अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व भगवान आदिनाथ से जुड़ा है। जानें इस दिन श्रेयांश कुमार द्वारा इक्षु रस से पारणा का इतिहास और अक्षय पुण्य का महत्व। सचिन भंडारी के अनुसार यह तप, त्याग, संयम और दान का महापर्व है।
अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व क्यों?
अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व माना जाता है। यह दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आता है। जैन समाज के लिए यह पर्व तप, त्याग, संयम और दान की महिमा का प्रतीक है। इस दिन किया गया कोई भी पुण्य कार्य अक्षय (अमिट) फल देता है। इस लेख में हम जानेंगे कि क्यों यह पर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) से जुड़ा है, और कैसे श्रेयांश कुमार के हाथों इक्षु रस से पारणा का इतिहास इस दिन को अमर बनाता है।
जैन समाज की मीडिया प्रभारी श्री सचिन भंडारी (महिदपुर रोड) ने बताया कि “अक्षय तृतीया का महापर्व हमें सिखाता है कि तप और करुणा से कर्मों का नाश होता है। इस दिन किया गया दान और पारणा अक्षय पुण्य प्रदान करता है।”
भगवान आदिनाथ और अक्षय तृतीया का ऐतिहासिक संबंध
अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व सीधे तौर पर प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) से जुड़ा है। जैन ग्रंथों के अनुसार, भगवान आदिनाथ ने दीक्षा लेने के बाद 400 दिनों तक निर्जल और निराहार उपवास किया। वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन वे हस्तिनापुर पधारे, जहाँ राजकुमार श्रेयांश कुमार ने उन्हें पहला आहार – इक्षु (गन्ने) का रस – दिया। यही कारण है कि इस दिन को अक्षय तृतीया कहा जाता है, क्योंकि इस दिन किया गया पुण्य अक्षय फल देता है।जैन आगम के अनुसार: “तस्स ठाणे अक्खयत्तिया पुण्णफलं होइ” – अर्थात इस स्थान पर अक्षय तृतीया का पुण्य अक्षय फल देने वाला है।
प्रथम तीर्थंकर का जीवन परिचय – ऋषभदेव प्रभु
भगवान आदिनाथ का जन्म अवसर्पिणी काल के तीसरे आरे में हुआ था। उनकी आयु 84 लाख वर्ष, देह की ऊंचाई 500 धनुष (लगभग 750 मीटर) और वर्ण स्वर्णमयी था। उन्होंने संसार के सभी प्राणियों को:
- अक्षी (लिपि), मसी (गणित), कृषि (खेती) की शिक्षा दी।
- जीवन जीने की कला, संस्कार, सही-गलत कार्यों से कर्म बंधन और मुक्ति के उपाय बताए।
- समाज को व्यवस्था, व्यापार, शिल्प और कला सिखाई।
प्रभु ने ही सबसे पहले तप, दान, संयम का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व उन्हीं को समर्पित है।
करुणा का कर्म बंधन: बैल के मुंह बांधने की घटना
एक बार भगवान आदिनाथ ने अपने पिछले जन्म में देखा कि एक बैल खेतों की फसल खा रहा था। किसान उसे निर्दयता से पीट रहा था। करुणावश प्रभु ने किसान को सलाह दी कि “बैल का मुंह बांध दो, इससे फसल भी नहीं खाएगा और बैल को पीटना भी नहीं पड़ेगा।”
किसान ने ऐसा ही किया – बैल का मुंह 12 घंटे (360 पलोपल) तक बांधा रहा। बैल तड़पता रहा। यद्यपि प्रभु का भाव करुणामय था, फिर भी उन्हें अंतराय कर्म का बंध हुआ। इस कर्म के फलस्वरूप उन्हें दीक्षा के बाद 400 दिन तक भिक्षा में आहार नहीं मिला।शिक्षा: यहाँ से यह सीख मिलती है कि अच्छे इरादे भी अगर किसी प्राणी को वेदना दें, तो कर्म बंधता है। तप ही कर्मों से मुक्ति का एकमात्र उपाय है।
400 दिन का उपवास और भिक्षा में आहार न मिलना
दीक्षा के बाद भगवान आदिनाथ ने 400 दिनों तक निर्जल-निराहार विचरण किया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान जाते, किंतु किसी को उन्हें कल्पिक आहार देने की विधि नहीं मालूम थी। लोग हाथी, सोना, हीरे, मोती, थाल, वस्त्र आदि भेंट करने लगे, पर प्रभु को तो केवल कल्पिक आहार (बिना 42 दोषों वाला, शुद्ध आहार) चाहिए था।जैन सिद्धांत के अनुसार, कल्पिक आहार वह है जो 42 प्रकार के दोषों से रहित हो, जैसे कि – निजी आहार न हो, परिग्रह से मुक्त हो, आदि। इसे कोई भी नहीं समझ पा रहा था।
हस्तिनापुर में प्रथम पारणा: श्रेयांश कुमार का अमर योगदान
