दादी रतनमोहिनी जी की प्रथम पुण्यतिथि ‘विश्व एकता दिवस’ के रूप में मनाई गई
Indore , 16 अप्रैल। ब्रह्माकुमारी संस्थान की पूर्व मुख्य प्रशासिका एवं युवा प्रभाग की अध्यक्षा राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी जी की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर इंदौर के न्यू पलासिया स्थित ज्ञानशिखर ओमशांति भवन में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर को ‘विश्व एकता दिवस’ के रूप में मनाते हुए श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिकता का वातावरण देखने को मिला। देश-विदेश से जुड़े अनेक श्रद्धालु, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिक इस आयोजन में शामिल हुए।
आध्यात्मिक वातावरण में हुआ श्रद्धांजलि कार्यक्रम
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और ध्यान सत्र के साथ हुआ। पूरे सभागार में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया गया। ब्रह्माकुमारी संस्थान की वरिष्ठ बहनों ने दादी रतनमोहिनी जी को पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी।
ओमशांति भवन परिसर में पूरे दिन आध्यात्मिक भजन, ध्यान सत्र और प्रवचनों का आयोजन किया गया। उपस्थित लोगों ने दादीजी के जीवन और उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें आत्मिक नमन किया।
ब्रह्माकुमारी हेमलता दीदी ने साझा किए अनुभव
इस अवसर पर इंदौर जोन की क्षेत्रीय निदेशिका ब्रह्माकुमारी हेमलता दीदी ने दादी रतनमोहिनी जी के साथ अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि दादीजी का जीवन असंख्य आत्माओं के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है।
हेमलता दीदी ने बताया कि दादी रतनमोहिनी जी ने बहुत कम उम्र में ही आध्यात्मिक मार्ग को अपनाया। मात्र 12 वर्ष की आयु में वे ब्रह्माकुमारी यज्ञ से जुड़ गईं और जीवनभर सेवा, साधना और ज्ञान प्रसार के कार्य में समर्पित रहीं। उन्होंने कहा कि दादीजी का जीवन अनुशासन, त्याग और सेवा भावना का अद्वितीय उदाहरण है।

बचपन से ही आध्यात्मिक चेतना का विकास
हेमलता दीदी ने बताया कि दादी रतनमोहिनी जी बचपन से ही अत्यंत शांत, संवेदनशील और आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। वे ब्रह्मा बाबा द्वारा दिए गए महावाक्यों को अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनती थीं और उन्हें गहराई से आत्मसात करती थीं।
वे एकांत में बैठकर उन शिक्षाओं का अध्ययन करतीं और आत्म चिंतन में लीन हो जाती थीं। यह उनकी साधना और समर्पण का ही परिणाम था कि उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह से ईश्वरीय सेवा में समर्पित कर दिया।
विश्व शांति सम्मेलन में ऐतिहासिक भूमिका
कार्यक्रम में बताया गया कि दादी रतनमोहिनी जी को 1954 में जापान में आयोजित विश्व शांति सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला था। यह अवसर उन्हें ब्रह्मा बाबा के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ था।
इस सम्मेलन में उनकी उपस्थिति ने न केवल संस्थान का प्रतिनिधित्व किया बल्कि भारतीय आध्यात्मिकता और शांति संदेश को भी वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
101 वर्ष का समर्पित जीवन
दादी रतनमोहिनी जी ने अपने जीवन के 101 वर्ष पूर्णतः समाज और मानवता की सेवा में समर्पित किए। वे निरंतर यात्राओं, प्रवचनों और आध्यात्मिक शिविरों के माध्यम से लोगों को आत्मिक जागरूकता प्रदान करती रहीं।
उनका मानना था कि आत्मिक शांति ही विश्व शांति की आधारशिला है। वे हमेशा सरल जीवन, उच्च विचार और सेवा भावना को जीवन का मूल मंत्र बताती थीं।

विश्व एकता और शांति का संदेश
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि दादी रतनमोहिनी जी का जीवन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने हमेशा विश्व एकता, भाईचारे और शांति का संदेश दिया।
उनकी शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को आत्मिक शांति और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। ब्रह्माकुमारी संस्थान उनके विचारों को आगे बढ़ाते हुए विश्व शांति के अभियान को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।
वरिष्ठ अतिथियों की उपस्थिति
इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। इनमें कस्टम विभाग के कमिश्नर दिनेश बिसेन, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मानसिंह परमार, प्रसिद्ध आर्किटेक्ट एवं इंजीनियर बी.एल. पाटीदार, नगर निगम के पूर्व सिटी इंजीनियर महेश शर्मा, उद्योगपति अमीन वैद्य, डॉ. गिरीश टावरी और डॉ. संगीता टावरी शामिल रहे।
इन सभी अतिथियों ने दादी रतनमोहिनी जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके जीवन को प्रेरणादायक बताया।
आध्यात्मिक साधना और भोग अर्पण
कार्यक्रम के दौरान ओमशांति भवन की वरिष्ठ बहनों द्वारा दादीजी को भोग अर्पित किया गया। पूरे वातावरण में भक्ति और श्रद्धा का विशेष भाव देखने को मिला।
भजन, ध्यान और मौन साधना के माध्यम से उपस्थित सभी लोगों ने आत्मिक शांति का अनुभव किया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि नहीं बल्कि आत्मिक जागरूकता को बढ़ाना भी था।
दादी रतनमोहिनी जी का जीवन दर्शन
दादी रतनमोहिनी जी का जीवन सादगी, संयम और सेवा का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने हमेशा कहा कि मनुष्य का वास्तविक धर्म सेवा और करुणा है।
उनका मानना था कि जब व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेता है, तभी वह समाज के लिए उपयोगी बन सकता है। उनके विचार आज भी ब्रह्माकुमारी संस्थान के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक हैं।

समाज पर उनके योगदान का प्रभाव
दादी रतनमोहिनी जी के विचारों और कार्यों का प्रभाव केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचा।
उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण, युवाओं के मार्गदर्शन और नैतिक मूल्यों के विकास पर विशेष ध्यान दिया। उनके प्रयासों से हजारों लोगों ने आत्मिक जीवन को अपनाया और सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाए।
निष्कर्ष: एक प्रेरणादायक जीवन की अमर गाथा
दादी रतनमोहिनी जी का जीवन एक ऐसी प्रेरणा है जो आने वाली पीढ़ियों को भी मार्ग दिखाता रहेगा। उनका समर्पण, त्याग और सेवा भावना मानवता के लिए एक अमूल्य धरोहर है।
‘विश्व एकता दिवस’ के रूप में उनकी पुण्यतिथि मनाना इस बात का प्रतीक है कि उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके जीवनकाल में था। कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने एक स्वर में विश्व शांति और एकता के लिए प्रार्थना की।
