महिला आरक्षण बिल पर NDA के सामने बड़ा नंबर गेम, 360 वोट का गणित बना चुनौती
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने लोकसभा में महिला आरक्षण बिल को पास कराने के लिए कठिन अंकगणितीय चुनौती खड़ी हो गई है। शुक्रवार को होने वाली वोटिंग से पहले संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
दो-तिहाई बहुमत का गणित बना सबसे बड़ी बाधा
लोकसभा में कुल 540 सांसदों की संख्या को देखते हुए संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी लगभग 360 वोटों की जरूरत है।
वर्तमान में NDA के पास लगभग 293 सांसद हैं, यानी सरकार को कम से कम 67 अतिरिक्त वोटों की जरूरत है। यही आंकड़ा अब पूरे राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है।
विपक्ष की मजबूत स्थिति ने बढ़ाई मुश्किल
दूसरी ओर विपक्षी दलों के पास भी मजबूत संख्या है, जिससे सरकार के लिए समर्थन जुटाना आसान नहीं दिख रहा है।
- कांग्रेस: 98 सांसद
- समाजवादी पार्टी: 37 सांसद
- तृणमूल कांग्रेस: 28 सांसद
- डीएमके: 22 सांसद
- अन्य विपक्षी दलों को मिलाकर लगभग 234 सांसद
इस स्थिति ने सरकार के लिए संख्या का संतुलन और भी जटिल बना दिया है।
गुरुवार की वोटिंग ने दिखाया वास्तविक स्थिति
गुरुवार को बिल पर हुई प्रारंभिक वोटिंग में 251 सांसदों ने समर्थन में और 185 ने विरोध में वोट दिया। कुल 436 सांसद उपस्थित रहे।
यह आंकड़ा साफ संकेत देता है कि सरकार अभी भी 360 के जादुई आंकड़े से काफी दूर है और उसे अतिरिक्त समर्थन की सख्त जरूरत है।
रात भर चली रणनीतिक बैठकों की चर्चा
सूत्रों के अनुसार, वोटिंग से पहले सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में देर रात तक नंबर गेम को लेकर मंथन चलता रहा।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि सरकार विपक्षी दलों से संपर्क साधकर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है, ताकि बिल को पारित कराया जा सके।
2023 के कानून को लेकर नया मोड़
इस पूरे घटनाक्रम में एक नया मोड़ तब आया जब सरकार ने गजट नोटिफिकेशन जारी कर कहा कि 2023 का महिला आरक्षण कानून 16 अप्रैल 2026 से लागू माना जाएगा।
यह वही कानून है जिसे पहले राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सितंबर 2023 में गजट किया गया था।
इस फैसले को लेकर विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं।
विपक्ष का आरोप: सरकार दबाव में
मनीष तिवारी ने इस नोटिफिकेशन को सरकार की राजनीतिक रणनीति बताया। उनका कहना है कि यह कदम इस आशंका से उठाया गया है कि यदि नया बिल पास नहीं हुआ तो पहले के कानून को सुरक्षित रखा जा सके।
विपक्ष का दावा है कि सरकार स्थिति को संभालने के लिए वैकल्पिक रास्ते तैयार कर रही है।
सरकार के सामने तीन संभावित विकल्प
पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य के अनुसार सरकार के पास फिलहाल तीन रास्ते हैं—
- सीधे वोटिंग कराकर परिणाम स्वीकार करना
- बिल को चयन समिति (Select Committee) के पास भेजना
- विपक्ष से सहमति बनाकर सर्वसम्मति से पास कराना
इनमें से किसी भी विकल्प पर अंतिम निर्णय राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
सहयोगी दलों की शर्तों ने बढ़ाई मुश्किल
कुछ सहयोगी दलों ने भी इस बिल को लेकर शर्तें रख दी हैं। YSRCP ने स्पष्ट कहा है कि यदि सरकार आंध्र प्रदेश की सीटों पर परिसीमन से कोई प्रभाव न पड़ने की लिखित गारंटी देती है, तभी वे समर्थन करेंगे।
इस शर्त ने सरकार की रणनीति को और जटिल बना दिया है।
दक्षिण भारत में असहजता की स्थिति
दक्षिण भारत के कुछ भाजपा सांसदों और सहयोगी दलों में भी इस बिल को लेकर असहजता देखी जा रही है।
उनका कहना है कि परिसीमन और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दों को लेकर जल्दबाजी में लिया गया फैसला भविष्य में राजनीतिक विवाद पैदा कर सकता है।
प्रधानमंत्री का सख्त संदेश
नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में कहा कि देश की महिलाएं सांसदों के निर्णय के साथ-साथ उनकी नीयत पर भी नजर रख रही हैं।
उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक मुद्दे पर किसी भी प्रकार की गलत मंशा को जनता स्वीकार नहीं करेगी।
विपक्ष का पलटवार
विपक्षी दलों ने इस बिल को जल्दबाजी में लाया गया कदम बताया है। उनका आरोप है कि सरकार ने क्षेत्रीय संतुलन और संघीय ढांचे से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज किया है।
कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह बिल राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम बन सकता है।
निष्कर्ष: नंबर गेम पर टिकी सियासत
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल का भविष्य पूरी तरह से संख्या बल पर निर्भर करता दिख रहा है।
NDA को जहां अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती है, वहीं विपक्ष भी अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है।
अब सभी की नजर शुक्रवार की वोटिंग पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि यह ऐतिहासिक बिल पास होगा या फिर संसद में और राजनीतिक मंथन का रास्ता खुलेगा।
