मध्य-पूर्व युद्ध से दवा उद्योग, खासकर MSME इकाइयां, बुरी तरह प्रभावित हैं। कच्चे माल की कीमतों में 70% तक की वृद्धि से अस्पतालों में दवा आपूर्ति पर संकट मंडरा रहा है। पढ़ें पूरी खबर।
मध्य-पूर्व युद्ध का दवा उद्योग पर कहर: कच्चा माल 70% महंगा, अस्पतालों में आपूर्ति बाधित होने का खतरा
डिजिटल डेस्क, इंदौर। मध्य-पूर्व एशिया में जारी युद्ध का असर अब भारतीय दवा उद्योग पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। इस संकट ने दवा निर्माताओं से लेकर आम मरीजों तक, सभी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है, जिससे अस्पतालों और स्वास्थ्य विभाग को दवा आपूर्ति बाधित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
दवा उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, युद्ध के कारण कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसका सबसे ज्यादा दबाव लघु और मध्यम (MSME) दवा निर्माताओं पर पड़ा है, जो देशभर के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों को जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति का प्रमुख स्रोत हैं।
युद्ध ने कैसे बढ़ाई दवा उद्योग की मुश्किलें?
भारतीय दवा उद्योग को ‘विश्व की फार्मेसी’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन यह उद्योग कच्चे माल के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। मध्य-पूर्व क्षेत्र में बढ़ते तनाव और युद्ध ने इस आपूर्ति मार्ग को बाधित कर दिया है। इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। पिछले कुछ महीनों में दवा बनाने में उपयोग होने वाले सक्रिय औषधीय सामग्री (एपीआई) और अन्य मध्यवर्ती रसायनों की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है।इससे पहले कोविड-19 महामारी ने भी दवा उद्योग की कमजोर सप्लाई चेन को उजागर किया था, लेकिन अब मध्य-पूर्व युद्ध ने उससे भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। उद्योग के जानकारों का कहना है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो कच्चे माल की उपलब्धता और उसकी कीमतों में स्थिरता आने में काफी समय लग सकता है।
MSME दवा निर्माताओं पर सबसे भारी संकट
मध्य-पूर्व युद्ध का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव एमएसएमई (MSME) श्रेणी के दवा निर्माताओं पर पड़ा है। ये छोटी और मध्यम इकाइयां वित्तीय रूप से सीमित होती हैं और बढ़ती लागत को आसानी से अवशोषित नहीं कर पातीं।
90% सरकारी आपूर्ति पर निर्भरता
स्माल एंड मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अनुसार, केंद्रीय एवं राज्य स्वास्थ्य निकायों और सरकारी अस्पतालों को होने वाली जेनेरिक दवा की आपूर्ति का 90 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं MSME इकाइयों से जाता है। यदि ये इकाइयां संकट से उबर नहीं पाईं, तो सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव आ सकता है।एसोसिएशन के अध्यक्ष डा. दर्शन कटारिया ने चेतावनी देते हुए कहा, “यदि शीघ्र राहत नहीं दी गई, तो आने वाले दो-तीन महीनों में बड़ी संख्या में दवा निर्माण कर रही इकाइयां बंद हो सकती हैं।”
कच्चे माल की कीमतों में 30-70% की उछाल
दवा उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की बढ़ती कीमतें हैं। स्माल एंड मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अनुसार, कच्चे माल (एपीआई) की कीमतों में 30 से 70 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है।
विदेशी निर्भरता बनी बड़ी चुनौती
भारत में दवा फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाला लगभग 75 प्रतिशत कच्चा माल विदेशों से आयात किया जाता है। चीन, मध्य-पूर्व और यूरोप के कुछ हिस्सों से आने वाला यह माल अब युद्ध की वजह से या तो उपलब्ध नहीं हो रहा है या फिर अत्यधिक महंगा हो गया है।इसके अलावा, पैकेजिंग सामग्री और अन्य जरूरी वस्तुएं भी अब सिर्फ नकद भुगतान (एडवांस पेमेंट) पर ही मिल रही हैं। इससे छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी पर और दबाव बढ़ गया है। वहीं, सरकार को आपूर्ति के बाद भुगतान में महीनों की देरी होती है, जिससे स्थिति और विकट हो जाती है।
दवा उद्योग की सरकार से ये प्रमुख मांगें
संकट से निपटने के लिए दवा उद्योग ने सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग की है। स्माल एंड मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार नीतियों में बदलाव की मांग रखी है। एसोसिएशन के सचिव अजयसिंह दासुंदी ने प्रमुख मांगों को सूचीबद्ध किया है:
- टेंडर की अवधि बढ़ाएं: पहले से स्वीकृत सरकारी आपूर्ति अनुबंधों (टेंडर) की आपूर्ति अवधि में 60 दिनों का विस्तार किया जाए ताकि निर्माताओं को कच्चा माल जुटाने का पर्याप्त समय मिल सके।
- दंडात्मक प्रावधानों पर रोक: आपूर्ति में देरी पर सरकार द्वारा लगाए जाने वाले दंडात्मक प्रावधानों को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया जाए।
- लंबित भुगतान का निपटारा: उद्योगों को सरकारी आपूर्ति के जो पुराने भुगतान लंबित हैं, उनका तुरंत निपटारा किया जाए। इससे उद्योगों के पास नकदी प्रवाह बढ़ेगा।
- जीवनरक्षक दवाओं के लिए शॉर्ट टेंडर: अत्यावश्यक और जीवनरक्षक दवाओं की 6 महीने की जरूरत पूर्ति के लिए नए दामों पर अलग से शॉर्ट टेंडर जारी किए जाएं, जिसका भुगतान नकद किया जाए।
- राहत पैकेज की घोषणा: MSME दवा निर्माताओं के लिए एक विशेष राहत पैकेज की घोषणा की जाए, जिसमें सब्सिडी वाले कर्ज और लागत में हुई वृद्धि की भरपाई शामिल हो।
अस्पतालों में दवा आपूर्ति पर क्या होगा असर?
यदि सरकार ने इन मांगों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले महीनों में अस्पतालों में दवा आपूर्ति बाधित होने का खतरा बना रहेगा। पहले चरण में छोटे और मध्यम निर्माता ब्लैकलिस्ट होने के डर से भारी नुकसान उठाकर सप्लाई तो कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय में यह स्थिति वित्तीय रूप से उनके दिवालियापन का कारण बन सकती है।इसका सबसे ज्यादा असर सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य योजनाओं पर पड़ेगा, जहां गरीब और जरूरतमंद मरीज इलाज के लिए निर्भर होते हैं। निजी अस्पतालों में भी दवाओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
निष्कर्ष: समय रहते नहीं उठाए गए कदम तो बढ़ सकता है संकट
मध्य-पूर्व युद्ध एक भू-राजनीतिक घटना मात्र नहीं है, बल्कि यह अब भारत के अंदरूनी मामलों, खासकर स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को गहराई से प्रभावित कर रहा है। भारतीय दवा उद्योग इस समय एक जटिल चुनौती का सामना कर रहा है, जहां एक ओर कच्चे माल की कीमतें आसमान छू रही हैं, तो दूसरी ओर सरकारी आपूर्ति के मूल्य पुराने हैं।एमएसएमई इकाइयां, जो इस उद्योग की रीढ़ हैं, बंद होने की कगार पर हैं। सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करते हुए उद्योग की मांगों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। एक स्थिर और सस्ती दवा आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट सिर्फ दवा उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को हिलाकर रख देगा।

