ऑनलाइन हिंसक Games से बच्चों को बचाने की मांग, trust ने केंद्र सरकार से की सख्त कार्रवाई की अपील
डिजिटल दुनिया में बढ़ती लत पर गंभीर चिंता
देश में बच्चों और किशोरों के बीच ऑनलाइन Games की लत तेजी से बढ़ती जा रही है। इसी को लेकर भारतीय मानव अधिकार सहकार trust (IHRCT) ने गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन का कहना है कि BGMI और Free Fire जैसे हिंसक और अपराध आधारित ऑनलाइन गेम्स बच्चों के मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। ट्रस्ट ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
ट्रस्ट का मानना है कि आज का बचपन तेजी से डिजिटल नशे की ओर बढ़ रहा है, जिससे बच्चों का वास्तविक जीवन से जुड़ाव कम होता जा रहा है। खेल के मैदानों में खेलने की बजाय बच्चे मोबाइल स्क्रीन पर घंटों समय बिता रहे हैं, जो उनके भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
केंद्रीय मंत्री को भेजा गया औपचारिक पत्र
इस मामले को गंभीरता से लेते हुए भारतीय मानव अधिकार सहकार trust के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुनील सिंह यादव ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, भारत सरकार को एक औपचारिक पत्र भेजा है।
इस पत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से मांग की है कि देश में बच्चों के बीच लोकप्रिय हो चुके हिंसक ऑनलाइन गेम्स पर या तो पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए या फिर उन पर कड़े नियम और नियंत्रण लागू किए जाएं। पत्र में यह भी कहा गया है कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में इसका सामाजिक प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है।
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर
ट्रस्ट द्वारा सरकार को भेजे गए पत्र में यह बताया गया है कि कई शोध और सर्वेक्षण इस बात की पुष्टि करते हैं कि हिंसक ऑनलाइन गेम्स बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं।
इन गेम्स के कारण बच्चों में आक्रामक व्यवहार बढ़ रहा है, तनाव और चिंता की समस्या बढ़ रही है, अवसाद के मामले सामने आ रहे हैं और सामाजिक अलगाव की स्थिति बन रही है। इसके अलावा लंबे समय तक स्क्रीन पर रहने के कारण बच्चों की पढ़ाई पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। कई बच्चे पढ़ाई में ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं और उनका शैक्षणिक प्रदर्शन लगातार गिर रहा है।
ट्रस्ट की प्रमुख मांगें
भारतीय मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट ने केंद्र सरकार से कई महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की है। इनमें मुख्य रूप से हिंसक गेम्स पर प्रतिबंध या कड़ा नियमन, 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमा तय करना, गेमिंग कंपनियों के लिए आधार कार्ड या अन्य दस्तावेजों के माध्यम से अनिवार्य आयु सत्यापन (KYC) लागू करना और गेमिंग ऐप्स में पैरेंटल कंट्रोल सिस्टम को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाना शामिल है।
आर्थिक नुकसान और बढ़ते जोखिम
ट्रस्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि ऑनलाइन गेमिंग केवल मानसिक ही नहीं बल्कि आर्थिक नुकसान का भी कारण बन रही है। कई मामलों में बच्चे इन-ऐप खरीदारी के जरिए गेमिंग करेंसी और अन्य सुविधाओं पर परिवार की बड़ी रकम खर्च कर रहे हैं। इससे परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि गेम हारने या अत्यधिक लत के कारण बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ता है, जो गंभीर परिणामों की ओर ले जा सकता है। ट्रस्ट ने इसे अत्यंत चिंताजनक बताया है।
आत्महत्या और हिंसक व्यवहार पर चेतावनी
ट्रस्ट ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि कुछ मामलों में ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण बच्चों में आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाएं भी सामने आई हैं। हालांकि ये घटनाएं सीमित हैं, लेकिन इनका प्रभाव समाज पर बहुत गहरा होता है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो भविष्य में यह एक बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। लगातार तनाव, हारने का डर और मानसिक दबाव बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकता है।
शिक्षा और सामाजिक जीवन पर प्रभाव
ऑनलाइन गेमिंग की लत का सबसे अधिक असर बच्चों की शिक्षा और सामाजिक जीवन पर देखा जा रहा है। बच्चे पढ़ाई से दूर होते जा रहे हैं, होमवर्क में रुचि कम कर रहे हैं और परिवार व दोस्तों से दूरी बना रहे हैं।
इसके कारण वे वास्तविक दुनिया की गतिविधियों से कटते जा रहे हैं और अकेलेपन की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रस्ट का कहना है कि यह स्थिति भविष्य की पीढ़ी के लिए गंभीर खतरा है।
डिजिटल नशे की बढ़ती समस्या
संगठन ने ऑनलाइन गेमिंग को डिजिटल नशा करार दिया है। उनका कहना है कि आज का बच्चा मैदानों में खेलने के बजाय मोबाइल स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहा है, जिससे उसका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है।
राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान की मांग
भारतीय मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट ने सरकार से यह भी मांग की है कि देशभर के स्कूलों में डिजिटल लत के खिलाफ एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाया जाए। इस अभियान के माध्यम से बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को ऑनलाइन गेमिंग के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए और सुरक्षित डिजिटल उपयोग के लिए मार्गदर्शन दिया जाए।
निष्कर्ष
ऑनलाइन हिंसक गेम्स की बढ़ती लत अब केवल मनोरंजन का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। भारतीय मानव अधिकार सहकार ट्रस्ट की यह मांग इस बात को दर्शाती है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर बहुत गहरा पड़ सकता है।
