौर, भोपाल और ग्वालियर नगर निगमों में चयनित कुछ अधिकारियों की नियुक्तियों की जांच की मांग की गई है।
ग्वालियर नगर निगम में वर्ष 2022 की MPESB भर्ती के तहत दो अधिकारियों काबिल सिंह राजौरिया और अभिषेक मिश्रा को सहायक अतिक्रमण निरोधक अधिकारी पद पर नियुक्त किया गया था। आरोप है कि इनकी शैक्षणिक योग्यता ऐसे संस्थानों से है जिन्हें यूजीसी और एआईसीटीई से मान्यता प्राप्त नहीं है।
फर्जी डिग्री के आरोप
शिकायत में दावा किया गया है कि जिन संस्थानों से डिग्री ली गई, उनमें राजीव गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट और संघाई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (मणिपुर) शामिल हैं।
आरोप है कि ये संस्थान यूजीसी की मान्यता सूची में नहीं हैं और तकनीकी शिक्षा के लिए एआईसीटीई से भी अनुमोदित नहीं हैं। इसके बावजूद इन प्रमाण पत्रों को भर्ती प्रक्रिया में स्वीकार किया गया, जिससे चयन प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर सवाल उठे हैं।
इंदौर और भोपाल में भी जांच की मांग
सूत्रों के अनुसार इंदौर और भोपाल नगर निगम में भी कुछ अधिकारियों के चयन पर इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं।
हालांकि, इंदौर नगर निगम से सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगे गए सभी दस्तावेज अभी तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। आशंका जताई जा रही है कि विस्तृत जांच होने पर और नाम सामने आ सकते हैं।
शिकायत और कार्रवाई की मांग
इंदौर निवासी शिकायतकर्ता सोनू गन्नोते ने इस पूरे मामले को लेकर प्रमुख सचिव और नगर निगम आयुक्तों को शिकायत भेजी है। उन्होंने भर्ती प्रक्रिया की जांच और संदिग्ध नियुक्तियों को निरस्त करने की मांग की है।
उनका कहना है कि आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों में स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि कुछ चयनित उम्मीदवारों की डिग्रियां मान्यता रहित संस्थानों से हैं।
यूजीसी की पूर्व चेतावनी
यूजीसी ने 28 मार्च को जारी सार्वजनिक नोटिस में स्पष्ट किया था कि राजीव गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट जैसे संस्थान यूजीसी अधिनियम 1956 के तहत मान्यता प्राप्त नहीं हैं।
यूजीसी के अनुसार ऐसे संस्थानों से प्राप्त डिग्रियां न तो उच्च शिक्षा के लिए मान्य हैं और न ही सरकारी नौकरियों के लिए स्वीकार्य हैं।
इसके बावजूद इन डिग्रियों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में चयन होना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही या अनियमितता की ओर संकेत करता है।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया नहीं
इस मामले में संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन ग्वालियर नगर निगम आयुक्त ने कॉल रिसीव नहीं किया और बाद में कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी।
अधिकारियों की चुप्पी ने मामले को और अधिक संदिग्ध बना दिया है और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने MPESB की भर्ती प्रणाली पर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या दस्तावेजों की सही तरीके से जांच की गई थी
- क्या मान्यता रहित संस्थानों की डिग्रियों को जानबूझकर स्वीकार किया गया
- क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या संगठित अनियमितता
इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे।
सिस्टम पर असर
यह मामला केवल कुछ नियुक्तियों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह सरकारी भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रभाव डाल सकता है।
यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह संकेत देगा कि भर्ती प्रक्रियाओं में सख्त सत्यापन और निगरानी की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
MPESB भर्ती घोटाले के आरोपों ने मध्यप्रदेश की भर्ती व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। फर्जी या अमान्य डिग्रियों के आधार पर चयन के आरोप यदि सही साबित होते हैं, तो यह प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कार्रवाई का आधार बन सकता है।
अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार और संबंधित विभाग इस मामले की जांच कितनी तेजी और पारदर्शिता के साथ करते हैं।
