इंदौर अग्निकांड ने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग खुद पीसी सेठी अस्पताल की फायर एनओसी नहीं ले पाया, जबकि शहर में 11 से अधिक निजी अस्पताल बिना फायर सेफ्टी के चल रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर।
इंदौर अग्निकांड ने एक बार फिर शहर के अस्पतालों में फायर सेफ्टी व्यवस्था की पोल खोल दी है। ब्रजेश्वरी एनएक्स और कटक के एससीबी मेडिकल कॉलेज में हुई दर्दनाक घटनाओं के बाद जहां सख्ती की बातें हो रही हैं, वहीं स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही चौंकाने वाली है। विभाग न केवल निजी अस्पतालों की निगरानी में विफल रहा है, बल्कि अपने अधीनस्थ प्रमुख अस्पताल की अग्नि सुरक्षा को लेकर ही उदासीन नजर आ रहा है।
पीसी सेठी अस्पताल: 9 साल से लंबित सुरक्षा का मामला
इंदौर के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार पीसी सेठी अस्पताल की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। यह अस्पताल पिछले नौ वर्षों से संचालित हो रहा है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग अब तक इसके लिए फायर एनओसी प्राप्त नहीं कर पाया है। यानी, पिछले नौ साल से यह अस्पताल बिना अग्नि सुरक्षा मानकों के मरीजों की जान जोखिम में डाल रहा है।स्वास्थ्य विभाग की इस लापरवाही ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर वह विभाग जो दूसरों को नियमों का पालन करने के लिए कहता है, वह खुद अपने अस्पताल की सुरक्षा के प्रति इतना बेपरवाह कैसे हो सकता है? यह मामला केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शहर में बिना फायर एनओसी के चल रहे अस्पतालों की एक लंबी फेहरिस्त है।
11 से अधिक अस्पताल: बिना फायर एनओसी के चल रहा खेल
हाल ही में सामने आई एक शिकायत के अनुसार, शहर में 11 से अधिक ऐसे निजी अस्पताल हैं, जिनमें 50 से ज्यादा बेड हैं, लेकिन वे बिना फायर एनओसी के चल रहे हैं। इतना ही नहीं, स्वास्थ्य विभाग ने इन सभी अस्पतालों को अनुमति दे रखी है, जो नियमों का खुला उल्लंघन है। इन अस्पतालों की सूची इस प्रकार है:
| क्र. सं. | अस्पताल का नाम | स्थान |
|---|---|---|
| 1 | अर्थोस मल्टी स्पेशिएलिटी अस्पताल | एमआर-9 |
| 2 | एसएनएस अस्पताल | दुधिया |
| 3 | मेडीस्टा अस्पताल | उद्योग नगर |
| 4 | लक्ष्मी मेमोरियल अस्पताल | न्यू पलासिया |
| 5 | मयूर अस्पताल | स्कीम-94 |
| 6 | प्रमिला अस्पताल | स्कीम-71 |
| 7 | आरएन कपूर मेमोरियल अस्पताल | मांगलिया |
| 8 | स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई | ओल्ड पलासिया |
| 9 | सेवाकुंज अस्पताल | कनाड़िया |
| 10 | शुभदीप मेडिकल कॉलेज | खंडवा रोड |
| 11 | सिटी अस्पताल | राऊखेड़ी |
इन अस्पतालों में फायर एनओसी न होना यह दर्शाता है कि आग जैसी किसी भी आपात स्थिति में यहां मरीजों और स्टाफ की जान को गंभीर खतरा है। पिछले इंदौर अग्निकांड की घटना के बाद यह स्थिति और भी संजीदा हो जाती है।
शिकायत के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह मामला प्रशासन के संज्ञान में आ चुका है। 13 मार्च को ही कलेक्टर और नगर निगम के अधिकारियों को एक शिकायत सौंपी गई थी, जिसमें इन 11 अस्पतालों में फायर सेफ्टी न होने की जानकारी दी गई थी। शिकायत में यह भी बताया गया कि इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने इन्हें संचालन की अनुमति दे दी है।हालांकि, शिकायत के कई दिन बीत जाने के बाद भी किसी भी अस्पताल के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सुरक्षा को लेकर सिर्फ आश्वासन दिए जा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अगर समय रहते सख्ती नहीं की गई, तो कोई बड़ा इंदौर अग्निकांड फिर से हो सकता है।
स्वास्थ्य विभाग की बैठकें: सिर्फ दिखावा भर?