400 दिनों के बाद, वैशाख शुक्ला तीज के शुभ दिन प्रभु हस्तिनापुर पधारे। उस समय हस्तिनापुर के राजकुमार श्रेयांश कुमार को जाति-स्मरण ज्ञान (पिछले जन्म का ज्ञान) हुआ। वे अपने प्रपितामह के दर्शन पाते ही पहचान गए। उन्हें आहार देने की विधि का ज्ञान हुआ।श्रेयांश कुमार ने भक्तिपूर्वक प्रभु से इक्षु रस (गन्ने का रस) ग्रहण करने का आग्रह किया। प्रभु ने कल्पिक आहार जानकर स्वीकार किया।श्रेयांश कुमार के 108 घड़े इक्षु रस: उन्होंने 108 घड़ों में शुद्ध, छना हुआ इक्षु रस प्रभु को अर्पित किया। यह संख्या 108 जैन धर्म में अत्यंत शुभ मानी जाती है (108 गुण स्थान, 108 मंगल द्रव्य)।
108 घड़े इक्षु रस से पारणा – देवताओं का जयघोष
जैसे ही प्रभु ने इक्षु रस से पारणा किया, आकाश में देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं। देवताओं ने “अहो दानम्! अहो दानम्!” (यह दान कितना उत्तम है) का जयघोष किया। प्रजा में हर्ष की लहर दौड़ गई। उसी दिन से अक्षय तृतीया को वर्षीतप की पारणा की प्रथा शुरू हुई।
जैन धर्म में 400 दिन के उपवास लगातार करना आज असंभव है, इसलिए दो वर्षीतप (एक वर्ष में 200 दिन उपवास, दो वर्ष में 400 दिन) का विधान है। हज़ारों आराधक आज भी इस दिन अपना वर्षीतप पूर्ण कर शेरडी (इक्षु रस) से पारणा करते हैं।
वर्षीतप की परंपरा और अक्षय तृतीया का शासन में स्थान
अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व होने के नाते इसे “तप-पारणा का महोत्सव” भी कहा जाता है। इस दिन:
- जैन मुनि और श्रावक वर्षीतप (एक वर्ष में 400 उपवास – दो वर्ष में पूरे) समाप्त करते हैं।
- पारणा केवल इक्षु रस से ही की जाती है, क्योंकि प्रभु ने भी यही ग्रहण किया था।
- सैकड़ों साधु-साध्वियाँ इस दिन अपने तप का पारणा करती हैं।
जैन शासन के प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों – हस्तिनापुर, सम्मेद शिखर, पावापुरी, दिल्ली, मुम्बई, महिदपुर रोड – पर इस दिन विशेष आयोजन होते हैं।
महिदपुर रोड पर अक्षय तृतीया का आयोजन – सचिन भंडारी के वक्तव्य
महिदपुर रोड (उज्जैन, मध्य प्रदेश) पर जैन समाज धूमधाम से अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व मनाता है। जैन समाज की मीडिया प्रभारी श्री सचिन भंडारी ने बताया:
“इस दिन किया हुआ पुण्य अक्षय फल देने वाला होता है। प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ दादा को समर्पित यह पर्व तप, त्याग, संयम और दान की महिमा का प्रतीक है। महिदपुर रोड पर हम सामूहिक पारणा, प्रभु पूजा, और निर्धनों को अन्न-वस्त्र दान का आयोजन करते हैं। हज़ारों श्रद्धालु यहाँ वर्षीतप पूर्ण कर इक्षु रस से पारणा करते हैं।”
स्थानीय जैन समाज द्वारा:
- प्रभु आदिनाथ की विशेष आरती
- 108 कलश यात्रा
- श्रेयांश कुमार नाटक का मंचन
- सामूहिक इक्षु रस पारणा का आयोजन किया जाता है।
अक्षय तृतीया पर दान, तप और संयम की महिमा
जैन धर्मग्रंथों के अनुसार, अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व तीन प्रमुख कारणों से अक्षय फलदायी है:
| कार्य | फल |
|---|---|
| तप (उपवास, वर्षीतप) | पूर्वजन्म के पापों का नाश |
| दान (अन्न, वस्त्र, आहार) | अक्षय पुण्य, अगले जन्म में सुख |
| संयम (इन्द्रियों पर नियंत्रण) | कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग |
विशेष बात यह है कि इस दिन किया गया आहार दान (शुद्ध शाकाहारी, इक्षु रस) असीम पुण्य देता है। जैन समाज के लिए यह दिन नए संवत्सर (वर्ष) के प्रारंभ जैसा भी है, क्योंकि भगवान ऋषभदेव ने इसी दिन समाज को व्यवसाय, लिपि और कृषि सिखाई थी।
निष्कर्ष – आस्था, विश्वास और मुक्ति का पर्व
अक्षय तृतीया जैन धर्म का पवित्र पर्व सिर्फ एक धार्मिक दिन नहीं, बल्कि मानवता को तप, करुणा और दान का पाठ पढ़ाने वाला महापर्व है। भगवान आदिनाथ के 400 दिन के उपवास, श्रेयांश कुमार के अमर दान, और इक्षु रस से पारणा की यह कथा हर जैन के हृदय में आस्था का दीप जलाती है।इस दिन हम सबको संकल्प लेना चाहिए – “अहिंसा, संयम और तप के मार्ग पर चलूँ, और अपने कर्मों को क्षय करूँ।”
रिपोर्ट – सचिन भंडारी (मीडिया प्रभारी, जैन समाज महिदपुर रोड)


