प्रकाशनार्थ
Jain धरोहर को हटाने की कोशिश पर जैन समाज में आक्रोश
वैशाली/पटना/इंदौर (निप्र)। भगवान महावीर की पावन जन्मस्थली बासोकुंड, वैशाली स्थित “प्राकृत Jain शास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान” को बंद करने संबंधी बिहार सरकार के हालिया प्रस्ताव एवं एकपक्षीय निर्णय को लेकर जैन समाज एवं बुद्धिजीवियों में गहरा आक्रोश व्याप्त है। इस निर्णय को जैन संस्कृति, प्राकृत भाषा और ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण पर गंभीर प्रहार माना जा रहा है।
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ, इंदौर इकाई के अध्यक्ष मयंक जैन एवं प्रचारक राजेश जैन “दद्दू” ने इस कदम की कड़ी निंदा करते हुए इसे जैन विरासत और सांस्कृतिक धरोहर को समाप्त करने की “सोची-समझी साजिश” बताया है।
ऐतिहासिक संस्थान के महत्व पर सवाल
संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि यह संस्थान कोई साधारण भवन नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक महत्व अत्यंत गहरा है। वर्ष 1956 में इस संस्थान का शिलान्यास भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा किया गया था। इसके निर्माण में दानवीर साहू शांति प्रसाद जैन का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
संघ का कहना है कि ऐसे ऐतिहासिक संस्थान को बंद करने का निर्णय न केवल जैन समाज की भावनाओं के विरुद्ध है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा का भी अपमान है।
सरकारी तर्कों को बताया भ्रामक
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने सरकार द्वारा दिए गए तर्कों को “तथ्यहीन और भ्रामक” बताया है। प्रशासन का कहना है कि पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण और संरचना सुधार के उद्देश्य से संस्थान को कला एवं संस्कृति विभाग को सौंपा जा रहा है।
संघ ने स्पष्ट किया कि संस्थान में ऐसी कोई महत्वपूर्ण पांडुलिपियाँ उपलब्ध नहीं हैं, जिनके आधार पर इसे खाली कराने का औचित्य सिद्ध हो सके। संघ के अनुसार यह निर्णय संस्थान की भूमि और परिसर को अन्य प्रयोजन में उपयोग करने की दिशा में उठाया गया कदम प्रतीत होता है।
दीर्घकालीन उपेक्षा का आरोप
संघ ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले लगभग 20 वर्षों से संस्थान की लगातार उपेक्षा की जा रही है।
- शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति रोक दी गई
- शैक्षणिक गतिविधियाँ सीमित कर दी गईं
- संस्थान को जानबूझकर निष्क्रिय बनाने का प्रयास किया गया
संघ ने सवाल उठाया कि जब दरभंगा का संस्कृत संस्थान और नालंदा का पाली संस्थान सुचारू रूप से संचालित हो सकते हैं, तो प्राकृत एवं जैन दर्शन से जुड़े इस संस्थान को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है।
राष्ट्रव्यापी आंदोलन की चेतावनी
राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि निर्णय वापस नहीं लिया गया, तो देशभर में व्यापक आंदोलन किया जाएगा।
संघ की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं—
- संस्थान की शैक्षणिक स्वायत्तता को यथावत रखा जाए
- रिक्त पदों पर तत्काल विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाए
- संस्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर के “जैनोलॉजी रिसर्च सेंटर” के रूप में विकसित किया जाए
संघ ने स्पष्ट कहा कि जैन समाज की सहनशीलता को कमजोरी समझना गलत होगा और आवश्यकता पड़ने पर यह आंदोलन सड़क से लेकर सदन तक विस्तारित किया जाएगा।
विरासत संरक्षण की अपील
संघ ने बिहार सरकार से अपील की है कि वह विकास के नाम पर सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरोहरों के संरक्षण की जिम्मेदारी से पीछे न हटे। भगवान महावीर की जन्मभूमि से जुड़े इस ऐतिहासिक संस्थान को समाप्त करने के बजाय इसे और अधिक सशक्त एवं विकसित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
यह विवाद केवल एक संस्थान के प्रशासनिक भविष्य का नहीं, बल्कि जैन धर्म की प्राचीन भाषा प्राकृत, उसकी ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ा गंभीर विषय है। जैन समाज ने इसे अपनी पहचान और धरोहर पर खतरा मानते हुए सरकार से तत्काल पुनर्विचार की मांग की है।