सीएमएचओ कार्यालय पिछले तीन वर्षों से निजी अस्पताल संचालकों के साथ लगातार बैठकें कर रहा है। इन बैठकों में फायर एनओसी लेने की बात कही जाती है, लेकिन काम पर कोई असर नहीं दिखता। ये बैठकें महज एक औपचारिकता भर रह गई हैं।इंदौर अग्निकांड जैसी घटनाओं के बाद भी अस्पताल संचालकों में कोई जागरूकता नहीं आई है। स्वास्थ्य विभाग की निष्क्रियता ने उनका हौसला बढ़ाया है। जब तक विभाग खुद पीसी सेठी जैसे अपने ही अस्पताल की फायर एनओसी नहीं ले पा रहा, तो दूसरों से इसकी उम्मीद करना बेमानी है।
इंदौर अग्निकांड: नियमों की अनदेखी से बढ़ रहा खतरा
हाल ही में ब्रजेश्वरी एनएक्स में आग लगने से 8 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कटक के मेडिकल कॉलेज में हुई आग ने 12 लोगों की जान ले ली थी। कटक का वह मेडिकल कॉलेज भी बिना फायर एनओसी के चल रहा था। इन घटनाओं ने पूरे देश में सुरक्षा को लेकर हड़कंप मचा दिया है।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी इन घटनाओं के बाद सुरक्षा इंतजाम बढ़ाने की बात कही थी। लेकिन इंदौर की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि प्रशासन अभी भी पुरानी कार्यशैली में है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम मिलकर सख्त अभियान नहीं चलाते, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
क्या कहते हैं नियम? अस्पतालों के लिए फायर एनओसी क्यों जरूरी?
नियमों के अनुसार, 50 से अधिक बेड वाले किसी भी अस्पताल (सरकारी या निजी) के लिए नगर निगम से फायर एनओसी लेना अनिवार्य है। यह प्रमाण पत्र यह सुनिश्चित करता है कि इमारत में फायर एक्सटिंग्विशर, अलार्म सिस्टम, आपातकालीन निकासी मार्ग, स्प्रिंकलर सिस्टम और अन्य अग्नि सुरक्षा उपकरण मानक के अनुसार मौजूद हैं।
इसके अलावा, नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया के तहत भी सभी सार्वजनिक भवनों में अग्नि सुरक्षा के प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है। अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयां और मरीजों की सीमित गतिशीलता जैसे कारक आग को और भी खतरनाक बना देते हैं। इंदौर अग्निकांड के बाद यह जरूरी हो गया है कि सभी अस्पतालों का ऑडिट किया जाए।
आगे की राह: कब होगी अस्पतालों में सख्ती?
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले अस्पतालों के खिलाफ सिर्फ नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत है ठोस कार्रवाई की।
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सभी अस्पतालों की फायर एनओसी की जांच की जानी चाहिए।
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जिनके पास एनओसी नहीं है, उन्हें तत्काल सील किया जाए।
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स्वास्थ्य विभाग के उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने नियमों की अनदेखी करते हुए इन अस्पतालों को अनुमति दी।
इंदौर शहर को अब एक और बड़े हादसे से बचने के लिए त्वरित और सख्त कदम उठाने की जरूरत है। अगर स्वास्थ्य विभाग अब भी “सोता” रहा, तो अगला इंदौर अग्निकांड कब और कहां होगा, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। उम्मीद है कि प्रशासन जल्द ही जागेगा और मासूम मरीजों की जान को जोखिम में डालने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगा।
