दादी की अंतिम इच्छा बनी रोशनी: Khachrod में नेत्रदान की प्रेरणादायक मिसाल
Khachrod । जीवन का सत्य है कि एक दिन हर किसी को इस संसार को अलविदा कहना होता है, लेकिन कुछ लोग अपने जाने के बाद भी दूसरों के जीवन में उजाला छोड़ जाते हैं। ऐसा ही एक प्रेरणादायक उदाहरण खाचरौद में देखने को मिला, जहाँ एक परिवार ने अपने प्रियजन की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए नेत्रदान कर मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की।
रानी लक्ष्मीबाई मार्ग निवासी स्वर्गीय श्रीमती प्रेमलता बाई (स्व. श्री माणकलाल जी केराफ) के निधन के बाद उनके परिजनों ने जिस संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता का परिचय दिया, वह न केवल सराहनीय है बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। दुख की घड़ी में जहाँ अधिकांश परिवार अपने प्रियजन के वियोग में डूबे रहते हैं, वहीं इस परिवार ने अपने शोक को परोपकार में बदलते हुए नेत्रदान का निर्णय लिया।
अंतिम इच्छा का सम्मान
बताया जाता है कि स्वर्गीय प्रेमलता बाई के मन में जीवनकाल के दौरान ही नेत्रदान की भावना थी। उन्होंने कई बार अपने परिजनों के समक्ष इस इच्छा को व्यक्त किया था कि उनके जाने के बाद उनके नेत्र किसी जरूरतमंद को नई रोशनी दें। परिवार ने उनकी इस इच्छा को न केवल गंभीरता से लिया बल्कि समय आने पर उसे पूरी निष्ठा और सम्मान के साथ पूरा भी किया।
उनके निधन के पश्चात सुबह लगभग 9:00 बजे, परिवारजनों ने तुरंत नेत्रदान की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संबंधित चिकित्सकों और संस्थाओं से संपर्क किया। यह निर्णय इस बात का प्रतीक है कि परिवार पहले से ही इस विषय में जागरूक और प्रतिबद्ध था।
चिकित्सा टीम का सहयोग
नेत्रदान की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में डॉ. अमित चावड़ा का विशेष योगदान रहा। उनके मार्गदर्शन में गीता भवन न्यास समिति के डॉ. गोवर्धन लाल दरवाल और उनकी टीम ने तत्परता के साथ आवश्यक कार्यवाही पूरी की। पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से अंजाम दिया गया, जिससे नेत्र सुरक्षित रूप से संरक्षित किए जा सके और उन्हें जरूरतमंद व्यक्तियों तक पहुँचाया जा सके।
यह नेत्रदान खाचरौद क्षेत्र का 960वां सफल नेत्रदान रहा, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। यह आँकड़ा इस बात को दर्शाता है कि क्षेत्र में नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और लोग इस पुनीत कार्य में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं।
दो जीवनों में आएगी नई रोशनी
नेत्रदान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे दो नेत्रहीन व्यक्तियों को दृष्टि मिल सकती है। कल्पना कीजिए, जिन लोगों ने कभी दुनिया को स्पष्ट रूप से नहीं देखा या जिन्होंने किसी कारणवश अपनी दृष्टि खो दी, उनके जीवन में अचानक प्रकाश लौट आए—यह किसी चमत्कार से कम नहीं होता।
स्वर्गीय प्रेमलता बाई के इस महान दान से दो व्यक्तियों के जीवन में आशा, आत्मविश्वास और नई ऊर्जा का संचार होगा। वे न केवल अपने दैनिक कार्यों को स्वतंत्र रूप से कर सकेंगे, बल्कि समाज में एक सम्मानजनक जीवन भी जी पाएंगे।
परिवार की भूमिका और भावनाएँ
इस पूरे कार्य में परिवार के सदस्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। विशेष रूप से उनके पौत्र पुलकित केराफ, जो नेत्रदान समिति के सक्रिय सदस्य हैं, ने इस प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल परिवार को इस निर्णय के लिए प्रेरित किया बल्कि स्वयं पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल रहे।
इसके अलावा जैन सोशल ग्रुप मैत्री के अध्यक्ष राजेंद्र नांदेचा, अरुण लुणावत, विशाल जी (बरखेड़ा वाले), कपिल सियाल सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता भी इस अवसर पर उपस्थित रहे। इन सभी ने परिवार का मनोबल बढ़ाया और इस नेक कार्य में सहयोग प्रदान किया।
परिवारजनों ने बताया कि यह निर्णय लेना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने यह सोचकर स्वयं को मजबूत किया कि उनके इस कदम से किसी के जीवन में उजाला आएगा। यही विचार उन्हें इस कठिन समय में भी सकारात्मक बनाए रखने में सहायक बना।
समाज के लिए प्रेरणा
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक संदेश है। नेत्रदान जैसे कार्य न केवल मानवता की सेवा का सर्वोत्तम उदाहरण हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि हम अपने जीवन के बाद भी समाज के लिए उपयोगी बन सकते हैं।
आज भी हमारे समाज में नेत्रदान को लेकर कई भ्रांतियाँ और डर मौजूद हैं। लोग अक्सर इस प्रक्रिया को लेकर संकोच करते हैं या जानकारी के अभाव में इससे दूर रहते हैं। ऐसे में खाचरौद की यह घटना उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो नेत्रदान के बारे में सोचते तो हैं, लेकिन निर्णय नहीं ले पाते।
जागरूकता की आवश्यकता
नेत्रदान को बढ़ावा देने के लिए समाज में व्यापक स्तर पर जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संगठनों और चिकित्सा संस्थानों को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए। लोगों को यह समझाना जरूरी है कि नेत्रदान एक सरल प्रक्रिया है और इससे किसी प्रकार की धार्मिक या सामाजिक बाधा नहीं होती।
इसके अलावा, यह भी जरूरी है कि लोग अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान के लिए संकल्प लें और अपने परिवारजनों को इसकी जानकारी दें, ताकि समय आने पर वे उनकी इच्छा का सम्मान कर सकें।
अंतिम विदाई में मानवता का संदेश
स्वर्गीय प्रेमलता बाई की अंतिम यात्रा में समाज के अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे। सभी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके द्वारा किए गए इस महान कार्य की सराहना की। शांति वन में आयोजित अंतिम संस्कार के दौरान वातावरण भावुक था, लेकिन साथ ही एक संतोष की भावना भी थी कि उन्होंने अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ी है जो हमेशा याद रखी जाएगी।
निष्कर्ष
खाचरौद में हुआ यह 960वां नेत्रदान केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। स्वर्गीय प्रेमलता बाई और उनके परिवार ने यह साबित कर दिया कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से दी जाती है।
उनका यह कदम न केवल दो लोगों के जीवन में प्रकाश लाएगा, बल्कि अनगिनत लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करेगा। ऐसे उदाहरण समाज को आगे बढ़ने की दिशा दिखाते हैं और हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम भी अपने जीवन में ऐसा क्या कर सकते हैं, जिससे दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आ सके।
